भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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४३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्मार्तमार्गमें चतुर्थाश्रमका जो महत्त्व है, वह भक्ति-मार्गमें अथवा भागवत धर्ममें नहीं है। वर्णाश्रम-धर्मका वर्णन भागवत धर्ममेंभी किया जाता है; परंतु उस धर्मका सारा आधार भक्तिपरही होना है, इसलिये जिसकी भक्ति उत्कट हो, वही सबसे श्रेष्ठ माना जाता है – फिर चाहे वह गृहस्थ हो, वानप्रस्थ या बैरागी हो; इसके विषयमें भागवत धर्ममें कुछ विधिनिषेध नहीं है (भा. ११. १८. १३, १४)। संन्यास- आश्रम स्मार्त-धर्मका एक आवश्यक भाग है, भागवत धर्मका नहीं। परंतु ऐसा कोई नियम नहीं, कि भागवत धर्मके अनुयायी कभी विरक्त न हों; और गीतामेंही कहा है, कि संन्यास और कर्मयोग ये दोनों मोक्षकी दृष्टिसे समान योग्यताके हैं। इसलिये यद्यपि चतुर्थाश्रमका स्वीकार न किया जावे, तथापि सांसारिक कर्मोंको छोड़ बैरागी हो जानेवाले पुरुष भक्ति-मार्गमेंभी पाये जा सकते हैं। यह बात पूर्व समयसेही कुछ कुछ चली आ रही है। परंतु उस समय इन लोगोंको प्रभुता न थी; और ग्यारहवें प्रकरणमें यह बात स्पष्ट रीतिसे बतला दी गई है, कि भगवद्गीतामें कर्मत्यागकी अपेक्षा कर्मयोगहीको अधिक महत्त्व दिया गया है। कालांतरसे कर्मयोगका यह महत्त्व लुप्त हो गया; और वर्तमान समयमें भागवत धर्मीय लोगोंकोभी यही समझ हो गई है, कि भगवद्भक्त वही है, कि जो सांसारिक कर्मोंको छोड़, विरक्त होकर केवल भक्तिमेंही निमग्न हो जावे। इसलिये यहाँ भक्तिकी दृष्टिसे फिरभी कुछ थोड़ा-सा विवेचन करना आवश्यक प्रतीत होता है, कि इस विषयमें गीताका मुख्य सिद्धान्त और सच्चा उपदेश क्या है ? भक्ति-मार्गका अथवा भागवत धर्मका ब्रह्म स्वयं सगुण भगवान्ही हैं। यदि येही भगवान् स्वयं सारे संसारके कर्ता-धर्ता हैं, और साधुजनोंकी रक्षा करने तथा दुष्टजनोंको दंड देनेके लिये समय समयपर अवतार लेकर इस जगतका धारण-पोषण किया करते हैं, तो यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि भगवद्भक्तोंकोभी लोकसंग्रहके लिये उन्हीं भगवान्का अनुकरण करना चाहिये। हनुमान्जी रामचंद्रके बड़े भक्त थे; परंतु उन्होंने रावण आदि दुष्टजनोंका निर्दलन करनेका काम कुछ छोड़ नहीं दिया था। भीष्मपितामहकी गणनाभी परम भगवद्- भक्तोंमें की जाती है; परंतु यद्यपि वे स्वयं मृत्युपर्यंत ब्रह्मचारी रहे, तथापि उन्होंने स्वधर्मानुसार स्वकीयोंकी और राज्यकी रक्षा करनेका काम अपने जीवनभर जारी रखा था। यह बात सच है, कि जब भक्तिके द्वारा परमेश्वरका ज्ञान प्राप्त हो गया हो, तब भक्तको स्वयं अपने हितके लिये कुछ प्राप्त कर लेना शेष नहीं रह जाता। परंतु प्रेममूलक भक्ति-मार्गमें दया, करुणा, कर्तव्य-प्रीति इत्यादि श्रेष्ठ मनो- वृत्तियोंका नाश नहीं हो सकता, बल्कि वे औरभी अधिक शुद्ध हो जाती हैं। ऐसी दशामें यह प्रश्नही नहीं उठ सकता, कि कर्म करें या न करें ? वरन् भगवद्भक्त तो वही है, कि जिसके मनमें ऐसा अभेदभाव उत्पन्न हो जाय :- जिसका कोई न हो हृदयसे उसे लगावे, प्राणिमात्रके लिये प्रेमकी ज्योति जगावे।