भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

कहा है, कि “ईश्वरके पास कुछ मोक्षकी गठड़ी नहीं धरी है, कि वह किसीके हाथमें दे दे ।। यहाँ तो इंद्रियोंको जीतना और मनको निर्विषय करनाही मुख्य उपाय है (तु. गा. ४२९७)। क्या यह उपनिषदोंके इस मंत्रके - “ मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः ” के - समान नहीं है, जो पहले दसवें प्रकरणमें दिया जा चुका है। यह सच है, कि परमेश्वरही इस जगतकी सब घटनाओंका करने-करानेवाला है। परंतु उसपर निर्दयताका और पक्षपात करनेका दोष न लगाया जावे; इसलिये कर्म-विपाक-प्रक्रियामें जो यह सिद्धान्त कहा गया है, कि परमेश्वर प्रत्येक मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल दिया करता है। वह सिद्धान्त इसी कारणसे, बिना किसी प्रकारका शब्दभेद कियेही भक्ति-मार्गमें ले लिया जाता है। इसी प्रकार यद्यपि उपा- सनाके लिये ईश्वरको व्यक्त मानना पड़ता है, तथापि अध्यात्मशास्त्रका यह सिद्धान्त- भी हमारे यहाँके भक्ति-मार्गमें कभी छूट नहीं जाता, कि जो कुछ व्यक्त है, वह सब माया है और सत्य परमेश्वर उसके परे है। पहले कह चुके हैं, कि इसी कारणसे गीतामें वेदान्तसूत्र-प्रतिपादित जीवका स्वरूपही स्थिर रखा गया है। मनुष्यके मनकी प्रत्यक्षकी ओर अथवा व्यक्तकी ओर झुकनेकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति हुआ करती है. उसमें और तत्त्वज्ञानके गहन सिद्धान्तोंमें मेलकर देनेकी वैदिक धर्मकी यह रीति किसीभी अन्य देशके लोगोंके भक्ति-मार्गमें दीख नहीं पड़ती। जब लोग एक बार परमेश्वरकी किसी सगुण विभूतिका स्वीकार कर व्यक्तका सहारा लेते हैं, तब उसीमें ऐसे आसक्त होकर फँस जाते हैं, कि उसके सिवा उन्हें और कुछ दीखही नहीं पड़ता; और उनके मनमें अपने अपने सगुण प्रतीकके विषयमें वृथाभिमान उत्पन्न हो जाता है। ऐसी अवस्थामें वे लोग यह मिथ्या भेद करनेका यत्न करने लगते हैं, कि तत्त्वज्ञानका मार्ग भिन्न है; और श्रद्धाका भक्ति-मार्ग भिन्न है। परंतु हमारे देशमें तत्त्वज्ञानका उदय बहुत प्राचीन कालमेंही हो चुका था, इसलिये गीता-धर्ममें श्रद्धा और ज्ञानका कुछभी विरोध नहीं है; बल्कि वैदिक ज्ञानमार्ग श्रद्धासे और वैदिक भक्ति-मार्ग ज्ञानसे, पुनीत हो गया है, अतएव मनुष्य किसीभी मार्गका स्वीकार क्यों न करे; अंतमें उसे एकही-सी सद्गति प्राप्त होती है। इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, कि अव्यक्त ज्ञान और व्यक्त भक्तिके मेलका यह महत्त्व केवल व्यक्त क्राइस्टमेंही लिपटे रहनेवाले धर्मके पंडितोंके ध्यानमें नहीं आ सका, और इसलिये उनकी एक- देशीय तथा तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे कोती नजरसे गीता-धर्ममें उन्हें विरोध दीख पड़ने लगा। परंतु आश्चर्यकी बात तो यही है, कि वैदिक धर्मके इस गुणकी प्रशंसा न कर हमारे देशके कुछ अनुकरणप्रेमी जन आजकल इसी गुणकी निंदा करते देखे जाते हैं! माघ काव्यका ( १६. ४३ ) यह वचन इसी बातका एक अच्छा उदा- हरण है, कि “अथ वाऽभिनिविष्टबुद्धिषु । व्रजति व्यर्थकतां सुभाषितम् !” – खोटी समझसे जब एक बार मन ग्रस्त हो जाता है, तब मनुष्यको अच्छी बातेंभी ठीक नहीं जँचतीं।