श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमाणुसेभी छोटा और बड़ेसेभी बड़ा - ऐसे स्वरूपके साथ अपने तादात्म्यका वर्णन करके कहते हैं, कि "अब मैं केवल परोपकारहीके लिये बचा हूँ।" उन्होंने संन्यास- मार्गके अनुयायियोंके समान यह नहीं कहा, कि अब मेरा कुछभी काम शेष नहीं है (तु. गा. ३५८७)। बल्कि वे कहते हैं, कि "भिक्षापात्रका अवलंबन करना लज्जा- स्पद जीवन है, वह नष्ट हो जावे। नारायण ऐसे मनुष्यकी सर्वथा उपेक्षाही करता है।" (तु. गा. २५९५)। अथवा "सत्यवादी मनुष्य संसारके सब काम करता है; परंतु जलमें कमलपत्रके समान उनसे अलिप्त रहता है। जो उपकार करता है और प्राणियोंपर दया करता है, उसीमें आत्मस्थितिका निवास जानो" (तु. गा. ३७८०. २. ३)। इन वचनोंसे साधु तुकारामका इस विषयमें स्पष्ट अभिप्राय व्यक्त हो जाता है। यद्यपि तुकाराम महाराज संसारी थे, तथापि उनके मनका झुकाव कुछ कर्मत्यागहीकी ओर था। परंतु प्रवृत्तिप्रधान भागवत धर्मका लक्षण अथवा गीताका सिद्धान्त यह है, कि उत्कट भक्तिके साथ साथ मृत्युपर्यंत ईश्वरार्पणपूर्वक निष्काम कर्म करतेही रहना चाहिये; और यदि कोई इस सिद्धान्तका पूरा पूरा स्पष्टीकरण देखना चाहे, तो उसे श्रीसमर्थ रामदासस्वामीके दासबोध ग्रंथको ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये (स्मरण रहे, कि साधु तुकारामनेही शिवाजी महाराजको जिन 'सद्गुरुकी शरण' में जानेको कहा था, उन्हींका यह प्रासादिक ग्रंथ है)। रामदासस्वामीने अनेक बार कहा है, कि भक्तिके द्वारा अथवा परमेश्वरके शुद्ध-स्वरूपको पहचान कर जो सिद्ध-पुरुष कृतकृत्य हो चुके हैं, वे "सब लोगोंको 'सयाना' बनानेके लिये" (दास. १९. १०. १६) जिस प्रकार निःस्पृहतासे अपना काम यथाधिकार किया करते हैं, उसे देखकर साधारण लोगभी अपना अपना व्यवहार करना सीखें; क्योंकि "बिना किये कुछभी नहीं होता" (दास. १९. १०. २५; १२. ९. ६; १८. ३. ३); और अंतिम दशकमें (दास. २०. ४. २६) उन्होंने कर्मकी सामर्थ्यका भक्तिकी तरफ शक्तिके साथ पूरा पूरा मेल इस प्रकार कर दिया है:- हलचलमें सामर्थ्य है। जो करेगा वही पावेगा। परंतु उसमें भगवान्का । अधिष्ठान चाहिये ॥ गीताके आठवें अध्यायमें अर्जुनको जो उपदेश किया गया है, कि "मामनुस्मर युध्य च" (गीता ८. ७) - नित्य मेरा स्मरण कर; और युद्ध कर - उसका तात्पर्य, और छठे अध्यायके अंतमें जो कहा है, कि "कर्मयोगियोंमें भक्तिमान् श्रेष्ठ है" (गीता ६. ४७) उसकाभी तात्पर्य वही है, कि जो रामदासस्वामीके उक्त वचनमें है। गीताके अठारहवें अध्यायमेंभी भगवानने यही कहा है :- यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ "जिसने इस सारे जगत्को उत्पन्न किया है, उसकी अपने स्वधर्मानुरूप निष्काम कर्माचरणसे (न कि केवल वाचासे अथवा पुष्पोंसे) पूजा करके मनुष्य सिद्धि