श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताध्याय-संगति ४४५ बतला देना चाहिये, कि येही विषय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संभाषणमे, अर्जुनके प्रश्नों या शंकाओंके अनुरोधसे, कुछ न्यूनाधिक होकर कैसे उपस्थित हुए हैं। इससे यह विवेचन पूरा हो जायगा; और अगले प्रकरणमें सुगमतासे सब विषयोंका उपसंहार कर दिया जायगा। पाठकोंको प्रथम इस ओर ध्यान देना चाहिये, कि जब हमारा हिंदुस्थान देश ज्ञान, वैभव, यश और स्वराज्यके सुखका अनुभव ले रहा था, उस समय एक सर्वज्ञ, महापराक्रमी, यशस्वी और परमपूज्य क्षत्रियने दूसरे क्षत्रियको, जो महान् धनुर्धारी था, क्षात्र धर्मके स्वकार्यमें प्रवृत्त करनेके लिये गीताका उपदेश किया है। जैन और बौद्ध धर्मोंके प्रवर्तक महावीर और गौतम बुद्धभी क्षत्रियही थे। परंतु इन दोनोंने वैदिक धर्मके केवल संन्यास-मार्गको अंगीकार कर क्षत्रिय आदि सब वर्णोंके लिये संन्यास-धर्मका दरवाजा खोल दिया था; परंतु भगवान् श्रीकृष्णने ऐसा नहीं किया, क्योंकि भागवत-धर्मका यह उपदेश है, कि न केवल क्षत्रियोंको परंतु ब्राह्मणोंकोभी निवृत्ति-मार्गकी शांतिके साथ साथ निष्काम-बुद्धिसे सब कर्म आमरणान्त करते रहनेका प्रयत्न करना चाहिये। किसीभी प्रकारका उपदेश करनेके लिये किसी-न-किसी कारणकी आवश्यकता होती है, और उस उपदेशकी सफलताके लिये शिष्यके मनमें उस उपदेशका ज्ञान प्राप्त कर लेनेकी इच्छाभी प्रथमहीसे जागृत रहनी चाहिये। अतएव इन दोनों बातोंका स्पष्टीकरण करनेके लियेही व्यासजीने, गीताके पहले अध्यायमें, इस बातका विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया है, कि श्रीकृष्णने अर्जुनको यह उपदेश क्यों दिया है। कौरव-पांडवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये तैयार होकर कुरुक्षेत्रपर खड़ी हैं; थोड़ीही देरमें लड़ाई छिड़नेवालीही थी, कि इतनेमें अर्जुनके कहनेसे श्रीकृष्णने उसका रथ दोनों सेनाओंके बीचमें ले जाकर खड़ा कर दिया; और अर्जुनसे कहा, कि “तुझे जिनसे युद्ध करना है, उन भीष्म, द्रोण आदिको देख।” तब अर्जुनने दोनों सेनाओंकी ओर दृष्टि पहुँचाई और देखा, कि अपनेही बापदादा, काका, आजा, मामा, बंधु, पुत्र नाती, स्नेही, आप्त, गुरु, गुरुबंधु आदि दोनों सेनाओंमें खड़े हैं; और इस युद्धमें सब लोगोंका नाश होनेवाला है! लड़ाई एकाएक उपस्थित नहीं हुई थी; लड़ाई करनेका निश्चय पहलेही हो चुका था; और बहुत दिनोंसे दोनों ओरकी सेनाओंका प्रबंध हो रहा था। परंतु इस आपसकी लड़ाईसे होनेवाले कुलक्षयका प्रत्यक्ष स्वरूप जब पहले पहल अर्जुनकी नजरमें आया, तब उसके समान महायोद्धाकेभी मनमें विषाद उत्पन्न हुआ; और उसके मुखसे ये शब्द निकल पड़े, “ओह ! आज हम लोग अपनेही कुलका भयंकर क्षय इसीलिये करनेवाले हैं न, कि राज्य हमींको मिले; इसकी अपेक्षा भिक्षा मांगना क्या बुरा है ?” और इसके बाद उसने श्रीकृष्णसे कहा, कि “शत्रु चाहे मुझे जानसे मार डाले, मुझे इसकी चिंता नहीं; परंतु त्रैलोक्यके राज्यके लियेभी मैं पितृहत्या, गुरुहत्या, बंधुहत्या या कुलक्षयके समान घोर पातक करना नहीं चाहता।” उसकी सारी देह थर-थर काँपने लगी; हाथ-पैर