भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 956 में से

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पृष्ठ 486

काले-गोरे वर्णका; और न स्त्री-पुरुष आदि या ब्राह्मण-चांडाल आदि भेदोंकाभी। साधु तुकारामका इस विषयका अभिप्राय, इस हिंदी पदसे प्रकट हो जायगा :- क्या द्विजति क्या शूद्र ईशको वेश्या भी भज सकती है, श्वपचोंकोभी भक्तिभावमें शुचिता कब तज सकती है। अनुभवसे कहता हूँ, मैने उसे कर लिया है बस में, जो चाहे सो पिये प्रेमसे अमृत भरा है इस रसमें ॥ अधिक क्या कहें ? गीताशास्त्रकाभी यह सिद्धान्त है, कि “ मनुष्य कितनाभी दुरा- चारी क्यों न हो; परन्तु यदि अंतकालमें वह अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें जावे तो परमेश्वर उसे नही भूलता ” ( गीता ९. ३०; ८. ५-८ )। उक्त पद्यमें 'वेश्या' शब्दको (जो साधु तुकाराम महाराजके मूल वचनके आधारमे रखा गया है) देखकर, पवित्रताका ढोंग करनेवाले बहुतेरे विद्वानोंका कदाचित् बुरा लगे। परंतु सच बात तो यह है, कि ऐसे लोगोंको सच्चा धर्म-तत्त्व मालूमही नहीं है। न केवल हिंदु धर्ममें, किंतु बौद्ध धर्ममेंभी यही सिद्धान्त स्वीकार किया गया है ( मिलिंदप्रश्न ३. ७ २ ); और उनके धर्म-ग्रंथोंमें ऐसी कथाएँ हैं, कि बुद्धने आम्रपाली नामक किसी वेश्याको और अंगुलीमाल नामके चोरको दीक्षा दी थी। ईसाइयोके धर्म ग्रंथमेंभी यह वर्णन है, कि ईसाके साथ जो दो चोर सूलीपर चढ़ाये गये थे, उनमेसे एक चोर मृत्युके समय ईसाकी शरणमें गया; और ईसाने उसे सद्गति दी ( ल्यूक. २३. ४२, ४३ )। स्वयं ईसानेभी एक स्थानमें कहा है, कि हमारे धर्ममें श्रद्धा रखनेवाली वेश्याएँभी मुक्त हो जाती हैं ( मेथ्यु. २१. ३१; ल्यूक. ७. ५० )। यह बात दसवें प्रकरणमें हम बतला चुके हैं, कि अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिमेभी यही सिद्धान्त निष्पन्न होता है। परंतु यह धर्म-तत्त्व शास्त्रतः यद्यपि निर्विवाद है ; तथापि जिसका सारा जन्म दुराचरणमें व्यतीत हुआ है, उसके अंतःकरणमें केवल मृत्युके समयही अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें जानेकी बुद्धि कैसे जागृत रह सकती है ? ऐसी अवस्थामें अंतः- कालकी वेदनाओंको सहते हुए केवल यंत्रके समान एक बार 'रा' कहकर और कुछ देरसे 'म' कहकर, मुँह खोलने और बंद करनेके परिश्रमके सिवा कुछ अधिक लाभ नहीं होता। इसलिये भगवानने सब लोगोंम निश्चित रीतिसे कहा है, कि “ न केवल मृत्युके समयही किंतु सारे जीवनभर सदैव मेरा स्मरण मनमें रहने दो; और स्वधर्मके अनुसार अपने सब व्यवहारोंको परमेश्वरार्पणबुद्धिसे करते रहो, फिर चाहे तुम किसीभी जातिके रहो, तोभी तुम कर्मोको करते हुएभी मुक्त हो जाओगे ” ( गीता ९. २६-२८, ३०-३४ )। इस प्रकार उपनिषदोंका ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान आबालवृद्ध सभी लोगोंके लिये सुलभ तो कर दिया गया है; परंतु ऐसा करते समय न तो व्यवहारका लोप होने दिया है; और न वर्ण, आश्रम, जाति-पांति अथवा स्त्री-पुरुष आदिका कोईभी भेद रखा गया है। जब हम गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्गकी इस शक्ति अथवा समताकी

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