श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिमार्ग ४३९ पाना है” (गीता १८. ४६)। अधिक क्या कहें, इस श्लोकका और समस्त गीता- काभी भावार्थ यही है, कि स्वधर्मानुरूप निष्काम कर्म करनेमे सर्वभूतान्तर्गत विराट्- रूपी परमेश्वरकी एक प्रकारकी भक्ति, पूजा या उपासनाही हो जाती है। ऐसा कहनेमे, कि “अपने धर्मानुरूप कर्मोंसे परमेश्वरकी पूजा करो,” यह नहीं समझना चाहिये, कि “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः” इत्यादि नवविधा भक्ति गीताको मान्य नहीं। परंतु गीताका कथन है, कि कर्मोंको गौण समझकर उन्हें छोड़ देना और इस नव- विधा भक्तिमेंही बिल्कुल निमग्न हो जाना उचित नहीं है, शास्त्रतः प्राप्त अपने सब कर्मोंको यथोचित रीतिसे अवश्य करनाही चाहिये। परंतु उन्हें 'स्वयं अपने लिये' समझकर नहीं, किंतु परमेश्वरका स्मरणकर इस निर्मम बुद्धिसे करना चाहिये, कि “ईश्वरनिर्मित सृष्टिके संग्रहार्थ उसीके ये सब कर्म हैं।” ऐसा करनेसे कर्मका लोप नहीं होगा; उलटे इन कर्मोंसेही परमेश्वरकी सेवा, भक्ति वा उपासना हो जायगी, और उन कर्मोंके पाप-पुण्यके भागी हम न होकर अंतमें पूर्ण सद्गतिभी मिल जायगी। गीताके इस सिद्धान्तपर ध्यान न देकर गीताके भक्ति-प्रधान टीकाकार अपने ग्रंथोंमें यह भावार्थ बतलाया करते हैं, कि गीतामें भक्तिहीको प्रधान माना है; और कर्मको गौण। परंतु संन्यासमार्गीय टीकाकारोंके समान भक्ति-प्रधान टीका- कारोंका यह तात्पर्यार्थभी एक-पक्षीय है। गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्ग कर्म-प्रधान है; और उसका मुख्य तत्त्व यह है, कि परमेश्वरकी पूजा न केवल पुष्पोंसे वा वाचामेही होती है; किंतु वह स्वधर्मोक्त निष्काम कर्मोंसेभी होती है; और ऐसी पूजा प्रत्येक मनुष्यको अवश्य करनी चाहिये। जब कि कर्ममय भक्तिका यह तत्त्व गीताके समान अन्य किसीभी स्थानमें प्रतिपादित नहीं हुआ है, तब इसी तत्त्वको गीता- प्रतिपादित भक्ति-मार्गका विशेष लक्षण कहना चाहिये। इस प्रकार कर्मयोगकी दृष्टिसे ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्गका पूरा पूरा मेल यद्यपि हो गया, तथापि ज्ञान-मार्गसे भक्ति-मार्गमें जो एक महत्त्वकी विशेषता है, उसकाभी अब अंतमें स्पष्ट रीतिसे वर्णन हो जाना चाहिये। यह तो पहलेही कह चुके हैं, कि ज्ञान-मार्ग केवल बुद्धिगम्य होनेके कारण अल्प बुद्धिवाले सामान्य जनोंके लिये क्लेशमय है; और भक्ति-मार्गके श्रद्धामूलक, प्रेमगम्य तथा प्रत्यक्ष होनेके कारण उसका आचरण करना सब लोगोंके लिये सुगम है। परंतु क्लेशके सिवा ज्ञान-मार्गमें एक औरभी अड़चन है। जैमिनीकी मीमांसा, या उपनिषद् और वेदान्त-सूत्रोंको देखें, तो मालूम होगा, कि उनमें श्रौत-यज्ञयाग आदिकी अथवा कर्म-संन्यासपूर्वक 'नेति नेति'- स्वरूपी परब्रह्मकीही चर्चा भरी पड़ी है; और अंतमें यही निर्णय किया है, कि स्वर्ग- प्राप्तिके लिये साधनभूत होनेवाले श्रौत यज्ञ-यागादिक कर्म करनेका अथवा मोक्ष- प्राप्तिके लिये आवश्यक उपनिषदादि वेदाध्ययन करनेका अधिकारभी पहले तीन वर्णोंके पुरुषोंको है (वे. सू. १. ३. ३४-३८)। इन ग्रंथोंमें इस बातका विचार नहीं किया गया है, कि उक्त तीन वर्णोंका, स्त्रियोंको अथवा चातुर्वर्ण्यके अनुसार सारे