भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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४४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

शिथिल हो गये; मुह सूख गया; और खिन्नवदन हो अपने हाथका धनुष्यबाण फेंक- कर वह बेचारा रथमें चुपचाप बैठ गया। इतनी कथा पहले अध्यायमें है। इस अध्यायको 'अर्जुन-विषादयोग' कहते हैं। क्योंकि यद्यपि पूरी गीतामें ब्रह्मविद्यान्तर्गत- (कर्म) योगशास्त्र नामक एक ही विषय प्रतिपादित हुआ है; तोभी प्रत्येक अध्यायमें जिस विषयका वर्णन प्रधानतासे किया जाता है, उस विषयको इस कर्म- योग शास्त्रकाही एक भाग समझना चाहिये; और ऐसा समझकरही प्रत्येक अध्यायको उसके विषयानुसार अर्जुन-विषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग इत्यादि भिन्न भिन्न नाम दिये गये हैं। इन सब 'योगों'को एकत्र करनेसे "ब्रह्मविद्याका कर्मयोग- शास्त्र" हो जाता है! पहले अध्यायकी कथाका महत्त्व हम इस ग्रंथके आरंभमें कह चुके हैं। इसका कारण यह है, कि जबतक हम उपस्थित प्रश्नके स्वरूपको ठीक तौरसे जान न लें, तबतक उस प्रश्नका उत्तरभी भली भाँति हमारे ध्यानमें नहीं आता। यदि कहा जाय, कि गीताका यही तात्पर्य है, कि "सांसारिक कर्मोंसे निवृत्त होकर भगवद्भजन करो या संन्यास ले लो;" तो फिर अर्जुनको उपदेश करनेकी कुछ आवश्यकताही न थी, क्योंकि वह तो लड़ाईका घोर कर्म कर भिक्षा माँगनेके लिये आप-ही-आप तैयार हो गया था। पहलेही अध्यायके अंतमें श्रीकृष्णके मुखसे ऐसे अर्थका एक-आध श्लोक कहलाकर वहीं गीताकी समाप्ति कर देनी चाहिये थी, "वाह! क्या ही अच्छा कहा! तेरी इस उपरतीको देख मुझे आनंद मालूम होता है। चल, हम दोनों इस कर्ममय संसारको छोड़ संन्यासाश्रमके द्वारा या भक्तिके द्वारा अपने आत्माका कल्याण कर लें!" फिर, इधर लड़ाई हो जानेपर व्यासजी उसका वर्णन करनेमें तीन वर्षतक (मभा. आ. ६२. ५२) अपनी वाणीका भलेही दुरुपयोग करते रहते; परंतु उसका दोष बेचारे अर्जुन और श्रीकृष्णपर तो आरोपित न हुआ होता। हाँ; यह सच है, कि कुरुक्षेत्रमें जो सैकड़ों महारथी एकत्र हुए थे, वे अवश्यही अर्जुन और श्रीकृष्णका उपहास करते; परंतु जिसको अपने आत्माका कल्याणकर लेना है, वह ऐसे उपहासकी चिंताही क्यों करता? संसार कुछभी कहे; उपनिषदोंमें तो यही कहा है, कि "यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" (जा. ४) - जिस क्षण उपरति हो, उसी क्षण संन्यास धारण करो; विलंब न करो। यदि यह कहा जाय, कि अर्जुनकी उपरति ज्ञानपूर्वक न थी, वह केवल मोहकी थी; तोभी वह थी तो उपरतिही। बस; उपरति होनेसे आधा काम हो चुका, अब मोहको हटाकर उसी उपरतिका पूर्ण ज्ञानमूलक कर देना भगवानके लिये कुछ असंभव बात न थी। भक्ति-मार्गमें या संन्यास-मार्गमेंभी ऐसे अनेक उदाहरण हैं; कि जब कोई किसी कारणसे संसारसे उकता गये, तो वे दुःखित हो इस संसारको छोड़ जंगलमें चल गये; और आगे उन लोगोंने पूरी सिद्धीभी प्राप्त कर ली है। इसी प्रकार अर्जुनकीभी यही दशा कर दी होती। ऐसा तो भी होही नहीं सकता था, कि कभी संन्यास लेनेके समय वस्त्रोंको गेरुआ रंग देनेके लिये मुट्ठीभर लाल मिट्टी, या