भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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स्वर्गमें जानेके लिये युद्धके समान दूसरा दरवाजा क्वचित्‌ही खुला मिलता है; युद्धमें मरनेसे स्वर्ग; और जय प्राप्त करनेसे पृथ्वीका राज्य मिलेगा" (२. ३२, ३७) गीताके इस उपदेशका तात्पर्यभी वही है। इसलिये सांख्य-मार्गके अनुसार यहभी प्रतिपादित किया जा सकता है, कि क्या संन्यास लेना और क्या युद्ध करना, दोनोंमें एकही फलकी प्राप्ति होती है। तथापि इस मार्गके युक्तिवादसे यह निश्चि- तार्थ पूर्ण रीतिसे सिद्ध नहीं होता कि "कुछभी हो; युद्ध करनाही चाहिये।" सांख्य- मार्गमें जो यह न्यूनता या दोष है, उसे ध्यानमें रख आगे भगवानने कर्मयोग-मार्गका प्रतिपादन आरंभ किया है; और गीताके अंतिम अध्यायके अंततक इसी कर्मयोगका

  • अर्थात् कर्मोंको करनाही चाहिये और मोक्षमें उनसे कोई बाधा नहीं होती; किंतु उन्हें करते रहनेसेही मोक्ष प्राप्त होता है, इसका - भिन्न भिन्न प्रमाण देकर, शंका- निवृत्तिपूर्वक समर्थन किया है। इस कर्मयोगका मुख्य तत्त्व यह है, कि किसीभी कर्मको भला या बुरा कहनेके लिये उस कर्मके बाह्य परिणामोंकी अपेक्षा पहले यह देख-लेना चाहिये, कि कर्ताकी वासनात्मक बुद्धि शुद्ध है अथवा अशुद्ध (गीता २. ४०)। परंतु वासनाकी शुद्धता या अशुद्धताका निर्णयभी तो आखिर व्यवसायात्मका बुद्धिही करती है, इसलिये जबतक निर्णय करनेवाली बुद्धींद्रिय स्थिर और शांत न होगी, तबतक वासनाभी शुद्ध और सम नहीं हो सकती। इसीलिये उसके साथ यहभी कहा है, कि वासनात्मक बुद्धिको शुद्ध करनेके लिये प्रथम समाधिके योगसे व्यवसाया- त्मका बुद्धींद्रियकोभी स्थिर कर लेना चाहिये (गीता २. ४१)। संसारके सामान्य व्यवहारोंकी ओर देखनेसे प्रतीत होता है, कि बहुतेरे मनुष्य स्वर्गादि भिन्न भिन्न काम्य सुखोंकी प्राप्तिके लियेही यज्ञायागादिक वैदिक काम्य कर्मोंकी झंझटमें पड़े रहते हैं, इससे उनकी बुद्धि कभी एक फलकी प्राप्तिमें, तो कभी दूसरेही फलकी प्राप्तिमें, अर्थात् स्वार्थहीमें, निमग्न रहती है, और सदा बदलनेवाली याने चंचल हो जाती है। ऐसे मनुष्योंको स्वर्ग-सुखादिक अनित्य फलकी अपेक्षा अधिक महत्त्वका अर्थात् मोक्षरूपी नित्य सुख कभी प्राप्त नहीं हो सकता। इसीलिये अब अर्जुनको कर्मयोग-मार्गका रहस्य इस प्रकार बतलाया गया है, कि वैदिक कर्मोंके काम्य झगड़ोंको छोड़ दे और निष्काम बुद्धिसे कर्म करना सीखे। तेरा अधिकार केवल कर्म करने भरकाही है - कर्मके फलकी प्राप्ति अथवा अप्राप्ति तेरे अधिकारकी बात नहीं है (२. ४७)। ईश्वरकोही फलदाता मानकर जब इस सम-बुद्धिसे - कि कर्मका फल मिले अथवा न मिले, दोनों समान हैं - केवल स्वकर्तव्य समझकरही जो कर्म किये जाते हैं; उन कर्मोंके पाप-पुण्यका लेप कर्ताको नहीं होता। इसलिये तू इस सम-बुद्धिका आश्रय कर। इस सम-बुद्धिकोही योग - अर्थात् पापके भागी न होते हुए कर्म करनेकी युक्ति - कहते हैं। यदि तुझे यह योग सिद्ध हो जाय, तो कर्म करनेपरभी तुझे मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी: मोक्षके लिये कुछ कर्म-संन्यासहीकी आवश्यकता नहीं है (गीता २. ४७-५३)। जब भगवानने अर्जुनसे कहा, कि जिस मनुष्यकी बुद्धि इस प्रकार गी. र. २९