श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ प्रकरण गीताध्याय-संगति प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं ऋषिर्नारायणोऽब्रवीत् । * – महाभारत, शांति. ३४७. २ अबतक किये गये विवेचनमे दीख पड़ेगा, कि भगवद्गीतामें अर्थात् भगवानके द्वारा गाये गये उपनिषद्में यह प्रतिपादन किया गया है, कि कर्मोंको करते हुएही अध्यात्मविचारसे या भक्तिसे सर्वात्मैकरूप साम्य-बुद्धि पूर्णतया प्राप्त कर लेना; और उसे प्राप्त कर लेनेपरभी संन्यास लेनेकी झंझटमें न पड़ संसारमें शास्त्रतः प्राप्त सब कर्मोंको केवल अपना कर्तव्य समझकर करते रहनाही, इस संसारमें मनुष्यका परम पुरुषार्थ अथवा जीवन व्यतीत करनेका उत्तम मार्ग है। परंतु जिस क्रमसे हमने इस ग्रंथमें उक्त अर्थका वर्णन किया है, उसकी अपेक्षा गीता ग्रंथका क्रम भिन्न है; इसलिये अब यहभी देखना चाहिये, कि भगवद्गीतामें उस विषयका वर्णन किस प्रकार किया गया है। किसीभी विषयका निरूपण दो रीतियोंसे किया जाता है: एक शास्त्रीय और दूसरी पौराणिक । शास्त्रीय पद्धति वह है, कि जिसके द्वारा तर्क- शास्त्रानुसार साधकबाधक प्रमाणोंको क्रमसहित उपस्थित करके यह दिखला दिया जाता है, कि सब लोगोंकी समझमे सहजही आ सकनेवाली बातोंसे किसी प्रतिपाद्य विषयके मूलतत्त्व किस प्रकार निष्पन्न होते हैं । भूमितिशास्त्र इस पद्धतिका एक अच्छा उदाहरण है; और न्यायसूत्र या वेदान्त-सूत्रका उपपादनभी उसी वर्गका है । इसीलिये भगवद्गीतामें जहाँ ब्रह्मसूत्र याने वेदान्त-सूत्रोंका उल्लेख किया है, वहाँ यहभी वर्णन है, कि उसका विषय हेतुयुक्त और निश्चयात्मक प्रमाणोंसे सिद्ध किया गया है – “ ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ” (गीता १३. ४) परंतु भगवद्गीताका निरूपण सशास्त्र भलेही हो; तथापि वह इस शास्त्रीय पद्धतिमें नहीं किया गया है। भगवद्गीतामें जो विषय है, उसका वर्णन अर्जुन और श्रीकृष्णके संवादरूपमें अत्यंत मनोरंजक और सुलभ रीतिसे किया गया है। इसीलिये प्रत्येक अध्यायके अंतमें “ भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे ” कहकर आगे गीतानिरूपणके स्वरूपके द्योतक ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवादे’ इन शब्दोंका उपयोग किया गया
- “ नारायण ऋषिने धर्मको प्रवृत्तिप्रधान बतलाया है।” नर और नारायण नामक ऋषियोंमेंसेही ये नारायण ऋषि हैं। पहले बतला चुके हैं, कि इन्हीं दोनोंके अवतार श्रीकृष्ण और अर्जुन थे। इसी प्रकार महाभारतका वह वचनभी पहले उद- धृत किया गया है; जिससे यह मालूम होता है, कि गीतामें नारायणीय धर्मकाही प्रतिपादन किया गया है।