भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 482

भक्तिमार्ग ४३७ सबमें विभुको व्याप्त जान सबको अपनावे, है बस ऐसा वही भक्तकी पदवी पावे। ऐसी अवस्थामें स्वभावतः उन लोगोंकी वृत्ति लोकसंग्रहके अनुकूल हो जाती है, जैसा कि ग्यारहवें प्रकरणमें कह चुके हैं - "संतोंकी विभूतियां जगतके कल्याणहीके लिये हुआ करती हैं। वे लोक परोपकारके लिये अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।" जब यह मान लिया, कि परमेश्वरही इस सृष्टिको उत्पन्न करता है, और उसके सब व्यवहारोंकोभी किया करता है; तब यह अवश्यही मानना पड़ेगा, कि उसी सृष्टिके व्यवहारोंको सरलतासे चलानेके लिये चातुर्वर्ण्य आदि जो व्यवस्थाएँ हैं, वे उसीकी इच्छासे निर्मित हुई हैं। गीतामेंभी भगवानने स्पष्ट रीतिसे यही कहा है, कि "चातु- र्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः" (गीता ४. १३)। अर्थात् यह परमेश्वरहीकी इच्छा है, कि प्रत्येक मनुष्य अपने अपने अधिकारके अनुसार समाजके इन कामोंको लोकसंग्रहके लिये करता रहे। इसीसे आगे यहभी सिद्ध होता है, कि सृष्टिके जो व्यवहार परमेश्वरकी इच्छासे चल रहे हैं, उनका एक-आध विशेष भाग किसी मनुष्यके द्वारा पूरा करानेके लियेही परमेश्वर उसको उत्पन्न किया करता है; और यदि परमेश्वर-द्वारा नियत किया गया उसका यह काम मनुष्य न करे, तो परमेश्वर- हीकी अवज्ञा करनेका पाप उसे लगेगा। यदि तुम्हारे मनमें यह अहंकार-बुद्धि जागृत होगी, कि ये काम मेरे हैं अथवा मैं उन्हें अपने स्वार्थके लिये करता हूँ; तो उन कर्मोंके भले-बुरे फल तुम्हें अवश्य भोगने पड़ेंगे। परंतु यदि तुम इन्हीं कर्मोंको केवल स्वधर्म जानकर परमेश्वरार्पणपूर्वक इस भावसे करोगे, कि "परमेश्वरके मनमें जो कुछ करना है, उसके लिये मुझे निमित्त करके वह मुझसे काम कराता है" (गीता ११. ३३); तो उसमें कुछ अनुचित या अयोग्य नहीं। बल्कि गीताका यह कथन है, कि इस स्वधर्माचरणसेही सर्वभूतान्तर्गत परमेश्वरकी सात्त्विक भक्ति हो जाती है। भगवानने अपने सब उपदेशोंका तात्पर्य गीताके अंतिम अध्यायमें उपसंहाररूपसे अर्जुनको इस प्रकार बतलाया है, कि "सब प्राणियोंके हृदयमें निवास करके परमे- श्वरही उन्हें यंत्रके समान नचाता है; इसलिये ये दोनों भावनाएँ मिथ्या हैं, कि मैं अमुक कर्मको छोड़ता हूँ या अमुक कर्मको करता हूँ। फलाशाको छोड़ सब कर्म कृष्णार्पण-बुद्धिसे करते रहो। यदि तू ऐसा निग्रह करेगा, कि मैं इन कर्मोंको नही करता; तोभी प्रकृतिधर्मके अनुसार तुझे उन कर्मोंको करनाही होगा। अतएव परमे- श्वरमें अपने सब स्वार्थोंका लय करके स्वधर्मानुसार प्राप्त व्यवहारको परमार्थ-बुद्धिसे और वैराग्यसे लोकसंग्रहके लिये तुझे अवश्य करनाही चाहिये; मैंभी यही करता हूँ; मेरे उदाहरणको देख और उसके अनुसार बर्ताव कर।" जैसे ज्ञानका और निष्काम कर्मका विरोध नहीं, वैसेही भक्तिमें और कृष्णार्पण-बुद्धिसे किये गये कर्मोंमेंभी विरोध उत्पन्न नहीं होता। महाराष्ट्रके प्रसिद्ध भगवद्भक्त तुकाराम महाराजभी भक्तिके द्वारा परमेश्वरके "अणोरणीयान् महतो महीयान्" (कठ. २. २०; गीता ८. ९) -