भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 956 में से

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पृष्ठ 487

४४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ओर ध्यान देते हैं, तब गीताके अंतिम अध्यायमें भगवान्ने प्रतिज्ञापूर्वक गीताशास्त्रका जो उपसंहार किया है, उसका मर्म प्रकट हो जाता है। वह ऐसा है - " सब धर्म छोड़कर मेरे अकेलेकी शरणमें आ जा; मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा, घबराना नहीं।" यहाँपर धर्म शब्दका उपयोग इसी व्यापक अर्थमें किया गया है, कि सब व्यवहारोंको करते हुएभी पाप-पुण्यमे अलिप्त रहकर परमेश्वर-रूपी प्राप्ति या आत्मश्रेय जिस मार्ग प्रत्यक्ष उपायके द्वारा संपादन किया जा सकता है, वही धर्म है। अनुगीताके गुरुशिष्य-संवादमें ऋषियोंने ब्रह्मासे यह प्रश्न किया (अश्व. ४९), कि अहिंसाधर्म, सत्यधर्म, व्रत तथा उपवास ज्ञान, यज्ञयाग, दान, कर्म, संन्यास आदि जो जो अनेक प्रकारके मुक्तिके साधन अनेक लोग बतलाते हैं, उनमेंसे सच्चा साधन कौन है ? शांतिपर्वके (मभा. शां. ३५४) उच्छवृत्ति उपाख्यानमेंभी यह प्रश्न है, कि गार्हस्थ्यधर्म, वानप्रस्थधर्म, राजधर्म, मातृ-पितृसेवा-धर्म, क्षत्रियोंका रणांगणमें मरण, ब्राह्मणोंका स्वाध्याय, इत्यादि जो अनेक धर्म या स्वर्ग-प्राप्तिके साधन शास्त्रोंमें बत- लाये हैं, उनमेंसे ग्राह्य धर्म कौन है ? ये भिन्न धर्म-मार्ग या धर्म दिखनेमें तो परस्पर- विरुद्ध मालूम होते हैं, परंतु शास्त्रकार इन सब प्रत्यक्ष मार्गोंकी योग्यताको एक-सीही समझते हैं, क्योंकि समस्त प्राणियोंमें साम्य-बुद्धि रखनेका जो अंतिम साध्य है, वह इनमेंसे किसीभी धर्मपर प्रीति और श्रद्धाके साथ मनको एकाग्र किये बिना प्राप्त नहीं हो सकता ! तथापि, इन अनेक मार्गोंकी अथवा प्रतीक-उपासनाकी झंझटमें फँसनेसे मन घबग जा सकता है, इसलिये अकेले अर्जुनकोही नहीं; किंतु उसे निमित्त करके सब लोगोंको भगवान् इस प्रकार निश्चित आश्वासन देते हैं, कि चित्त-शुद्धिके इन अनेक धर्म-मार्गोंको छोड़कर "तू केवल मेरी शरणमें आ; मैं तुझे समस्त पापोंसे मुक्त कर दूँगा; डर मत।" साधु तुकारामभी इसी प्रकार सब धर्मोंका निरसन करके अंतमें भगवानसे यही माँगते हैं, कि :- चतुराई चेतना सभी चुल्हेमें जावें, बस मेरा मन एक ईश-चरणाश्रय पावे । आग लगे आचार-विचारोंके उपचयमें, उस विभु का विश्वास सदा दृढ रहे हृदयमें ॥ निश्चयपूर्वक उपदेशकी या प्रार्थनाकी अंतिम सीमा हो चुकी । श्रीमद्भगवद्गीतारूपी सोनेकी थालीका यह भक्तिरूपी अंतिम कौर है, यही प्रेमग्रास है। इसे पा चुके, अब आगे चलिये।

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