श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 492, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिमें भगवन्नाम-संकीर्तन करनेके लिये झांझ, मृदंग आदि सामग्री सारे कुरु- क्षेत्रमेंभी न मिलती। परंतु ऐसा कुछभी न करके उलटे दूसरे अध्यायके आरंभमेंही श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा है, कि "अरे ! तुझे यह दुर्बुद्धि (कश्मल) कहाँसे सूझ पड़ी? यह नामर्दी (क्लैब्य) तुझे शोभा नहीं देती। यह तेरी कीर्तिको धूलिमें मिला देगी। इसलिये इस दुर्बलताका त्याग कर युद्धके लिये खड़ा हो जा।" परंतु अर्जुनने किसी अबलाकी तरह अपना रोनाधोना जारी रक्खा और वह अत्यंत दीनहीन वाणीमे बोला- "मैं भीष्म, द्रोण आदि महात्माओंको कैसे मारूँ? मेरा मन इसी संशयमें चक्कर खा रहा है, कि मरना भला है, या मारना? इसलिये मुझे यह बतलाओ, कि इन दोनोंमें कौन-सा धर्म श्रेयस्कर है। मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ।" अर्जुनकी इन बातोंको सुनकर श्रीकृष्ण जान गये, कि अब यह मायाके चंगुलमें फँस गया है, इसलिये जग हँसकर उन्होंने उसे 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्' इत्यादि ज्ञान बतलाना आरंभ किया। अर्जुन ज्ञानी पुरुषके सदृश बर्ताव करना चाहता था; और वह कर्म- संन्यासकी बातेंभी करने लग गया था। इसलिये, संसारमें ज्ञानी पुरुषके आचरणके जो दो पंथ अथवा निष्ठाएँ दीख पड़ती हैं-अर्थात्, 'कर्म करना' और 'कर्म छोड़ना' वहींसे भगवान्ने उपदेशका आरंभ किया है; और अर्जुनको पहली बात यही बतलाई है, कि इन दो पंथो या निष्ठाओंमेंसे तू किसीकोभी ले; परंतु तू भूल कर रहा है। इसके बाद, जिस ज्ञान या सांख्यनिष्ठाके आधारपर अर्जुन कर्म-संन्यासकी बातें करने लगा था, उसी सांख्यनिष्ठाके आधारपर श्रीकृष्णने प्रथम 'एषा तेऽभिहिता बुद्धिः" (गीता. २. ११-३९) तक उपदेश किया है, और फिर अध्यायके अंत- तक कर्मयोग-मार्गके अनुसार अर्जुनको यही बतलाया है, कि युद्धही तेरा सच्चा कर्तव्य है। यदि "एषा तेऽभिहिता सांख्ये" सरीखा श्लोक 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्' श्लोकके पहले आता, तो यही अर्थ औरभी अधिक व्यक्त हो गया होता। परंतु संभाषणके प्रवाहमें सांख्य-मार्गका प्रतिपादन हो जानेपर वह इस रूपमें आया है- "यह तो सांख्य-मार्गके अनुसार प्रतिपादन हुआ; अब योगमार्गके अनुसार प्रति- पादन करता हूँ।" कुछभी हो; परंतु अर्थ एकही है। हमने ग्यारहवें प्रकरणमें सांख्य (या संन्यास) और योगका (या कर्मयोग) भेद पहलेही स्पष्ट करके बतला दिया है। इसलिये उसकी पुनरावृत्ति न कर इतनाही कह देते हैं, कि चित्तकी शुद्धताके लिये स्वधर्मानुसार वर्णाश्रम-विहित कर्म करके ज्ञान-प्राप्ति होनेपर मोक्षके लिये अंतमें सब कर्मोंको छोड़ संन्यास लेना सांख्य-मार्ग है; और कर्मोंका कभी त्याग न कर अंततक उन्हें निष्काम बुद्धिसे करते रहना योग अथवा कर्मयोग है। अर्जुनसे भगवान् प्रथम यह कहते हैं, कि सांख्य-मार्गके अध्यात्मज्ञानानुसार आत्मा अविनाशी और अमर है, इसलिये तेरी यह समझ गलत है, कि "मैं भीष्म, द्रोण आदिको मारूँगा।" क्योंकि न तो आत्मा मरता है; और न मारताही है। जिस प्रकार मनुष्य अपने वस्त्र