श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सिर्फ तोतेकी नाईं उसे पढ़ा करता है; और यजमान बहिरेकी नाईं पानी छोड़नेकी कवायत किया करता है ! परंतु विचार करनेसे मालूम होता है, कि इसकी जड़में कर्म-फलाशाको छोड़कर कर्म करनेका तत्त्व है; और इसकी हँसी करनेसे शास्त्रमें तो कुछ दोष न ही आता; किंतु हँसी करनेवालेका अज्ञानही प्रकट होता है। यदि सारी आयुके कर्म - यहां तक कि जिंदा रहनेकाभी कर्म - इस प्रकार कृष्णार्पण-बुद्धिसे अथवा फलाशाका त्यागकर किये जावें, तो पापवासना कैसे रह सकती है ? और कुकर्म कैसे हो सकते हैं ? फिर लोगोंके उपयोगके लिये कर्म करो; संसारकी भलाईके लिये आत्मसमर्पण करो; इत्यादि उपदेश करनेकी आवश्यकताही कहाँ रह जाती है ? तब तो 'मैं' और 'लोग' इन दोनोंका समावेश परमेश्वरमें और परमेश्वरका समावेश इन दोनोंमें हो जाता है, इसलिये स्वार्थ और परार्थ दोनोंभी कृष्णार्पणरूपी परमार्थमें डूब जाते हैं; और तुकाराम महाराज जैसे महात्माओंकी यह उक्तिही चरितार्थ होती है, कि "संतोंकी विभूतियां जगतके कल्याणहीके लिये हुआ करती है; वे लोग परोपकारके लिये अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।" पिछले प्रकरणमें युक्तिवादसे यह सिद्ध कर दिया गया है, कि जो मनुष्य अपने सब काम कृष्णार्पण-बुद्धिसे किया करता है, उसका 'योगक्षेम' किसी प्रकार रुक नहीं सकता; और भक्ति-मार्गवालोंको तो स्वयं भगवानने गीतामें आश्वासन दिया है, कि "तेषां नित्याभियुक्तानां योग- क्षेमं वहाम्यहम्" (गीता ९. २२)। यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि जिस प्रकार ऊंचे दर्जेके ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य है, कि वह सामान्य जनोंमें बुद्धिभेद न करके उन्हें सन्मार्गमें लगावें (गीता ३. २६), उसी प्रकार परम श्रेष्ठकाभी यही कर्तव्य है, कि वह निम्न श्रेणीके भक्तोंकी श्रद्धाको भ्रष्ट न कर, उनके अधिकारके अनुसारही उन्हें उन्नतिके मार्गमें लगा देवे। सारांश, उक्त विवेचनसे यह मालूम हो जायगा, कि अध्यात्मशास्त्रमें और कर्म-विपाकमें जो सिद्धान्त कहे गये हैं, वे सब कुछ शब्दभेदसे भक्ति-मार्गमेंभी स्थिर रखे गये हैं; और ज्ञान तथा भक्तिमें इस प्रकार मेलकर देनेकी पद्धति हमारे यहाँ बहुत प्राचीन समयसे प्रचलित है। परंतु जहाँ शब्दभेदमे अर्थके अनर्थ हो जानेका भय रहता है, वहाँ इस प्रकारमे शब्दभेदभी नही किया जाता; क्योकि अर्थही प्रधान बात है। उदाहरणार्थ, कर्म- विपाक-प्रक्रियाका सिद्धान्त है, कि ज्ञान-प्राप्तिके लिये प्रत्येक मनुष्य स्वयं प्रयत्न करे; और अपना उद्धार आपही कर ले। यदि इसमें शब्दोंका कुछ भेद करके यह कहा जाय, कि यह कामभी परमेश्वरही करता है; तो मूढ जन आलसी हो जावेंगे। इसलिये "आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः" - आप-ही अपना शत्रु और आप-ही अपना मित्र है (गीता ६. ५) - यह तत्त्व भक्ति-मार्गमेंभी प्रायः ज्यों- का-त्यों अर्थात् शब्दभेद न करके बतलाया जाता है। साधु तुकारामके इस भावका उल्लेख पहले हो चुका है, कि "इसमे किसीका क्या नुकसान हुआ ? अपनी बुराई अपने हाथोकर ली" (तु. गा. ४४४८)। इससेभी अधिक स्पष्ट शब्दोंमें उन्होंने