श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
भक्तिमार्ग ४३९ पाना है” (गीता १८. ४६)। अधिक क्या कहें, इस श्लोकका और समस्त गीता- काभी भावार्थ यही है, कि स्वधर्मानुरूप निष्काम कर्म करनेमे सर्वभूतान्तर्गत विराट्- रूपी परमेश्वरकी एक प्रकारकी भक्ति, पूजा या उपासनाही हो जाती है। ऐसा कहनेमे, कि “अपने धर्मानुरूप कर्मोंसे परमेश्वरकी पूजा करो,” यह नहीं समझना चाहिये, कि “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः” इत्यादि नवविधा भक्ति गीताको मान्य नहीं। परंतु गीताका कथन है, कि कर्मोंको गौण समझकर उन्हें छोड़ देना और इस नव- विधा भक्तिमेंही बिल्कुल निमग्न हो जाना उचित नहीं है, शास्त्रतः प्राप्त अपने सब कर्मोंको यथोचित रीतिसे अवश्य करनाही चाहिये। परंतु उन्हें 'स्वयं अपने लिये' समझकर नहीं, किंतु परमेश्वरका स्मरणकर इस निर्मम बुद्धिसे करना चाहिये, कि “ईश्वरनिर्मित सृष्टिके संग्रहार्थ उसीके ये सब कर्म हैं।” ऐसा करनेसे कर्मका लोप नहीं होगा; उलटे इन कर्मोंसेही परमेश्वरकी सेवा, भक्ति वा उपासना हो जायगी, और उन कर्मोंके पाप-पुण्यके भागी हम न होकर अंतमें पूर्ण सद्गतिभी मिल जायगी। गीताके इस सिद्धान्तपर ध्यान न देकर गीताके भक्ति-प्रधान टीकाकार अपने ग्रंथोंमें यह भावार्थ बतलाया करते हैं, कि गीतामें भक्तिहीको प्रधान माना है; और कर्मको गौण। परंतु संन्यासमार्गीय टीकाकारोंके समान भक्ति-प्रधान टीका- कारोंका यह तात्पर्यार्थभी एक-पक्षीय है। गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्ग कर्म-प्रधान है; और उसका मुख्य तत्त्व यह है, कि परमेश्वरकी पूजा न केवल पुष्पोंसे वा वाचामेही होती है; किंतु वह स्वधर्मोक्त निष्काम कर्मोंसेभी होती है; और ऐसी पूजा प्रत्येक मनुष्यको अवश्य करनी चाहिये। जब कि कर्ममय भक्तिका यह तत्त्व गीताके समान अन्य किसीभी स्थानमें प्रतिपादित नहीं हुआ है, तब इसी तत्त्वको गीता- प्रतिपादित भक्ति-मार्गका विशेष लक्षण कहना चाहिये। इस प्रकार कर्मयोगकी दृष्टिसे ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्गका पूरा पूरा मेल यद्यपि हो गया, तथापि ज्ञान-मार्गसे भक्ति-मार्गमें जो एक महत्त्वकी विशेषता है, उसकाभी अब अंतमें स्पष्ट रीतिसे वर्णन हो जाना चाहिये। यह तो पहलेही कह चुके हैं, कि ज्ञान-मार्ग केवल बुद्धिगम्य होनेके कारण अल्प बुद्धिवाले सामान्य जनोंके लिये क्लेशमय है; और भक्ति-मार्गके श्रद्धामूलक, प्रेमगम्य तथा प्रत्यक्ष होनेके कारण उसका आचरण करना सब लोगोंके लिये सुगम है। परंतु क्लेशके सिवा ज्ञान-मार्गमें एक औरभी अड़चन है। जैमिनीकी मीमांसा, या उपनिषद् और वेदान्त-सूत्रोंको देखें, तो मालूम होगा, कि उनमें श्रौत-यज्ञयाग आदिकी अथवा कर्म-संन्यासपूर्वक 'नेति नेति'- स्वरूपी परब्रह्मकीही चर्चा भरी पड़ी है; और अंतमें यही निर्णय किया है, कि स्वर्ग- प्राप्तिके लिये साधनभूत होनेवाले श्रौत यज्ञ-यागादिक कर्म करनेका अथवा मोक्ष- प्राप्तिके लिये आवश्यक उपनिषदादि वेदाध्ययन करनेका अधिकारभी पहले तीन वर्णोंके पुरुषोंको है (वे. सू. १. ३. ३४-३८)। इन ग्रंथोंमें इस बातका विचार नहीं किया गया है, कि उक्त तीन वर्णोंका, स्त्रियोंको अथवा चातुर्वर्ण्यके अनुसार सारे
४४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र समाजके हितके लिये खेती या अन्य व्यवसाय करनेवाले साधारण स्त्री-पुरुषोंको मोक्ष कैसे मिले। अच्छा; स्त्री-शूद्रादिकोंके साथ वेदोंकी ऐसी अनबन होनेसे यदि यह कहा जाय, कि उन्हें मुक्ति कभी मिलही नहीं सकती; तो उपनिषदों और पुराणोंमेंही ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि गार्गी प्रभृति स्त्रियोंको और विदुर प्रभृतिको ज्ञानकी प्राप्ति होकर सिद्धि मिल गई थी (वे. सू. ३. ४. ३६-३९) । ऐसी दशामें यह सिद्धान्त नहीं किया जा सकता, कि सिर्फ पहले तीन वर्णोंके पुरुषोंहीको मुक्ति मिलती है; और यदि यह मान लिया जावे, कि स्त्री-शूद्र आदि सभी लोगोंको मुक्ति मिल सकती है; तो अब बतलाना चाहिये, कि उन्हें किस साधनसे ज्ञानकी प्राप्ति होगी। बादरायणाचार्य कहते हैं, कि 'विशेषानुग्रहश्च' (वे. सू. ३. ४. ३८) अर्थात् परमेश्वरका विशेष अनुग्रहही उनके लिये एक साधन है; और भागवतमें (भाग. १. ४. २५) कहा है, कि कर्म-प्रधान भक्ति-मार्गके रूपमें इसी विशेषानु- ग्रहात्मक साधनका "महाभारतमें और अतएव गीतामेंभी निरूपण किया गया है, क्योंकि स्त्रियों, शूद्रों या (कलियुगके) नामधारी ब्राह्मणोंके कानोंतक श्रुतिकी आवाज नहीं पहुँचती है।" इस मार्गसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और उपनिषदोंका ब्रह्मज्ञान - दोनों यद्यपि एकहीसे हों, तथापि अब स्त्री-पुरुषसंबंधी या ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्य-शूद्रसंबंधी कोई भेद शेष नहीं रहता; और इस मार्गके विशेष गुणके बारेमें गीता कहती है, कि- मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ॥ स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ "हे पार्थ! स्त्री, वैश्य और शूद्र या अंत्यज आदि जो पाप-योनियोंमें उत्पन्न हुए हैं, मेरा आश्रय करके वेभी सब उत्तम गति पा जाते हैं" (गीता. ९. ३२)। यही श्लोक महाभारतके अनुगीता पर्वमेंभी आया है (मभा. अश्व. १९. ६१); और ऐसी कथाएँभी हैं, कि वनपर्वान्तर्गत ब्राह्मण-व्याध-संवादमें मांस बेचनेवाले व्याधने किसी ब्राह्मणको, तथा शांतिपर्वमें तुलाधारने अर्थात् बनियेने जाजलि नामक तपस्वी ब्राह्मणको, यह निरूपण सुनाया है, कि स्वधर्मके अनुसार निष्काम बुद्धिसे आचरण करनेही मोक्ष कैसे मिल जाता है (मभा. वन. २०६--२१४; शां. २६०-२६३) इनसे प्रकट होता है, कि जिसकी बुद्धि सम हो जावे, वही श्रेष्ठ है, फिर चाहे वह सुनार हो, बढ़ई हो, बनिया हो या कसाई। किसी मनुष्यकी योग्यता उसके धंधेपर, व्यवसायपर या जातिपर, अवलंबित नहीं; किंतु सर्वथा उसके अंतःकरणकी शुद्धतापर अवलंबित होती है; और यही भगवान्काभी अभिप्राय है। इस प्रकार किसी समाजके सब लोगोंके लिये मोक्षके दरवाजे खुल जानेसे, उस समाजमें जो एक प्रकारकी विलक्षण जागृति उत्पन्न होती है, उसका स्वरूप महाराष्ट्रके भागवत धर्मके इतिहासमे भली भाँति दीख पड़ता है। परमेश्वरको क्या स्त्री, क्या चांडाल क्या ब्राह्मण-सभी समान हैं; "देव भावका भूखा है"- न प्रतीकका, न
काले-गोरे वर्णका; और न स्त्री-पुरुष आदि या ब्राह्मण-चांडाल आदि भेदोंकाभी। साधु तुकारामका इस विषयका अभिप्राय, इस हिंदी पदसे प्रकट हो जायगा :- क्या द्विजति क्या शूद्र ईशको वेश्या भी भज सकती है, श्वपचोंकोभी भक्तिभावमें शुचिता कब तज सकती है। अनुभवसे कहता हूँ, मैने उसे कर लिया है बस में, जो चाहे सो पिये प्रेमसे अमृत भरा है इस रसमें ॥ अधिक क्या कहें ? गीताशास्त्रकाभी यह सिद्धान्त है, कि “ मनुष्य कितनाभी दुरा- चारी क्यों न हो; परन्तु यदि अंतकालमें वह अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें जावे तो परमेश्वर उसे नही भूलता ” ( गीता ९. ३०; ८. ५-८ )। उक्त पद्यमें 'वेश्या' शब्दको (जो साधु तुकाराम महाराजके मूल वचनके आधारमे रखा गया है) देखकर, पवित्रताका ढोंग करनेवाले बहुतेरे विद्वानोंका कदाचित् बुरा लगे। परंतु सच बात तो यह है, कि ऐसे लोगोंको सच्चा धर्म-तत्त्व मालूमही नहीं है। न केवल हिंदु धर्ममें, किंतु बौद्ध धर्ममेंभी यही सिद्धान्त स्वीकार किया गया है ( मिलिंदप्रश्न ३. ७ २ ); और उनके धर्म-ग्रंथोंमें ऐसी कथाएँ हैं, कि बुद्धने आम्रपाली नामक किसी वेश्याको और अंगुलीमाल नामके चोरको दीक्षा दी थी। ईसाइयोके धर्म ग्रंथमेंभी यह वर्णन है, कि ईसाके साथ जो दो चोर सूलीपर चढ़ाये गये थे, उनमेसे एक चोर मृत्युके समय ईसाकी शरणमें गया; और ईसाने उसे सद्गति दी ( ल्यूक. २३. ४२, ४३ )। स्वयं ईसानेभी एक स्थानमें कहा है, कि हमारे धर्ममें श्रद्धा रखनेवाली वेश्याएँभी मुक्त हो जाती हैं ( मेथ्यु. २१. ३१; ल्यूक. ७. ५० )। यह बात दसवें प्रकरणमें हम बतला चुके हैं, कि अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिमेभी यही सिद्धान्त निष्पन्न होता है। परंतु यह धर्म-तत्त्व शास्त्रतः यद्यपि निर्विवाद है ; तथापि जिसका सारा जन्म दुराचरणमें व्यतीत हुआ है, उसके अंतःकरणमें केवल मृत्युके समयही अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें जानेकी बुद्धि कैसे जागृत रह सकती है ? ऐसी अवस्थामें अंतः- कालकी वेदनाओंको सहते हुए केवल यंत्रके समान एक बार 'रा' कहकर और कुछ देरसे 'म' कहकर, मुँह खोलने और बंद करनेके परिश्रमके सिवा कुछ अधिक लाभ नहीं होता। इसलिये भगवानने सब लोगोंम निश्चित रीतिसे कहा है, कि “ न केवल मृत्युके समयही किंतु सारे जीवनभर सदैव मेरा स्मरण मनमें रहने दो; और स्वधर्मके अनुसार अपने सब व्यवहारोंको परमेश्वरार्पणबुद्धिसे करते रहो, फिर चाहे तुम किसीभी जातिके रहो, तोभी तुम कर्मोको करते हुएभी मुक्त हो जाओगे ” ( गीता ९. २६-२८, ३०-३४ )। इस प्रकार उपनिषदोंका ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान आबालवृद्ध सभी लोगोंके लिये सुलभ तो कर दिया गया है; परंतु ऐसा करते समय न तो व्यवहारका लोप होने दिया है; और न वर्ण, आश्रम, जाति-पांति अथवा स्त्री-पुरुष आदिका कोईभी भेद रखा गया है। जब हम गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्गकी इस शक्ति अथवा समताकी
४४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ओर ध्यान देते हैं, तब गीताके अंतिम अध्यायमें भगवान्ने प्रतिज्ञापूर्वक गीताशास्त्रका जो उपसंहार किया है, उसका मर्म प्रकट हो जाता है। वह ऐसा है - " सब धर्म छोड़कर मेरे अकेलेकी शरणमें आ जा; मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा, घबराना नहीं।" यहाँपर धर्म शब्दका उपयोग इसी व्यापक अर्थमें किया गया है, कि सब व्यवहारोंको करते हुएभी पाप-पुण्यमे अलिप्त रहकर परमेश्वर-रूपी प्राप्ति या आत्मश्रेय जिस मार्ग प्रत्यक्ष उपायके द्वारा संपादन किया जा सकता है, वही धर्म है। अनुगीताके गुरुशिष्य-संवादमें ऋषियोंने ब्रह्मासे यह प्रश्न किया (अश्व. ४९), कि अहिंसाधर्म, सत्यधर्म, व्रत तथा उपवास ज्ञान, यज्ञयाग, दान, कर्म, संन्यास आदि जो जो अनेक प्रकारके मुक्तिके साधन अनेक लोग बतलाते हैं, उनमेंसे सच्चा साधन कौन है ? शांतिपर्वके (मभा. शां. ३५४) उच्छवृत्ति उपाख्यानमेंभी यह प्रश्न है, कि गार्हस्थ्यधर्म, वानप्रस्थधर्म, राजधर्म, मातृ-पितृसेवा-धर्म, क्षत्रियोंका रणांगणमें मरण, ब्राह्मणोंका स्वाध्याय, इत्यादि जो अनेक धर्म या स्वर्ग-प्राप्तिके साधन शास्त्रोंमें बत- लाये हैं, उनमेंसे ग्राह्य धर्म कौन है ? ये भिन्न धर्म-मार्ग या धर्म दिखनेमें तो परस्पर- विरुद्ध मालूम होते हैं, परंतु शास्त्रकार इन सब प्रत्यक्ष मार्गोंकी योग्यताको एक-सीही समझते हैं, क्योंकि समस्त प्राणियोंमें साम्य-बुद्धि रखनेका जो अंतिम साध्य है, वह इनमेंसे किसीभी धर्मपर प्रीति और श्रद्धाके साथ मनको एकाग्र किये बिना प्राप्त नहीं हो सकता ! तथापि, इन अनेक मार्गोंकी अथवा प्रतीक-उपासनाकी झंझटमें फँसनेसे मन घबग जा सकता है, इसलिये अकेले अर्जुनकोही नहीं; किंतु उसे निमित्त करके सब लोगोंको भगवान् इस प्रकार निश्चित आश्वासन देते हैं, कि चित्त-शुद्धिके इन अनेक धर्म-मार्गोंको छोड़कर "तू केवल मेरी शरणमें आ; मैं तुझे समस्त पापोंसे मुक्त कर दूँगा; डर मत।" साधु तुकारामभी इसी प्रकार सब धर्मोंका निरसन करके अंतमें भगवानसे यही माँगते हैं, कि :- चतुराई चेतना सभी चुल्हेमें जावें, बस मेरा मन एक ईश-चरणाश्रय पावे । आग लगे आचार-विचारोंके उपचयमें, उस विभु का विश्वास सदा दृढ रहे हृदयमें ॥ निश्चयपूर्वक उपदेशकी या प्रार्थनाकी अंतिम सीमा हो चुकी । श्रीमद्भगवद्गीतारूपी सोनेकी थालीका यह भक्तिरूपी अंतिम कौर है, यही प्रेमग्रास है। इसे पा चुके, अब आगे चलिये।
चौदहवाँ प्रकरण गीताध्याय-संगति प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं ऋषिर्नारायणोऽब्रवीत् । * – महाभारत, शांति. ३४७. २ अबतक किये गये विवेचनमे दीख पड़ेगा, कि भगवद्गीतामें अर्थात् भगवानके द्वारा गाये गये उपनिषद्में यह प्रतिपादन किया गया है, कि कर्मोंको करते हुएही अध्यात्मविचारसे या भक्तिसे सर्वात्मैकरूप साम्य-बुद्धि पूर्णतया प्राप्त कर लेना; और उसे प्राप्त कर लेनेपरभी संन्यास लेनेकी झंझटमें न पड़ संसारमें शास्त्रतः प्राप्त सब कर्मोंको केवल अपना कर्तव्य समझकर करते रहनाही, इस संसारमें मनुष्यका परम पुरुषार्थ अथवा जीवन व्यतीत करनेका उत्तम मार्ग है। परंतु जिस क्रमसे हमने इस ग्रंथमें उक्त अर्थका वर्णन किया है, उसकी अपेक्षा गीता ग्रंथका क्रम भिन्न है; इसलिये अब यहभी देखना चाहिये, कि भगवद्गीतामें उस विषयका वर्णन किस प्रकार किया गया है। किसीभी विषयका निरूपण दो रीतियोंसे किया जाता है: एक शास्त्रीय और दूसरी पौराणिक । शास्त्रीय पद्धति वह है, कि जिसके द्वारा तर्क- शास्त्रानुसार साधकबाधक प्रमाणोंको क्रमसहित उपस्थित करके यह दिखला दिया जाता है, कि सब लोगोंकी समझमे सहजही आ सकनेवाली बातोंसे किसी प्रतिपाद्य विषयके मूलतत्त्व किस प्रकार निष्पन्न होते हैं । भूमितिशास्त्र इस पद्धतिका एक अच्छा उदाहरण है; और न्यायसूत्र या वेदान्त-सूत्रका उपपादनभी उसी वर्गका है । इसीलिये भगवद्गीतामें जहाँ ब्रह्मसूत्र याने वेदान्त-सूत्रोंका उल्लेख किया है, वहाँ यहभी वर्णन है, कि उसका विषय हेतुयुक्त और निश्चयात्मक प्रमाणोंसे सिद्ध किया गया है – “ ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ” (गीता १३. ४) परंतु भगवद्गीताका निरूपण सशास्त्र भलेही हो; तथापि वह इस शास्त्रीय पद्धतिमें नहीं किया गया है। भगवद्गीतामें जो विषय है, उसका वर्णन अर्जुन और श्रीकृष्णके संवादरूपमें अत्यंत मनोरंजक और सुलभ रीतिसे किया गया है। इसीलिये प्रत्येक अध्यायके अंतमें “ भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे ” कहकर आगे गीतानिरूपणके स्वरूपके द्योतक ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवादे’ इन शब्दोंका उपयोग किया गया
- “ नारायण ऋषिने धर्मको प्रवृत्तिप्रधान बतलाया है।” नर और नारायण नामक ऋषियोंमेंसेही ये नारायण ऋषि हैं। पहले बतला चुके हैं, कि इन्हीं दोनोंके अवतार श्रीकृष्ण और अर्जुन थे। इसी प्रकार महाभारतका वह वचनभी पहले उद- धृत किया गया है; जिससे यह मालूम होता है, कि गीतामें नारायणीय धर्मकाही प्रतिपादन किया गया है।
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है । इस निरूपणमें और 'शास्त्रीय' निरूपणमें जो भेद है, उसको स्पष्टतासे बतलानेके लिये हमने संवादात्मक निरूपणकोही 'पौराणिक' नाम दिया है । सात सौ श्लोकोंके इस संवादात्मक अथवा पौराणिक निरूपणमे 'धर्म' जैसे व्यापक शब्दमें शामिल होनेवाले सभी विषयोंका विस्तारपूर्वक विवेचन कभी होही नही सकता । परंतु आश्चर्यकी बात है, कि गीतामें जो अनेक विषय उपलब्ध होते हैं, उनकाही संग्रह ( संक्षेपमेंही क्यों न हो ) अविरोधसे कैसे किया जा सका ! इस बातसे गीताकारकी अलौकिक शक्ति व्यक्त होती है; और अनुगीताके आरंभमें जो यह कहा गया है, कि गीताका उपदेश " अत्यंत योगयुक्त चित्तसे " बतलाया गया है, उसकी सत्यताकी प्रतीतिभी हो जाती है । अर्जुनको जो विषय पहलेसेही मालूम थे, उन्हें फिरसे विस्तारपूर्वक कहनेकी कोई आवश्यकता नही थी । उसका मुख्य प्रश्न तो यही था, कि मैं लड़ाईका घोर कृत्य करूं या न करूं ? और करूंभी तो किस प्रकार करूं ? जब श्रीकृष्ण अपने उत्तरमे एकाध युक्ति बतलाते थे, तब अर्जुन उसपर कुछ-न-कुछ आक्षेप किया करता था । इस प्रकारके प्रश्नोत्तररूपी संवादमें गीताका विवेचन स्वभावहीसे कहीं संक्षिप्त और कहीं द्विरुक्त हो गया है । उदाहरणार्थ, त्रिगुणात्मक प्रकृतिके फैलावका वर्णन कुछ थोड़े भेदसे दो जगह है ( गीता अ. ७. १४ ) ; और स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त, त्रिगुणातीत, तथा ब्रह्मभूत इत्यादिकी स्थितिका वर्णन एक-सा होनेपरभी, भिन्न भिन्न दृष्टियोंसे प्रत्येक प्रसंगपर बार बार किया गया है । इसके विपरीत " यदि अर्थ और काम धर्मसे विभक्त न हों, तो वे ग्राह्य हैं " - इस तत्त्वका दिग्दर्शन गीतामें केवल " धर्माविरुद्धः कामोऽस्मि " (गीता ७. ११) इसी एक वाक्यमें कर दिया गया है। इसका परिणाम यह होता है, कि यद्यपि गीतामे सब विषयोंका समावेश किया गया है, तथापि गीता पढ़ते समय उन लोगोंके मन उलझनमें पड़ जाते हैं; जो श्रौत धर्म, स्मार्त धर्म, भागवत धर्म, सांख्यशास्त्र, पूर्वमीमांसा, वेदान्त, कर्म-विपाक इत्यादिके उन प्राचीन सिद्धान्तोंकी परंपरासे परिचित नहीं हैं, कि जिनके आधारपर गीताके ज्ञानका निरूपण किया गया है। और जब गीताके प्रतिपादनकी पद्धति ठीक ठीक ध्यानमें नहीं आती, तब वे लोग कहने लगते हैं कि, गीता मानों बजी- गरकी झोली है; अथवा शास्त्रीय पद्धतिके प्रचारके पूर्व गीताकी रचना हुई होगी; इसलिये उसमे स्थान-स्थानपर अधूरापन और विरोध दीख पड़ता है, अथवा गीताका ज्ञानही हमारी बुद्धिके लिये अगम्य है ! इस संशयको हटानेके लिये यदि टीकाओंका अवलोकन किया जाय, तो उनमेभी कुछ लाभ नहीं होता, क्योंकि वे बहुधा भिन्न भिन्न संप्रदायानुसार बनी हैं ! इसलिये टीकाकारोंके मतोंके परस्पर-विरोधोंकी एकवाक्यता करना असंभव-सा हो जाता है; और पढ़नेवालेका मन अधिकाधिक घबराने लगता है। इस प्रकारके भ्रममें पड़े हुए कई सुप्रबुद्ध पाठकोंको हमने देखा है। इस अड़चनको हटानेके लिये हमने अपनी बुद्धिके अनुसार गीताके प्रतिपाद्य विषयोंका शास्त्रीय क्रम बाँधकर अबतक विवेचन किया है। अब यहाँ इतना और
गीताध्याय-संगति ४४५ बतला देना चाहिये, कि येही विषय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संभाषणमे, अर्जुनके प्रश्नों या शंकाओंके अनुरोधसे, कुछ न्यूनाधिक होकर कैसे उपस्थित हुए हैं। इससे यह विवेचन पूरा हो जायगा; और अगले प्रकरणमें सुगमतासे सब विषयोंका उपसंहार कर दिया जायगा। पाठकोंको प्रथम इस ओर ध्यान देना चाहिये, कि जब हमारा हिंदुस्थान देश ज्ञान, वैभव, यश और स्वराज्यके सुखका अनुभव ले रहा था, उस समय एक सर्वज्ञ, महापराक्रमी, यशस्वी और परमपूज्य क्षत्रियने दूसरे क्षत्रियको, जो महान् धनुर्धारी था, क्षात्र धर्मके स्वकार्यमें प्रवृत्त करनेके लिये गीताका उपदेश किया है। जैन और बौद्ध धर्मोंके प्रवर्तक महावीर और गौतम बुद्धभी क्षत्रियही थे। परंतु इन दोनोंने वैदिक धर्मके केवल संन्यास-मार्गको अंगीकार कर क्षत्रिय आदि सब वर्णोंके लिये संन्यास-धर्मका दरवाजा खोल दिया था; परंतु भगवान् श्रीकृष्णने ऐसा नहीं किया, क्योंकि भागवत-धर्मका यह उपदेश है, कि न केवल क्षत्रियोंको परंतु ब्राह्मणोंकोभी निवृत्ति-मार्गकी शांतिके साथ साथ निष्काम-बुद्धिसे सब कर्म आमरणान्त करते रहनेका प्रयत्न करना चाहिये। किसीभी प्रकारका उपदेश करनेके लिये किसी-न-किसी कारणकी आवश्यकता होती है, और उस उपदेशकी सफलताके लिये शिष्यके मनमें उस उपदेशका ज्ञान प्राप्त कर लेनेकी इच्छाभी प्रथमहीसे जागृत रहनी चाहिये। अतएव इन दोनों बातोंका स्पष्टीकरण करनेके लियेही व्यासजीने, गीताके पहले अध्यायमें, इस बातका विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया है, कि श्रीकृष्णने अर्जुनको यह उपदेश क्यों दिया है। कौरव-पांडवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये तैयार होकर कुरुक्षेत्रपर खड़ी हैं; थोड़ीही देरमें लड़ाई छिड़नेवालीही थी, कि इतनेमें अर्जुनके कहनेसे श्रीकृष्णने उसका रथ दोनों सेनाओंके बीचमें ले जाकर खड़ा कर दिया; और अर्जुनसे कहा, कि “तुझे जिनसे युद्ध करना है, उन भीष्म, द्रोण आदिको देख।” तब अर्जुनने दोनों सेनाओंकी ओर दृष्टि पहुँचाई और देखा, कि अपनेही बापदादा, काका, आजा, मामा, बंधु, पुत्र नाती, स्नेही, आप्त, गुरु, गुरुबंधु आदि दोनों सेनाओंमें खड़े हैं; और इस युद्धमें सब लोगोंका नाश होनेवाला है! लड़ाई एकाएक उपस्थित नहीं हुई थी; लड़ाई करनेका निश्चय पहलेही हो चुका था; और बहुत दिनोंसे दोनों ओरकी सेनाओंका प्रबंध हो रहा था। परंतु इस आपसकी लड़ाईसे होनेवाले कुलक्षयका प्रत्यक्ष स्वरूप जब पहले पहल अर्जुनकी नजरमें आया, तब उसके समान महायोद्धाकेभी मनमें विषाद उत्पन्न हुआ; और उसके मुखसे ये शब्द निकल पड़े, “ओह ! आज हम लोग अपनेही कुलका भयंकर क्षय इसीलिये करनेवाले हैं न, कि राज्य हमींको मिले; इसकी अपेक्षा भिक्षा मांगना क्या बुरा है ?” और इसके बाद उसने श्रीकृष्णसे कहा, कि “शत्रु चाहे मुझे जानसे मार डाले, मुझे इसकी चिंता नहीं; परंतु त्रैलोक्यके राज्यके लियेभी मैं पितृहत्या, गुरुहत्या, बंधुहत्या या कुलक्षयके समान घोर पातक करना नहीं चाहता।” उसकी सारी देह थर-थर काँपने लगी; हाथ-पैर
४४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
शिथिल हो गये; मुह सूख गया; और खिन्नवदन हो अपने हाथका धनुष्यबाण फेंक- कर वह बेचारा रथमें चुपचाप बैठ गया। इतनी कथा पहले अध्यायमें है। इस अध्यायको 'अर्जुन-विषादयोग' कहते हैं। क्योंकि यद्यपि पूरी गीतामें ब्रह्मविद्यान्तर्गत- (कर्म) योगशास्त्र नामक एक ही विषय प्रतिपादित हुआ है; तोभी प्रत्येक अध्यायमें जिस विषयका वर्णन प्रधानतासे किया जाता है, उस विषयको इस कर्म- योग शास्त्रकाही एक भाग समझना चाहिये; और ऐसा समझकरही प्रत्येक अध्यायको उसके विषयानुसार अर्जुन-विषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग इत्यादि भिन्न भिन्न नाम दिये गये हैं। इन सब 'योगों'को एकत्र करनेसे "ब्रह्मविद्याका कर्मयोग- शास्त्र" हो जाता है! पहले अध्यायकी कथाका महत्त्व हम इस ग्रंथके आरंभमें कह चुके हैं। इसका कारण यह है, कि जबतक हम उपस्थित प्रश्नके स्वरूपको ठीक तौरसे जान न लें, तबतक उस प्रश्नका उत्तरभी भली भाँति हमारे ध्यानमें नहीं आता। यदि कहा जाय, कि गीताका यही तात्पर्य है, कि "सांसारिक कर्मोंसे निवृत्त होकर भगवद्भजन करो या संन्यास ले लो;" तो फिर अर्जुनको उपदेश करनेकी कुछ आवश्यकताही न थी, क्योंकि वह तो लड़ाईका घोर कर्म कर भिक्षा माँगनेके लिये आप-ही-आप तैयार हो गया था। पहलेही अध्यायके अंतमें श्रीकृष्णके मुखसे ऐसे अर्थका एक-आध श्लोक कहलाकर वहीं गीताकी समाप्ति कर देनी चाहिये थी, "वाह! क्या ही अच्छा कहा! तेरी इस उपरतीको देख मुझे आनंद मालूम होता है। चल, हम दोनों इस कर्ममय संसारको छोड़ संन्यासाश्रमके द्वारा या भक्तिके द्वारा अपने आत्माका कल्याण कर लें!" फिर, इधर लड़ाई हो जानेपर व्यासजी उसका वर्णन करनेमें तीन वर्षतक (मभा. आ. ६२. ५२) अपनी वाणीका भलेही दुरुपयोग करते रहते; परंतु उसका दोष बेचारे अर्जुन और श्रीकृष्णपर तो आरोपित न हुआ होता। हाँ; यह सच है, कि कुरुक्षेत्रमें जो सैकड़ों महारथी एकत्र हुए थे, वे अवश्यही अर्जुन और श्रीकृष्णका उपहास करते; परंतु जिसको अपने आत्माका कल्याणकर लेना है, वह ऐसे उपहासकी चिंताही क्यों करता? संसार कुछभी कहे; उपनिषदोंमें तो यही कहा है, कि "यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" (जा. ४) - जिस क्षण उपरति हो, उसी क्षण संन्यास धारण करो; विलंब न करो। यदि यह कहा जाय, कि अर्जुनकी उपरति ज्ञानपूर्वक न थी, वह केवल मोहकी थी; तोभी वह थी तो उपरतिही। बस; उपरति होनेसे आधा काम हो चुका, अब मोहको हटाकर उसी उपरतिका पूर्ण ज्ञानमूलक कर देना भगवानके लिये कुछ असंभव बात न थी। भक्ति-मार्गमें या संन्यास-मार्गमेंभी ऐसे अनेक उदाहरण हैं; कि जब कोई किसी कारणसे संसारसे उकता गये, तो वे दुःखित हो इस संसारको छोड़ जंगलमें चल गये; और आगे उन लोगोंने पूरी सिद्धीभी प्राप्त कर ली है। इसी प्रकार अर्जुनकीभी यही दशा कर दी होती। ऐसा तो भी होही नहीं सकता था, कि कभी संन्यास लेनेके समय वस्त्रोंको गेरुआ रंग देनेके लिये मुट्ठीभर लाल मिट्टी, या
भक्तिमें भगवन्नाम-संकीर्तन करनेके लिये झांझ, मृदंग आदि सामग्री सारे कुरु- क्षेत्रमेंभी न मिलती। परंतु ऐसा कुछभी न करके उलटे दूसरे अध्यायके आरंभमेंही श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा है, कि "अरे ! तुझे यह दुर्बुद्धि (कश्मल) कहाँसे सूझ पड़ी? यह नामर्दी (क्लैब्य) तुझे शोभा नहीं देती। यह तेरी कीर्तिको धूलिमें मिला देगी। इसलिये इस दुर्बलताका त्याग कर युद्धके लिये खड़ा हो जा।" परंतु अर्जुनने किसी अबलाकी तरह अपना रोनाधोना जारी रक्खा और वह अत्यंत दीनहीन वाणीमे बोला- "मैं भीष्म, द्रोण आदि महात्माओंको कैसे मारूँ? मेरा मन इसी संशयमें चक्कर खा रहा है, कि मरना भला है, या मारना? इसलिये मुझे यह बतलाओ, कि इन दोनोंमें कौन-सा धर्म श्रेयस्कर है। मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ।" अर्जुनकी इन बातोंको सुनकर श्रीकृष्ण जान गये, कि अब यह मायाके चंगुलमें फँस गया है, इसलिये जग हँसकर उन्होंने उसे 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्' इत्यादि ज्ञान बतलाना आरंभ किया। अर्जुन ज्ञानी पुरुषके सदृश बर्ताव करना चाहता था; और वह कर्म- संन्यासकी बातेंभी करने लग गया था। इसलिये, संसारमें ज्ञानी पुरुषके आचरणके जो दो पंथ अथवा निष्ठाएँ दीख पड़ती हैं-अर्थात्, 'कर्म करना' और 'कर्म छोड़ना' वहींसे भगवान्ने उपदेशका आरंभ किया है; और अर्जुनको पहली बात यही बतलाई है, कि इन दो पंथो या निष्ठाओंमेंसे तू किसीकोभी ले; परंतु तू भूल कर रहा है। इसके बाद, जिस ज्ञान या सांख्यनिष्ठाके आधारपर अर्जुन कर्म-संन्यासकी बातें करने लगा था, उसी सांख्यनिष्ठाके आधारपर श्रीकृष्णने प्रथम 'एषा तेऽभिहिता बुद्धिः" (गीता. २. ११-३९) तक उपदेश किया है, और फिर अध्यायके अंत- तक कर्मयोग-मार्गके अनुसार अर्जुनको यही बतलाया है, कि युद्धही तेरा सच्चा कर्तव्य है। यदि "एषा तेऽभिहिता सांख्ये" सरीखा श्लोक 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्' श्लोकके पहले आता, तो यही अर्थ औरभी अधिक व्यक्त हो गया होता। परंतु संभाषणके प्रवाहमें सांख्य-मार्गका प्रतिपादन हो जानेपर वह इस रूपमें आया है- "यह तो सांख्य-मार्गके अनुसार प्रतिपादन हुआ; अब योगमार्गके अनुसार प्रति- पादन करता हूँ।" कुछभी हो; परंतु अर्थ एकही है। हमने ग्यारहवें प्रकरणमें सांख्य (या संन्यास) और योगका (या कर्मयोग) भेद पहलेही स्पष्ट करके बतला दिया है। इसलिये उसकी पुनरावृत्ति न कर इतनाही कह देते हैं, कि चित्तकी शुद्धताके लिये स्वधर्मानुसार वर्णाश्रम-विहित कर्म करके ज्ञान-प्राप्ति होनेपर मोक्षके लिये अंतमें सब कर्मोंको छोड़ संन्यास लेना सांख्य-मार्ग है; और कर्मोंका कभी त्याग न कर अंततक उन्हें निष्काम बुद्धिसे करते रहना योग अथवा कर्मयोग है। अर्जुनसे भगवान् प्रथम यह कहते हैं, कि सांख्य-मार्गके अध्यात्मज्ञानानुसार आत्मा अविनाशी और अमर है, इसलिये तेरी यह समझ गलत है, कि "मैं भीष्म, द्रोण आदिको मारूँगा।" क्योंकि न तो आत्मा मरता है; और न मारताही है। जिस प्रकार मनुष्य अपने वस्त्र
४५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बदलता है, उसी प्रकार आत्मा एक देह छोड़कर दूसरी देहमें चला जाता है; परंतु इससे उसे मृत मानकर शोक करना उचित नहीं। अच्छा; मान लिया, कि 'मैं मारूँगा' यह भ्रम है, तबभी तू कहेगा, कि युद्धही क्यों करना चाहिये ? तो उसका उत्तर यह है, कि शास्त्रतः प्राप्त हुए युद्धसे परावृत्त न होनाही क्षत्रियोंका धर्म है; और जब कि इस सांख्य-मार्गमें प्रथमतः वर्णाश्रम-विहित कर्म करनाही श्रेयस्कर माना जाता है; तब यदि तू वैसा न करेगा, तो लोग तेरी निंदा करेंगे - अधिक क्या कहें, युद्धमें मरनाही क्षत्रियोंका धर्म है। फिर व्यर्थ शोक क्यों करता है ? "मैं मारूँगा और वह मरेगा" यह केवल कर्मदृष्टि है - इसे छोड़ दे; तू अपना प्रवाहपतित कार्य ऐसी बुद्धिसे करता चला जा, कि मैं केवल स्वधर्म कर रहा हूँ; इससे तुझे कुछभी पाप नहीं लगेगा : यह उपदेश सांख्य मार्गानुसार हुआ। परंतु चित्तकी शुद्धताके लिये प्रथमतः कर्म करके चित्तशुद्धि हो जानेपर अंतमें सब कर्मोंको छोड़ संन्यास लेनाही यदि इस मार्गके अनुसार श्रेष्ठ माना जाता है, तो यह शंका रहही जाती है, कि उपति होतेही युद्धको छोड़ (यदि हो सके तो) एकदम संन्यास ले लेना क्या अच्छा नहीं है ? केवल इतना कह देनेसे काम नहीं चलता, कि मनु आदि स्मृतिकारोंकी आज्ञा है, कि गृहस्था- श्रमके बाद फिर कहीं बुढ़ापेमें संन्यास लेना चाहिये, युवावस्थामें तो गृहस्थाश्रमीही होना चाहिये। क्योंकि किसीभी समय यदि संन्यास लेनाही श्रेष्ठ है, तो ज्योंही संसारसे जी हटा, त्योंही तनिकभी देर न कर संन्यास लेना उचित है; और इसी हेतुसे उपनिषदोंमेंभी ऐसे वचन पाये जाते हैं, कि "ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा" (जा. ४)। संन्यास लेनेसे जो गति प्राप्त होगी, वही युद्धक्षेत्रमें मरनेसे क्षत्रियको प्राप्त होती है। महाभारतमें कहा है :- द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमंडलभेदिनौ । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥ "हे पुरुष-व्याघ्र ! सूर्यमंडलको पार कर ब्रह्मलोकको जानेवाले केवल दोही पुरुष हैं। एक तो योगयुक्त संन्यासी और दूसरा युद्धमें लड़कर मर जानेवाला वीर" (उद्यो. ३२. ६५)। इसी अर्थका एक श्लोक कौटिल्यके, याने चाणक्यके अर्थ- शास्त्रमेंभी है. - यान् यज्ञसंघैस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणः पात्रचयैश्च यान्ति । क्षणेन तानप्यतियान्ति शूराः प्राणान् सुयुद्धेषु परित्यजन्तः ॥ स्वर्गकी इच्छा करनेवाले ब्राह्मण अनेक यज्ञोंसे, यज्ञपात्रोंसे और तपोंसे जिस लोकमें जाते हैं, उस लोककेभी परे युद्धमें प्राण अर्पण करनेवाले शूर पुरुष एक क्षणमें जा पहुँचते हैं - अर्थात् न केवल तपस्वियोंको या संन्यासियोंको वरन् यज्ञयाग आदि करनेवाले दीक्षितोंकोभी जो गति प्राप्त होती है, वही युद्धमें मरनेवाले क्षत्रियकोभी मिलती है (कौटि. १०. ३. १५०-५२; महा. शां. ९८-१००)। "क्षत्रियको
स्वर्गमें जानेके लिये युद्धके समान दूसरा दरवाजा क्वचित्ही खुला मिलता है; युद्धमें मरनेसे स्वर्ग; और जय प्राप्त करनेसे पृथ्वीका राज्य मिलेगा" (२. ३२, ३७) गीताके इस उपदेशका तात्पर्यभी वही है। इसलिये सांख्य-मार्गके अनुसार यहभी प्रतिपादित किया जा सकता है, कि क्या संन्यास लेना और क्या युद्ध करना, दोनोंमें एकही फलकी प्राप्ति होती है। तथापि इस मार्गके युक्तिवादसे यह निश्चि- तार्थ पूर्ण रीतिसे सिद्ध नहीं होता कि "कुछभी हो; युद्ध करनाही चाहिये।" सांख्य- मार्गमें जो यह न्यूनता या दोष है, उसे ध्यानमें रख आगे भगवानने कर्मयोग-मार्गका प्रतिपादन आरंभ किया है; और गीताके अंतिम अध्यायके अंततक इसी कर्मयोगका
- अर्थात् कर्मोंको करनाही चाहिये और मोक्षमें उनसे कोई बाधा नहीं होती; किंतु उन्हें करते रहनेसेही मोक्ष प्राप्त होता है, इसका - भिन्न भिन्न प्रमाण देकर, शंका- निवृत्तिपूर्वक समर्थन किया है। इस कर्मयोगका मुख्य तत्त्व यह है, कि किसीभी कर्मको भला या बुरा कहनेके लिये उस कर्मके बाह्य परिणामोंकी अपेक्षा पहले यह देख-लेना चाहिये, कि कर्ताकी वासनात्मक बुद्धि शुद्ध है अथवा अशुद्ध (गीता २. ४०)। परंतु वासनाकी शुद्धता या अशुद्धताका निर्णयभी तो आखिर व्यवसायात्मका बुद्धिही करती है, इसलिये जबतक निर्णय करनेवाली बुद्धींद्रिय स्थिर और शांत न होगी, तबतक वासनाभी शुद्ध और सम नहीं हो सकती। इसीलिये उसके साथ यहभी कहा है, कि वासनात्मक बुद्धिको शुद्ध करनेके लिये प्रथम समाधिके योगसे व्यवसाया- त्मका बुद्धींद्रियकोभी स्थिर कर लेना चाहिये (गीता २. ४१)। संसारके सामान्य व्यवहारोंकी ओर देखनेसे प्रतीत होता है, कि बहुतेरे मनुष्य स्वर्गादि भिन्न भिन्न काम्य सुखोंकी प्राप्तिके लियेही यज्ञायागादिक वैदिक काम्य कर्मोंकी झंझटमें पड़े रहते हैं, इससे उनकी बुद्धि कभी एक फलकी प्राप्तिमें, तो कभी दूसरेही फलकी प्राप्तिमें, अर्थात् स्वार्थहीमें, निमग्न रहती है, और सदा बदलनेवाली याने चंचल हो जाती है। ऐसे मनुष्योंको स्वर्ग-सुखादिक अनित्य फलकी अपेक्षा अधिक महत्त्वका अर्थात् मोक्षरूपी नित्य सुख कभी प्राप्त नहीं हो सकता। इसीलिये अब अर्जुनको कर्मयोग-मार्गका रहस्य इस प्रकार बतलाया गया है, कि वैदिक कर्मोंके काम्य झगड़ोंको छोड़ दे और निष्काम बुद्धिसे कर्म करना सीखे। तेरा अधिकार केवल कर्म करने भरकाही है - कर्मके फलकी प्राप्ति अथवा अप्राप्ति तेरे अधिकारकी बात नहीं है (२. ४७)। ईश्वरकोही फलदाता मानकर जब इस सम-बुद्धिसे - कि कर्मका फल मिले अथवा न मिले, दोनों समान हैं - केवल स्वकर्तव्य समझकरही जो कर्म किये जाते हैं; उन कर्मोंके पाप-पुण्यका लेप कर्ताको नहीं होता। इसलिये तू इस सम-बुद्धिका आश्रय कर। इस सम-बुद्धिकोही योग - अर्थात् पापके भागी न होते हुए कर्म करनेकी युक्ति - कहते हैं। यदि तुझे यह योग सिद्ध हो जाय, तो कर्म करनेपरभी तुझे मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी: मोक्षके लिये कुछ कर्म-संन्यासहीकी आवश्यकता नहीं है (गीता २. ४७-५३)। जब भगवानने अर्जुनसे कहा, कि जिस मनुष्यकी बुद्धि इस प्रकार गी. र. २९
४५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सम हो गई हो, उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं (गीता २. ५३); तब अर्जुनने पूछा, कि “महाराज ! कृपा कर बतलाइये, कि स्थितप्रज्ञका बर्ताव कैसा होता है?” इसलिये दूसरे अध्यायके अंतमें स्थितप्रज्ञका वर्णन किया गया है; और अंतमें कहा गया है, कि स्थितप्रज्ञकी स्थितिकोही ब्राह्मी स्थिति कहते हैं। सारांश यह है, कि अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये गीतामें जो उपदेश दिया गया है, उसका प्रारंभ इन दो निष्ठाओंसे किया गया है, कि जिन्हें इस संसारके ज्ञानी मनुष्योंने ग्राह्य माना है; और जिन्हें ‘कर्म छोड़ना’ (सांख्य) और ‘कर्म करना’ (योग) कहते हैं; तथा युद्ध करनेकी आवश्यकताकी उपपत्ति पहले सांख्यनिष्ठाके अनुसार बतलाई गई है। परंतु जब यह देखा गया, कि इस उपपत्तिसे काम नहीं चलता, यह अधूरी है, तब फिर तुरंतही योग या कर्मयोग-मार्गके अनुसार ज्ञान बतलाना आरंभ किया है; और यह बतलानेके पश्चात्, कि इस कर्मयोगका अल्प आचरणभी कितना श्रेयस्कर है, दूसरे अध्यायमें भगवान्ने अपने उपदेशको इस स्थानतक पहुँचा दिया है, कि कर्मयोग-मार्गमें कर्मकी अपेक्षा वह बुद्धिही श्रेष्ठ मानी जाती है, जिससे कर्म करनेकी प्रेरणा हुआ करती है; तो अब स्थितप्रज्ञकी नाईं तू अपनी बुद्धिको सम करके अपना कर्म कर; जिससे तू कदापि पापका भागी न होगा। अब देखना है, कि आगे कौन-कौनसे प्रश्न उपस्थित होते हैं। गीताके सारे उपपादनकी जड़ दूसरे अध्यायमेही है, इसलिये इसके विषयका विवेचन यहाँ कुछ विस्तारसे किया गया है। तीसरे अध्यायके आरंभमे अर्जुनने प्रश्न किया है, कि “यदि कर्मयोग-मार्गमेंभी कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ मानी जाती है, तो मै अभी स्थितप्रज्ञकी नाई अपनी बुद्धि- को सम किये लेता हूँ, फिर आप मुझसे इस युद्धके समान घोर कर्म करनेके लिये क्यों कहते हैं?” इसका कारण यह है, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धिको श्रेष्ठ कह देनेसेही इन प्रश्नोंका निर्णय नहीं हो जाता, कि “युद्ध क्यों करें? बुद्धिको सम रखकर उदा- सीन क्यों न बैठे रहें?” बुद्धिको सम रखनेपरभी कर्म-संन्यास किया जा सकता है। फिर जिस मनुष्यकी बुद्धि सम हो गई है, उसे सांख्य-मार्गके अनुसार कर्मोंका त्याग करनेमे क्या हर्ज है? इस प्रश्नका उत्तर भगवान् इस प्रकार देते हैं, कि पहले तुझे सांख्य और योग नामक दो निष्ठाएं बतलाई हैं सही, परंतु यहभी स्मरण रहे, कि किसी मनुष्यके कर्मोंका सर्वथा छूट जाना असंभव है। जबतक वह देहधारी है, तबतक प्रकृति स्वभावतः उससे कर्म करावेगीही; और जब कि प्रकृतिके ये कर्म छूटतेही नहीं हैं, तब तो इंद्रियनिग्रहके द्वारा बुद्धिको स्थिर और सम करके केवल कर्मेंद्रियोंसेही अपने सब कर्तव्य-कर्मोंको करते रहना अधिक श्रेयस्कर है। इसलिये तू कर्म कर, यदि कर्म नहीं करेगा, तो तुझे खानेतकको न मिलेगा (गीता ३. ३-८)। ईश्वरनेही कर्मको उत्पन्न किया है; मनुष्यने नहीं। जिस समय ब्रह्म- देवने सृष्टि और प्रजाको उत्पन्न किया, उसी समय उसने ‘यज्ञ’कोभी उत्पन्न किया था; और उसने प्रजासे यह कह दिया था, कि यज्ञके द्वारा तुम अपनी समृद्धि कर
लो। जब कि ये यज्ञ बिना कर्म किये सिद्ध नहीं होते; तो अब यज्ञको कर्मही कहना चाहिये। इसलिये यह सिद्ध होता है, कि मनुष्य और कर्म साथही साथ उत्पन्न हुए हैं। परंतु ये कर्म केवल यज्ञके लियेही हैं; और यज्ञ करना मनुष्यका कर्तव्य है, इसलिये इन कर्मोंके फल मनुष्यको बंधनमें डालनेवाले नहीं होते। अब यह सच है, कि जो मनुष्य पूर्ण ज्ञानी हो गया, स्वयं उसके लिये कोईभी कर्तव्य शेष नहीं रहता; और न लोगोंमेंभी उसका कुछ अटका रहता है। परंतु इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं हो जाता, कि कर्म मत करो। क्योंकि कर्म करनेसे किसीकोभी छुटकारा न मिलनेके कारण यही अनुमान करना पड़ता है, कि यदि स्वार्थके लिये न हो; तोभी अब उसी कर्मको निष्काम बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये (गीता ३. १७-१९)। इन्हीं बातोंपर ध्यान देकर प्राचीन कालमें जनक आदि ज्ञानी पुरुषोंने कर्म किये हैं; और मैंभी कर रहा हूँ। इसके अतिरिक्त यहभी स्मरण रहे, कि ज्ञानी पुरुषोंके कर्तव्योंमेंसेही एक मुख्य कर्तव्य है, 'लोकसंग्रह करना' अर्थात् अपने बर्तावसे लोगोंको सन्मार्गकी शिक्षा देना और उन्हें उन्नतिके मार्गमें लगा देना, ज्ञानी पुरुषहीका कर्तव्य है। मनुष्य कितनाही ज्ञानवान् क्यों न हो जावे; परंतु प्रकृतिके व्यवहारोंसे उसका छुटकारा नहीं है, इसलिये कर्म छोड़ना तो दूरही रहा; परंतु कर्तव्य समझकर स्वधर्मानुसार कर्म करते रहना और आवश्यकता होनेपर उसीमें मर जानाभी श्रेयस्कर है (गीता. ३. ३०-३५); - इस प्रकार तीसरे अध्यायमें भगवान्ने उपदेश दिया है। भगवान्ने इस प्रकार प्रकृतिको सब कामोंका कर्तृत्व दे दिया, यह देख अर्जुनने प्रश्न किया, कि मनुष्य, इच्छा न रहनेपरभी पाप, क्यों करता है ? तब भगवान्ने यह उत्तर देकर अध्याय समाप्त कर दिया है, कि काम-क्रोध आदि विकार बलात्कारसे मनको भ्रष्ट कर देते हैं; अतएव अपनी इंद्रियोंका निग्रह करके प्रत्येक मनुष्यको अपना मन अपने अधीन रखना चाहिये। सारांश, स्थितप्रज्ञकी नाईं बुद्धिकी समता हो जानेपरभी कर्मसे किसीका छुटकारा नहीं, अतएव यदि स्वार्थके लिये न हो, तोभी लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे कर्म करतेही रहना चाहिये - इस प्रकार कर्मयोगकी आवश्यकता सिद्ध की गई है; और भक्ति-मार्गके परमेश्वरार्पणपूर्वक कर्म करनेके इस तत्त्वकाभी, " कि मुझे सब कर्म अर्पण कर " (गीता ३. ३०-३१) - इसी अध्यायमें प्रथम उल्लेख हो गया है। परंतु यह विवेचन तीसरे अध्यायमें पूरा नहीं हुआ; इसलिये चौथा अध्यायभी उसी विवेचनके लिये आरंभ किया गया है। किसीके मनमें यह शंका न आने पाये, कि अबतक किया गया प्रतिपादन केवल अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लियेही नूतन रचा गया होगा, इसलिये चौथे अध्यायके आरंभमें इस कर्मयोगकी अर्थात् भागवत या नारायणीय धर्मकी त्रेतायुगवाली परंपरा बतलाई गई है। जब श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा, कि आदौ याने युगके आरंभमें मैंनेही यह कर्मयोग-मार्ग विवस्वान्को, विव- स्वान्ने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको बतलाया था, परंतु इस बीचमें यह नष्ट हो गया
४५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र था; इसलिये मैंने वही योग (कर्मयोग-मार्ग) तुझे फिरसे बतलाया है। तब अर्जुनने पूछा, कि आप विवस्वानके पहले कैसे होगे ? इसका उत्तर देते हुए भगवानने बतलाया है, कि साधुओंकी रक्षा, दुष्टोंका नाश और धर्मकी संस्थापना करनाही मेरे अवतारोंका प्रयोजन है, एवं इस प्रकार लोकसंग्रहकारक कर्मोंको करते हुएभी उनमें मेरी कुछ आसक्ति नहीं है, इसलिये मैं उनके पापपुण्यादि फलोंका भागी नहीं होता । इस प्रकार कर्मयोगका समर्थन करके और यह उदाहरण देकर कि प्राचीन समयमें जनक आदिनेभी इसी तत्त्वको ध्यानमें लाकर कर्मोंका आचरण किया है; भगवानने अर्जुनको फिर यही उपदेश दिया है, कि "तूभी वैसेही कर्म कर।" तीसरे अध्यायमें मीमांसकोंका जो सिद्धान्त बतलाया गया था, कि "यज्ञके लिये किये गये कर्म बंधक नहीं होते" उसीको अब फिरसे बतलाकर 'यज्ञ'की विस्तृत और व्यापक व्याख्या इस प्रकारकी है-केवल तिल और चावलको जलाना अथवा पशुओंको मारना एक प्रकारका यज्ञ है सही; परंतु यह द्रव्यमय यज्ञ हलके दर्जेका है, और संयमाग्निमें कामक्रोधादि इंद्रिय-वृत्तियोंको जलाना अथवा 'न मम' कहकर सब कर्मोंको ब्रह्ममें स्वाहा कर देना ऊँचे दर्जेका यज्ञ है। इसलिये अब अर्जुनको ऐसा उपदेश किया है, कि तू इस ऊँचे दर्जेके यज्ञके लिये फलाशाका त्याग करके कर्म कर। क्योंकि मीमांसकोंके न्यायके अनुसार यज्ञार्थ किये गये कर्म यदि स्वतंत्र रीतिसे बंधक न हों, तोभी यज्ञका कुछ-न-कुछ फल बिना प्राप्त हुए नहीं रहता, इसलिये यज्ञभी यदि निष्काम बुद्धिसेही किया जावे, तो उसके लिये किया गया कर्म और स्वयं यज्ञ दोनों बंधक न होंगे। अंतमें कहा है, कि साम्य-बुद्धि उसे कहते हैं, जिससे यह ज्ञान हो जावे, कि सब प्राणी अपनेमें या भगवानमें हैं। जब ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तभी सब कर्म भस्म हो जाते हैं; और कर्ताको उनकी कुछ बाधा नहीं होती। "सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते" - सब कर्मोंका लय ज्ञानमें हो जाता है; कर्म स्वयं बंधक नहीं होते, बंध केवल अज्ञानसे उत्पन्न होता है। इसलिये अर्जुनको यह उपदेश देकर, इस अध्यायको पूरा किया गया है, कि अज्ञानको छोड़ कर्मयोगका आश्रय कर; और लड़ाईके लिये खड़ा हो जा। सारांश, इस अध्यायमें ज्ञानकी इस प्रकार प्रस्तावना की गई है, कि कर्मयोग-मार्गकी सिद्धिके लियेभी साम्य-बुद्धिरूप ज्ञानकी आवश्यकता है। कर्मयोगकी आवश्यकता क्या है या कर्म क्यों किये जावें ? इसके कारणोंका विचार तीसरे और चौथे अध्यायमें किया गया है सही; परंतु दूसरे अध्यायमें सांख्य- ज्ञानका वर्णन करके कर्मयोगके विवेचनमेंभी बारबार कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ बतलाई गयी है, इसलिये यह बतलाना अब अत्यंत आवश्यक है, कि इन दो मार्गोंमें कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है। क्योंकि यदि दोनों मार्ग एक-सी योग्यताके कहे जायें, तो परिणाम यह होगा, कि जिसे जो मार्ग अच्छा लगेगा वह उसीको अंगीकार कर लेगा, केवल कर्मयोगकोही स्वीकार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। अर्जुनके
गीताध्याय-संगति ४५३ मनमें यही शंका उत्पन्न हुई, इसलिये उसने पाँचवे अध्यायके आरंभमें भगवान्से पूछा है, कि “सांख्य और योग, इनदोनों निष्ठाओंको एकत्र करके मुझे उपदेश कीजिये, मुझे केवल इतनाही निश्चयात्मक बतला दीजिये, कि इन दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है, जिससे कि मैं सहजही उसके अनुसार बर्ताव कर सकूँ।” इसपर भगवान्ने स्पष्ट रीतिसे यह कहकर अर्जुनका संदेह दूर कर दिया है, कि यद्यपि दोनों मार्ग निःश्रेयस्कर हैं, अर्थात् एक-सेही मोक्षप्रद हैं, तथापि उनमें कर्मयोगकी योग्यता अधिक है- “कर्मयोगो विशिष्यते” (गीता ५. २)। इसी सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये भगवान् औरभी कहते हैं, कि संन्यास या सांख्यनिष्ठासे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोगसेभी मिलता है। इतनाही नहीं, परंतु कर्मयोगमें जो निष्काम बुद्धि बतलाई गई है, उसे बिना प्राप्त किये संन्यास सिद्ध नहीं होता; और जब वह प्राप्त हो जाती है, तब योग-मार्गसे कर्म करते रहनेपरभी ब्रह्म-प्राप्ति अवश्य हो जाती है। फिर यह झगड़ा करनेसे क्या लाभ है, कि सांख्य और योग भिन्न भिन्न हैं? यदि हम चलना, बोलना, देखना, सुनना, सूंघना इत्यादि सैकड़ों कर्मोंको छोड़ना चाहें, तोभी वे नहीं छूटते, इस दशामें कर्मोंको छोड़नेका हठ न कर उन्हें ब्रह्मार्पण बुद्धिसे करते रहनाही बुद्धिमत्ताका मार्ग है। इसलिये तत्त्वज्ञानी पुरुष निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहते हैं; और अंतमें उन्हींके द्वारा मोक्षकी प्राप्ति कर लिया करते हैं। ईश्वर तुमसे न यह कहता है, कि कर्म करो; और न यह कहता है, कि उनका त्याग कर दो ! यह तो सब प्रकृतिकी क्रीड़ा है; और बंधक मनका धर्म है, इसलिये जो मनुष्य सम-बुद्धिसे अथवा, 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' होकर कर्म किया करता है, उसे उन कर्मोंकी बाधा नहीं होती। अधिक क्या कहें; इस अध्यायके अंतमें यहभी कहा है, कि जिसकी बुद्धि कुत्ता, चांडाल, ब्राह्मण, गौ, हाथी इत्यादिके प्रति सम हो जाती है, और जो सर्वभूतान्तर्गत आत्माकी एकताको पहचान कर अपने व्यवहार करने लगता है, उसे बैठे-बिठाये ब्रह्मानिर्वाणरूपी मोक्ष प्राप्त हो जाता है - मोक्ष- प्राप्तिके लिये उसे कहीं भटकना नहीं पड़ता; वह सदामुक्तही है। छठे अध्यायमें वही विषय आगे चल रहा है; और उसमें कर्मयोगकी सिद्धिके लिये आवश्यक सम-बुद्धिकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन है। पहलेही श्लोकमें भगवान्ने अपना मत स्पष्ट बतला दिया है, कि जो मनुष्य कर्मफलकी आशा न रख, केवल कर्तव्य समझकर सन्मार्गके प्राप्त कर्म करता रहता है, वही सच्चा योगी और सच्चा संन्यासी है; जो मनुष्य अग्निहोत्र आदि कर्मोंका त्यागकर चुपचाप बैठा रहे, वह सच्चा संन्यासी नहीं है। इसके बाद भगवान्ने आत्मस्वतंत्रताका इस प्रकार वर्णन किया है, कि कर्मयोग-मार्गमें बुद्धिको स्थिर करनेके लिये इन्द्रियनिग्रहरूपी जो कर्म करना पड़ता है, उसे स्वयं आपही करे; यदि कोई ऐसा न करे, तो किसी दूसरेपर उसका दोषारोपण नहीं किया जा सकता। इसके आगे इस अध्यायमें इंद्रियनिग्रह- रूपी योगकी साधनाका, पातंजलयोगकी दृष्टिसे, मुख्यतः वर्णन किया गया है।
४५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परंतु यम-नियम-आसन-प्राणायाम आदि साधनोंके द्वारा यद्यपि इंद्रियोंका निग्रह किया जावे, तोभी उतनेमेही काम नहीं चलता, इसलिये आत्मैक्यज्ञानकीभी आवश्यकताके विषयमें इसी अध्यायमें कहा गया है, कि आगे उस पुरुषकी वृत्ति "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" अथवा "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति" (गीता ६. २९, ३०) इस प्रकार सब प्राणियोंमें सम हो जानी चाहिये। इतनेमें अर्जुनने यह शंका उपस्थित की, कि यदि यह साम्यबुद्धिरूपी योग एक जन्ममें सिद्ध न हो, तो फिर दूसरे जन्ममेंभी आरंभहीमे उसका अभ्यास करना होगा - और फिरभी वही दशा होगी - और इस प्रकार यदि यह चक्र हमेशा चलताही रहे, तो मनुष्यको इस मार्गके द्वारा सद्गति प्राप्त होना असंभव है। इस शंकाका निवारण करनेके लिये भगवानने पहले यह कहा है, कि योगमार्गमें कुछभी व्यर्थ नहीं जाता। पहले जन्मके संस्कार शेष रह जाते हैं; और उनकी सहायतासे दूसरे जन्ममें अधिक अभ्यास होता है, तथा क्रम-क्रमसे अंतमे सिद्धि मिल जाती है। इतना कहकर भगवानने इस अध्यायके अंतमे अर्जुनको पुनः यह निश्चित और स्पष्ट उपदेश किया है, कि कर्मयोग-मार्गही श्रेष्ठ और क्रमशः सुसाध्य है, इसलिये केवल (अर्थात् फलाशाको न छोड़ते हुए) कर्म करना, तपश्चर्या करना, ज्ञानके द्वारा कर्मसंन्यास करना इत्यादि सब मार्गोंको छोड़ दे, और तू योगी हो जा - अर्थात् निष्काम कर्मयोग- मार्गका आचरण करने लग। कुछ लोगोंका मत है, कि यहाँ अर्थात् पहले छः अध्यायोंमें कर्मयोगका विवेचन पूरा हो गया और इसके आगे ज्ञान और भक्तिको 'स्वतंत्र' निष्ठा मानकर भगवानने उनका वर्णन किया है - अर्थात् ये दोनों निष्ठाएँ परस्पर निरपेक्ष या कर्मयोगकी बराबरी की, परंतु उससे पृथक् और उसके बदले विकल्पके नातेसे आचरणीय हैं। सातवे अध्यायसे बारहवें अध्यायतक भक्तिका और आगे शेष छः अध्यायोंमें ज्ञानका वर्णन किया गया है; और इस प्रकार अठारह अध्यायोंके विभाग करनेसे कर्म, भक्ति और ज्ञानमेसे प्रत्येकके हिस्सेमे छः छः अध्याय आते हैं; तथा गीताके समान भाग हो जाते हैं। परंतु यह मत ठीक नहीं है। पाँचवें अध्यायके आरंभके श्लोकोंसे स्पष्ट मालूम हो जाता है, कि जब अर्जुनकी मुख्य शंका यही थी, कि "मैं सांख्यनिष्ठाके अनुसार युद्ध करना छोड़ दूँ, या युद्धके भयंकर परिणामको प्रत्यक्ष दृष्टिके सामने देखते हुएभी युद्धही करूँ? और यदि युद्धही करना पड़े, तो उसके पापसे कैसे बचूँ?" - तब उसका समाधान ऐसे अधूरे और अनिश्चित उत्तरसे कभी होही न सकता था, कि "ज्ञानसे मोक्ष मिलता है; और वह कर्मसेभी प्राप्त हो जाता है; अथवा यदि तेरी इच्छा हो, तो भक्ति नामकी एक और तीसरी निष्ठाभी है।" इसके अतिरिक्त यह माननाभी ठीक न होगा, कि जब अर्जुन किसी एकही निश्चयात्मक मार्गको जानना चाहता है, तब सर्वज्ञ और चतुर श्रीकृष्ण उसके प्रश्नके मूल स्वरूपको छोड़कर उसे तीन स्वतंत्र और विकल्पात्मक मार्ग बतला दें। सच बात तो यह है,
गीताध्याय-संगति ४५५
कि गीतामें 'कर्मयोग' और 'संन्यास' इन्ही दो निष्ठाओंका विचार है (गीता ५. १); और यहभी साफ़ साफ़ बतला दिया है, कि इनमेंसे 'कर्मयोग'ही अधिक श्रेयस्कर है (गीता ५. २)। भक्तिकी तीसरी निष्ठा तो कही बतलाईभी नहीं गई है। अर्था यह कल्पना सांप्रदायिक टीकाकारोंकी मनगढंत है, कि ज्ञान, कर्म और भक्ति तीन स्वतंत्र निष्ठाएँ हैं; और उनकी यह समझ होनेके कारण, कि गीतामें केवल मोक्षके उपायोंकाही वर्णन किया गया है, उन्हें ये तीन निष्ठाएं कदाचित् भागवतमें सूझी हों (भाग. ११. २०. ६)। परंतु टीकाकारोंके ध्यानमें यह बात नही आई, कि भागवत-पुराण और भगवद्गीताका तात्पर्य एक नहीं है। यह सिद्धान्त भागवतकार कोभी मान्य है, कि केवल कर्मोंसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, मोक्षके लिये ज्ञानकी आवश्यकता रहती है। परंतु इसके अतिरिक्त, भागवत-पुराणका यह भी कथन है, कि यद्यपि ज्ञान और नैष्कर्म्य मोक्षदायक हो, तथापि ये दोनों (अर्थात् गीता-प्रति- पादित निष्काम कर्मयोग) भक्तिके बिना शोभा नहीं देते - "नैष्कर्म्यमप्यच्युत- भाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम्" (भाग. १२. १२. ५२; १. २. १२)। इस प्रकार देखा जाय तो स्पष्ट प्रकट होता है, कि भागवतकार केवल भक्तिकोही सच्ची निष्ठा अर्थात् अंतिम मोक्षप्रद स्थिति मानते हैं। भागवतका न तो यह कहना है, कि भगवद्भक्तोंको ईश्वरार्पण बुद्धिसे कर्म करनाही नहीं चाहिये; और न यह कहना है, कि करनाही चाहिये। भागवत-पुराणका सिर्फ यह कहना है, कि निष्काम कर्म करो अथवा न करो - ये सब भक्तियोगकेही भिन्न भिन्न प्रकार हैं (भाग. ३. २९. ७-१९)। भक्तिके अभावमें सब कर्मयोग पुनः संसारमें अर्थात् जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाले हो जाते हैं (भाग. १. ५. ३४, ३५)। सारांश, यह है, कि भागवतकारका मार्ग विशेषतः भक्तिपरही होनेके कारण उन्होंने निष्काम कर्मयोग- कोभी भक्तियोगमेंही ढकेल दिया है; और यह प्रतिपादन किया है, कि अकेली भक्तिही सच्ची निष्ठा है ! परंतु भक्तिही कुछ गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय नहीं है। इसलिये भागवतके उपर्युक्त सिद्धान्त या परिभाषाको गीतामें घुसेड़ देना वैसेही अयोग्य है, जैसे कि आममें शरीफेकी कलम लगाना। गीता इस बातको पूरी तरह मानती है, कि परमेश्वरके ज्ञानके सिवा और किसीभी अन्य उपायसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, और इस ज्ञानकी प्राप्तिके लिये भक्ति एक सुगम मार्ग है, परंतु इसी मार्गके विषयमे आग्रह न कर गीता यहभी कहती है, कि मोक्षप्राप्तिके लिये जिस ज्ञानकी आवश्यकता है, उसकी प्राप्ति, जिसे जो मार्ग सुगम हो, वह उसी मार्गसे कर ले। गीताका मुख्य विषय तो यही है, कि अंतमें अर्थात् ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर मनुष्य कर्म करे अथवा न करे। इसलिये संसारमें जीवन्मुक्त पुरुषोंके जीवन व्यतीत करनेके जो दो मार्ग दीख पड़ते हैं - अर्थात् कर्म करना और कर्म छोड़ना - वहींसे गीताके उपदेशका आरंभ किया गया है। इनमेंसे पहले मार्गको गीताने भागवतकारकी नाई 'भक्तियोग' यह नया नाम नहीं दिया है; किंतु नारायणीय धर्ममें प्रचलित प्राचीन
४५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नामही - अर्थात् ईश्वरार्पण-बुद्धिसे कर्म करनेको 'कर्मयोग' या 'कर्मनिष्ठा' और ज्ञानोत्तर कर्मोंका त्याग करनेको 'सांख्य' या 'ज्ञाननिष्ठा', यही नाम गीतामें स्थिर रखे गये हैं। गीताकी इस परिभाषाको स्वीकार कर यदि विचार किया जाय, तो दीख पड़ेगा, कि ज्ञान और कर्मकी बराबरीकी भक्ति नामक कोई तीसरी स्वतंत्र निष्ठा कदापि नहीं हो सकती । इसका कारण यह है, कि 'कर्म करना' और 'न करना' अर्थात् 'छोड़ना' (योग और सांख्य) ऐसे अस्तिनास्तिरूप दो पक्षोंके अतिरिक्त कर्मके विषयमें तीसरा पक्षही अब बाकी नहीं रहता । इसलिये यदि गीताके अनुसार किसी भक्तिमान् पुरुषकी निष्ठाके विषयमें निश्चय करना हो, तो यह निर्णय केवल इसी बातसे नहीं किया जा सकता, कि वह भक्तिभावमें लगा हुआ है, परंतु इस बातका विचार किया जाना चाहिये, कि वह कर्म करता है या नहीं । भक्ति परमेश्वर- प्राप्तिका एक सुगम साधन है और साधनके नातेसे यदि भक्तिहीको 'योग' कहें (गीता १४. २६), तो वह अंतिम 'निष्ठा' नहीं हो सकती । भक्तिके द्वारा परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपर जो मनुष्य कर्म करेगा, उसे 'कर्मनिष्ठ' और जो न करेगा, उसे 'सांख्यनिष्ठ' कहना चाहिये, पाँचवें अध्यायमें भगवानने अपना यह अभिप्राय स्पष्ट बतला दिया है, कि उक्त दोनों निष्ठाओंमें कर्म करनेकी निष्ठा अधिक श्रेयस्कर है। परंतु कर्मपर संन्यास-मार्गवालोंका यह महत्त्वपूर्ण आक्षेप है, कि परमेश्वरका ज्ञान होनेमें कर्मसे प्रतिबंध होता है; और परमेश्वरके ज्ञानबिना तो मोक्षकी प्राप्तिही नहीं हो सकती, इसलिये कर्मोंका त्यागही करना चाहिये । पाँचवें अध्यायमें सामान्यतः यह बतलाया गया है, कि उपर्युक्त आक्षेप असत्य है; और संन्यास-मार्गसे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोग-मार्गसेभी मिलता है (गीता ५. ५) परंतु वहाँ इस सामान्य सिद्धान्तका कुछभी स्पष्टीकरण नहीं किया गया था, इसलिये अब भगवान् उस बचे हुए तथा महत्त्वपूर्ण विषयका विस्तृत निरूपण कर रहे हैं, कि कर्म करते रहनेहीसे परमेश्वरके ज्ञानकी प्राप्ति होकर मोक्ष किस प्रकार मिलता है । इसी हेतुसे सातवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनसे यह न कहकर, कि मैं तुझे भक्ति नामक एक स्वतंत्र तीसरी निष्ठा बतलाता हूं, भगवान् यह कहते हैं, कि :- मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ "हे पार्थ ! मुझमें चित्तको स्थिर करके और मेरा आश्रय लेकर योग याने कर्म- योगका आचरण करते समय, 'यथा' अर्थात् जिस रीतिसे मुझे संदेहरहित पूर्णतया जान सकेगा, वह (रीति तुझे बतलाता हूँ) सुन" (गीता. ७ १) ; और इसीको आगेके श्लोकमें 'ज्ञानविज्ञान' कहा है (गीता ७. २) । इनमेंसे पहले अर्थात् ऊपर दिये गये 'मय्यासक्तमनाः' श्लोकके 'योगं युंजन' - अर्थात् "कर्मयोगका आचरण करते हुए" - ये पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। परंतु किसीभी टीकाकारने इनकी ओर
विशेष ध्यान नहीं दिया है । 'योग' अर्थात् वही कर्मयोग है, कि जिसका वर्णन पहले छः अध्यायोंमें किया जा चुका है; और इस कर्मयोगका आचरण करते हुए जिस विधि या रीतिसे भगवान्का पूरा ज्ञान हो जायगा, उस रीति या विधिका वर्णन अब याने सातवें अध्यायमे प्रारंभ करना है- यही इस श्लोकका अर्थ है । अर्थात् पहले छः अध्यायोंका अगले अध्यायोंमे संबंध बतलानेके लिये यह श्लोक जानबूझकर सातवे अध्यायके आरंभमें रखा गया है । इसलिये इस श्लोकके अर्थकी ओर ध्यान न देकर यह कहना बिलकुल अनुचित है, कि "पहले छः अध्यायोंके बाद भक्तिनिष्ठाका स्वतंत्र रीतिमे वर्णन किया गया है।" केवल इतनाही नहीं, वरन् यहभी कहा जा सकता है, कि इस श्लोकमें 'योगं युञ्जन्' पद जानबूझकर इसी लिये रखे गये हैं, कि जिससे कोई ऐसा विपरीत अर्थ न करने पावे । गीताके पहले पाँच अध्यायोंमें कर्मकी आवश्यकता बतलाकर सांख्य-मार्गकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ कहा गया है; और इसके बाद छठे अध्यायमें पातंजलयोगके साधनोंका वर्णन किया गया है, जो कर्म- योगमें इंद्रियनिग्रह कर्मयोगके लिये आवश्यक है । परंतु इतनेहीसे कर्मयोगका वर्णन पूरा नहीं हो जाता । इंद्रियनिग्रह मानो कर्मेंद्रियोंसे एक प्रकारकी कसरत करना है । यह सच है, कि अभ्यासके द्वारा इंद्रियोंको हम अपने अधीन रख सकते हैं; परंतु यदि मनुष्यकी वासनाही बुरी होगी, तो इंद्रियोंको काबूमें रखनेसे कुछभी लाभ नही होगा । क्योंकि देखा जाता है, कि दुष्ट वासनाओके कारण कुछ लोग इसी इंद्रियनिग्रहरूप सिद्धिका जारण-मारण आदि दुष्कर्मोंमें उपयोग किया करते हैं । इसलिये छठे अध्यायमें कहा है, कि इंद्रियनिग्रहके साथही वासनाभी "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" की नाई शुद्ध हो जानी चाहिये (गीता ६. २९); और ब्रह्मात्मैक्यरूप परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपकी पहचान हुए बिना वासनाकी इस प्रकार शुद्धता होना असंभव है । तात्पर्य यह है, कि जो इंद्रियनिग्रह कर्मयोगके लिये आवश्यक है, वह भलेही प्राप्त हो जाय; परंतु 'रस' अर्थात् विषयोंकी चाह मनमें ज्यों-की-त्यों बनीही रहती है। इस रस अथवा विषयवासनाका नाश करनेके लिये परमेश्वरसंबंधी पूर्ण ज्ञानकीही आवश्यकता है-यह बात गीताके दूसरे अध्यायमें कही गई है (गीता २. ५९) । इसलिये कर्मयोगका आचरण करते हुएही जिस रीति अथवा विधिसे परमेश्वरका यह ज्ञान प्राप्त होता है, उसी विधिका अब भगवान् सातवें अध्यायसे वर्णन करते हैं।"कर्मयोगका आचरण करते हुए"-इस पदमे यहभी सिद्ध होता है, कि कर्मयोगके जारी रहतेही इस ज्ञानकी प्राप्ति कर लेनी है, उसके लिये कर्मोंको छोड़ नहीं बैठना है; और इसीसे यह कहनाभी निर्मूल हो जाता है, कि भक्ति और ज्ञानको कर्मयोगके बदले विकल्प मानकर इन्ही दो स्वतंत्र मार्गोका वर्णन सातवें अध्यायमे आगे किया गया है। गीताका कर्मयोग भागवत धर्मसेही लिया गया है, इसलिये कर्मयोगमें ज्ञान-प्राप्तिकी विधिका जो वर्णन है, वह भागवत धर्म अथवा नारायणीय धर्ममें कही गई विधिकाही वर्णन है; और इसी
४५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
अभिप्रायसे शांतिपर्वके अंतमें वैशंपायनने जनमेजयसे कहा है, कि "भगवद्गीतामें प्रवृत्ति-प्रधान नारायणीय धर्म और उसकी विधियोंका वर्णन किया गया है।" (पहले प्रकरणके आरंभमें दिये गये श्लोक देखिये) । वैशंपायनके कथनानुसार इसीमें संन्यास-मार्गकी विधियोंकाभी अंतर्भाव होता है। क्योकि यद्यपि इन दोनों मार्गोंमें "कर्म करना अथवा कर्मोंको छोड़ना" यही भेद है, तथापि दोनोंको एकही ज्ञानविज्ञानकी आवश्यकता है, इसलिये दोनों मार्गोंमें ज्ञान-प्राप्तिकी विधियाँ एक- ही-सी होती हैं। परंतु जबकि उपर्युक्त श्लोकमें "कर्मयोगका आचरण करते हुए" – ऐसे प्रत्यक्ष पद रखे गये हैं, तब स्पष्ट रीतिसे यही सिद्ध होता है, कि गीताके सातवें और उसके अगले अध्यायोंमें ज्ञान-विज्ञानका निरूपण मुख्यतः कर्मयोगहीकी पूर्तिके लिये किया है और उसकी व्यापकताके कारण उसमें संन्यासमार्गकीभी विधियोंका समावेश हो जाता है, कर्मयोगको छोड़कर केवल सांख्यनिष्ठाके समर्थनके लिये यह ज्ञानविज्ञान नहीं बतलाया गया है। दूसरी यह बातभी ध्यान देने योग्य है, कि सांख्य-मार्गवाले यद्यपि ज्ञानको महत्त्व दिया करते हैं, तथापि वे कर्मको या भक्तिको कुछभी महत्त्व नहीं देते; और गीतामें तो भक्ति सुगम तथा प्रधान मानी गई है, इतनाही क्यों, वरन् अध्यात्मज्ञान और भक्तिका वर्णन करते समय श्रीकृष्णने अर्जुनको जगह-जगहपर यही उपदेश दिया है, कि "तू कर्म अर्थात् युद्ध कर" (गीता ८.७; ११.३३; १६. २४; १८.६)। इसलिये यही सिद्धान्त करना पड़ता है, गीताके सातवें और अगले अध्यायोंमें ज्ञान-विज्ञानका जो निरूपण है, वह पिछले छः अध्यायोंमें कहे गये कर्मयोगकी पूर्ति और समर्थनके लियेही बतलाया गया है, यहाँ केवल सांख्यनिष्ठाका या केवल भक्तिका स्वतंत्र समर्थन विवक्षित नहीं है। ऐसा सिद्धान्त करनेपर कर्म, भक्ति और ज्ञान इस प्रकार गीताके तीन परस्पर स्वतंत्र विभाग नहीं हो सकते। इतनाही नहीं; परंतु अब यह विदित हो जायगा, कि यह मतभी (जिसे कुछ लोग प्रकट किया करते हैं) केवल काल्पनिक अतएव मिथ्या है, कि 'तत्त्वमसि' महावाक्यमें तीनही पद हैं, और गीताके अध्यायभी अठारह हैं, इसलिये 'छः त्रिक अठारह' के हिसाबसे गीताके छः छः अध्यायोंके तीन समान विभाग करके, पहले छः अध्यायोंमें 'त्वम्' पदका, दूसरे छः अध्यायोंमें 'तत्' पदका और तीसरे छः अध्यायोंमें 'असि' पदका विवेचन किया गया है। इस मतको काल्पनिक या मिथ्या कहनेका कारण यही है, कि अब तो यह एकदेशीय पक्षही शेष नहीं रहने पाता; जो यह कहे, कि सारी गीतामें केवल ब्रह्मज्ञानकाही प्रतिपादन किया गया है, तथा 'तत्त्वमसि' महावाक्यके विवरणके सिवा गीतामें और कुछ अधिक नहीं है। इस प्रकार जब मालूम हो गया, कि भगवद्गीतामें भक्ति और ज्ञानका विवे- चन क्यों किया गया है, तब सातवेंसे सत्रहवे अध्यायके अंततक ग्यारहों अध्यायोंकी संगति सहजही ध्यानमें आ जाती है। पीछे छठे प्रकरणमें बतला दिया गया है, कि