श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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है । इस निरूपणमें और 'शास्त्रीय' निरूपणमें जो भेद है, उसको स्पष्टतासे बतलानेके लिये हमने संवादात्मक निरूपणकोही 'पौराणिक' नाम दिया है । सात सौ श्लोकोंके इस संवादात्मक अथवा पौराणिक निरूपणमे 'धर्म' जैसे व्यापक शब्दमें शामिल होनेवाले सभी विषयोंका विस्तारपूर्वक विवेचन कभी होही नही सकता । परंतु आश्चर्यकी बात है, कि गीतामें जो अनेक विषय उपलब्ध होते हैं, उनकाही संग्रह ( संक्षेपमेंही क्यों न हो ) अविरोधसे कैसे किया जा सका ! इस बातसे गीताकारकी अलौकिक शक्ति व्यक्त होती है; और अनुगीताके आरंभमें जो यह कहा गया है, कि गीताका उपदेश " अत्यंत योगयुक्त चित्तसे " बतलाया गया है, उसकी सत्यताकी प्रतीतिभी हो जाती है । अर्जुनको जो विषय पहलेसेही मालूम थे, उन्हें फिरसे विस्तारपूर्वक कहनेकी कोई आवश्यकता नही थी । उसका मुख्य प्रश्न तो यही था, कि मैं लड़ाईका घोर कृत्य करूं या न करूं ? और करूंभी तो किस प्रकार करूं ? जब श्रीकृष्ण अपने उत्तरमे एकाध युक्ति बतलाते थे, तब अर्जुन उसपर कुछ-न-कुछ आक्षेप किया करता था । इस प्रकारके प्रश्नोत्तररूपी संवादमें गीताका विवेचन स्वभावहीसे कहीं संक्षिप्त और कहीं द्विरुक्त हो गया है । उदाहरणार्थ, त्रिगुणात्मक प्रकृतिके फैलावका वर्णन कुछ थोड़े भेदसे दो जगह है ( गीता अ. ७. १४ ) ; और स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त, त्रिगुणातीत, तथा ब्रह्मभूत इत्यादिकी स्थितिका वर्णन एक-सा होनेपरभी, भिन्न भिन्न दृष्टियोंसे प्रत्येक प्रसंगपर बार बार किया गया है । इसके विपरीत " यदि अर्थ और काम धर्मसे विभक्त न हों, तो वे ग्राह्य हैं " - इस तत्त्वका दिग्दर्शन गीतामें केवल " धर्माविरुद्धः कामोऽस्मि " (गीता ७. ११) इसी एक वाक्यमें कर दिया गया है। इसका परिणाम यह होता है, कि यद्यपि गीतामे सब विषयोंका समावेश किया गया है, तथापि गीता पढ़ते समय उन लोगोंके मन उलझनमें पड़ जाते हैं; जो श्रौत धर्म, स्मार्त धर्म, भागवत धर्म, सांख्यशास्त्र, पूर्वमीमांसा, वेदान्त, कर्म-विपाक इत्यादिके उन प्राचीन सिद्धान्तोंकी परंपरासे परिचित नहीं हैं, कि जिनके आधारपर गीताके ज्ञानका निरूपण किया गया है। और जब गीताके प्रतिपादनकी पद्धति ठीक ठीक ध्यानमें नहीं आती, तब वे लोग कहने लगते हैं कि, गीता मानों बजी- गरकी झोली है; अथवा शास्त्रीय पद्धतिके प्रचारके पूर्व गीताकी रचना हुई होगी; इसलिये उसमे स्थान-स्थानपर अधूरापन और विरोध दीख पड़ता है, अथवा गीताका ज्ञानही हमारी बुद्धिके लिये अगम्य है ! इस संशयको हटानेके लिये यदि टीकाओंका अवलोकन किया जाय, तो उनमेभी कुछ लाभ नहीं होता, क्योंकि वे बहुधा भिन्न भिन्न संप्रदायानुसार बनी हैं ! इसलिये टीकाकारोंके मतोंके परस्पर-विरोधोंकी एकवाक्यता करना असंभव-सा हो जाता है; और पढ़नेवालेका मन अधिकाधिक घबराने लगता है। इस प्रकारके भ्रममें पड़े हुए कई सुप्रबुद्ध पाठकोंको हमने देखा है। इस अड़चनको हटानेके लिये हमने अपनी बुद्धिके अनुसार गीताके प्रतिपाद्य विषयोंका शास्त्रीय क्रम बाँधकर अबतक विवेचन किया है। अब यहाँ इतना और