भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 485

४४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र समाजके हितके लिये खेती या अन्य व्यवसाय करनेवाले साधारण स्त्री-पुरुषोंको मोक्ष कैसे मिले। अच्छा; स्त्री-शूद्रादिकोंके साथ वेदोंकी ऐसी अनबन होनेसे यदि यह कहा जाय, कि उन्हें मुक्ति कभी मिलही नहीं सकती; तो उपनिषदों और पुराणोंमेंही ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि गार्गी प्रभृति स्त्रियोंको और विदुर प्रभृतिको ज्ञानकी प्राप्ति होकर सिद्धि मिल गई थी (वे. सू. ३. ४. ३६-३९) । ऐसी दशामें यह सिद्धान्त नहीं किया जा सकता, कि सिर्फ पहले तीन वर्णोंके पुरुषोंहीको मुक्ति मिलती है; और यदि यह मान लिया जावे, कि स्त्री-शूद्र आदि सभी लोगोंको मुक्ति मिल सकती है; तो अब बतलाना चाहिये, कि उन्हें किस साधनसे ज्ञानकी प्राप्ति होगी। बादरायणाचार्य कहते हैं, कि 'विशेषानुग्रहश्च' (वे. सू. ३. ४. ३८) अर्थात् परमेश्वरका विशेष अनुग्रहही उनके लिये एक साधन है; और भागवतमें (भाग. १. ४. २५) कहा है, कि कर्म-प्रधान भक्ति-मार्गके रूपमें इसी विशेषानु- ग्रहात्मक साधनका "महाभारतमें और अतएव गीतामेंभी निरूपण किया गया है, क्योंकि स्त्रियों, शूद्रों या (कलियुगके) नामधारी ब्राह्मणोंके कानोंतक श्रुतिकी आवाज नहीं पहुँचती है।" इस मार्गसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और उपनिषदोंका ब्रह्मज्ञान - दोनों यद्यपि एकहीसे हों, तथापि अब स्त्री-पुरुषसंबंधी या ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्य-शूद्रसंबंधी कोई भेद शेष नहीं रहता; और इस मार्गके विशेष गुणके बारेमें गीता कहती है, कि- मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ॥ स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ "हे पार्थ! स्त्री, वैश्य और शूद्र या अंत्यज आदि जो पाप-योनियोंमें उत्पन्न हुए हैं, मेरा आश्रय करके वेभी सब उत्तम गति पा जाते हैं" (गीता. ९. ३२)। यही श्लोक महाभारतके अनुगीता पर्वमेंभी आया है (मभा. अश्व. १९. ६१); और ऐसी कथाएँभी हैं, कि वनपर्वान्तर्गत ब्राह्मण-व्याध-संवादमें मांस बेचनेवाले व्याधने किसी ब्राह्मणको, तथा शांतिपर्वमें तुलाधारने अर्थात् बनियेने जाजलि नामक तपस्वी ब्राह्मणको, यह निरूपण सुनाया है, कि स्वधर्मके अनुसार निष्काम बुद्धिसे आचरण करनेही मोक्ष कैसे मिल जाता है (मभा. वन. २०६--२१४; शां. २६०-२६३) इनसे प्रकट होता है, कि जिसकी बुद्धि सम हो जावे, वही श्रेष्ठ है, फिर चाहे वह सुनार हो, बढ़ई हो, बनिया हो या कसाई। किसी मनुष्यकी योग्यता उसके धंधेपर, व्यवसायपर या जातिपर, अवलंबित नहीं; किंतु सर्वथा उसके अंतःकरणकी शुद्धतापर अवलंबित होती है; और यही भगवान्‌काभी अभिप्राय है। इस प्रकार किसी समाजके सब लोगोंके लिये मोक्षके दरवाजे खुल जानेसे, उस समाजमें जो एक प्रकारकी विलक्षण जागृति उत्पन्न होती है, उसका स्वरूप महाराष्ट्रके भागवत धर्मके इतिहासमे भली भाँति दीख पड़ता है। परमेश्वरको क्या स्त्री, क्या चांडाल क्या ब्राह्मण-सभी समान हैं; "देव भावका भूखा है"- न प्रतीकका, न