श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बदलता है, उसी प्रकार आत्मा एक देह छोड़कर दूसरी देहमें चला जाता है; परंतु इससे उसे मृत मानकर शोक करना उचित नहीं। अच्छा; मान लिया, कि 'मैं मारूँगा' यह भ्रम है, तबभी तू कहेगा, कि युद्धही क्यों करना चाहिये ? तो उसका उत्तर यह है, कि शास्त्रतः प्राप्त हुए युद्धसे परावृत्त न होनाही क्षत्रियोंका धर्म है; और जब कि इस सांख्य-मार्गमें प्रथमतः वर्णाश्रम-विहित कर्म करनाही श्रेयस्कर माना जाता है; तब यदि तू वैसा न करेगा, तो लोग तेरी निंदा करेंगे - अधिक क्या कहें, युद्धमें मरनाही क्षत्रियोंका धर्म है। फिर व्यर्थ शोक क्यों करता है ? "मैं मारूँगा और वह मरेगा" यह केवल कर्मदृष्टि है - इसे छोड़ दे; तू अपना प्रवाहपतित कार्य ऐसी बुद्धिसे करता चला जा, कि मैं केवल स्वधर्म कर रहा हूँ; इससे तुझे कुछभी पाप नहीं लगेगा : यह उपदेश सांख्य मार्गानुसार हुआ। परंतु चित्तकी शुद्धताके लिये प्रथमतः कर्म करके चित्तशुद्धि हो जानेपर अंतमें सब कर्मोंको छोड़ संन्यास लेनाही यदि इस मार्गके अनुसार श्रेष्ठ माना जाता है, तो यह शंका रहही जाती है, कि उपति होतेही युद्धको छोड़ (यदि हो सके तो) एकदम संन्यास ले लेना क्या अच्छा नहीं है ? केवल इतना कह देनेसे काम नहीं चलता, कि मनु आदि स्मृतिकारोंकी आज्ञा है, कि गृहस्था- श्रमके बाद फिर कहीं बुढ़ापेमें संन्यास लेना चाहिये, युवावस्थामें तो गृहस्थाश्रमीही होना चाहिये। क्योंकि किसीभी समय यदि संन्यास लेनाही श्रेष्ठ है, तो ज्योंही संसारसे जी हटा, त्योंही तनिकभी देर न कर संन्यास लेना उचित है; और इसी हेतुसे उपनिषदोंमेंभी ऐसे वचन पाये जाते हैं, कि "ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा" (जा. ४)। संन्यास लेनेसे जो गति प्राप्त होगी, वही युद्धक्षेत्रमें मरनेसे क्षत्रियको प्राप्त होती है। महाभारतमें कहा है :- द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमंडलभेदिनौ । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥ "हे पुरुष-व्याघ्र ! सूर्यमंडलको पार कर ब्रह्मलोकको जानेवाले केवल दोही पुरुष हैं। एक तो योगयुक्त संन्यासी और दूसरा युद्धमें लड़कर मर जानेवाला वीर" (उद्यो. ३२. ६५)। इसी अर्थका एक श्लोक कौटिल्यके, याने चाणक्यके अर्थ- शास्त्रमेंभी है. - यान् यज्ञसंघैस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणः पात्रचयैश्च यान्ति । क्षणेन तानप्यतियान्ति शूराः प्राणान् सुयुद्धेषु परित्यजन्तः ॥ स्वर्गकी इच्छा करनेवाले ब्राह्मण अनेक यज्ञोंसे, यज्ञपात्रोंसे और तपोंसे जिस लोकमें जाते हैं, उस लोककेभी परे युद्धमें प्राण अर्पण करनेवाले शूर पुरुष एक क्षणमें जा पहुँचते हैं - अर्थात् न केवल तपस्वियोंको या संन्यासियोंको वरन् यज्ञयाग आदि करनेवाले दीक्षितोंकोभी जो गति प्राप्त होती है, वही युद्धमें मरनेवाले क्षत्रियकोभी मिलती है (कौटि. १०. ३. १५०-५२; महा. शां. ९८-१००)। "क्षत्रियको