श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सम हो गई हो, उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं (गीता २. ५३); तब अर्जुनने पूछा, कि “महाराज ! कृपा कर बतलाइये, कि स्थितप्रज्ञका बर्ताव कैसा होता है?” इसलिये दूसरे अध्यायके अंतमें स्थितप्रज्ञका वर्णन किया गया है; और अंतमें कहा गया है, कि स्थितप्रज्ञकी स्थितिकोही ब्राह्मी स्थिति कहते हैं। सारांश यह है, कि अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये गीतामें जो उपदेश दिया गया है, उसका प्रारंभ इन दो निष्ठाओंसे किया गया है, कि जिन्हें इस संसारके ज्ञानी मनुष्योंने ग्राह्य माना है; और जिन्हें ‘कर्म छोड़ना’ (सांख्य) और ‘कर्म करना’ (योग) कहते हैं; तथा युद्ध करनेकी आवश्यकताकी उपपत्ति पहले सांख्यनिष्ठाके अनुसार बतलाई गई है। परंतु जब यह देखा गया, कि इस उपपत्तिसे काम नहीं चलता, यह अधूरी है, तब फिर तुरंतही योग या कर्मयोग-मार्गके अनुसार ज्ञान बतलाना आरंभ किया है; और यह बतलानेके पश्चात्, कि इस कर्मयोगका अल्प आचरणभी कितना श्रेयस्कर है, दूसरे अध्यायमें भगवान्ने अपने उपदेशको इस स्थानतक पहुँचा दिया है, कि कर्मयोग-मार्गमें कर्मकी अपेक्षा वह बुद्धिही श्रेष्ठ मानी जाती है, जिससे कर्म करनेकी प्रेरणा हुआ करती है; तो अब स्थितप्रज्ञकी नाईं तू अपनी बुद्धिको सम करके अपना कर्म कर; जिससे तू कदापि पापका भागी न होगा। अब देखना है, कि आगे कौन-कौनसे प्रश्न उपस्थित होते हैं। गीताके सारे उपपादनकी जड़ दूसरे अध्यायमेही है, इसलिये इसके विषयका विवेचन यहाँ कुछ विस्तारसे किया गया है। तीसरे अध्यायके आरंभमे अर्जुनने प्रश्न किया है, कि “यदि कर्मयोग-मार्गमेंभी कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ मानी जाती है, तो मै अभी स्थितप्रज्ञकी नाई अपनी बुद्धि- को सम किये लेता हूँ, फिर आप मुझसे इस युद्धके समान घोर कर्म करनेके लिये क्यों कहते हैं?” इसका कारण यह है, कि कर्मकी अपेक्षा बुद्धिको श्रेष्ठ कह देनेसेही इन प्रश्नोंका निर्णय नहीं हो जाता, कि “युद्ध क्यों करें? बुद्धिको सम रखकर उदा- सीन क्यों न बैठे रहें?” बुद्धिको सम रखनेपरभी कर्म-संन्यास किया जा सकता है। फिर जिस मनुष्यकी बुद्धि सम हो गई है, उसे सांख्य-मार्गके अनुसार कर्मोंका त्याग करनेमे क्या हर्ज है? इस प्रश्नका उत्तर भगवान् इस प्रकार देते हैं, कि पहले तुझे सांख्य और योग नामक दो निष्ठाएं बतलाई हैं सही, परंतु यहभी स्मरण रहे, कि किसी मनुष्यके कर्मोंका सर्वथा छूट जाना असंभव है। जबतक वह देहधारी है, तबतक प्रकृति स्वभावतः उससे कर्म करावेगीही; और जब कि प्रकृतिके ये कर्म छूटतेही नहीं हैं, तब तो इंद्रियनिग्रहके द्वारा बुद्धिको स्थिर और सम करके केवल कर्मेंद्रियोंसेही अपने सब कर्तव्य-कर्मोंको करते रहना अधिक श्रेयस्कर है। इसलिये तू कर्म कर, यदि कर्म नहीं करेगा, तो तुझे खानेतकको न मिलेगा (गीता ३. ३-८)। ईश्वरनेही कर्मको उत्पन्न किया है; मनुष्यने नहीं। जिस समय ब्रह्म- देवने सृष्टि और प्रजाको उत्पन्न किया, उसी समय उसने ‘यज्ञ’कोभी उत्पन्न किया था; और उसने प्रजासे यह कह दिया था, कि यज्ञके द्वारा तुम अपनी समृद्धि कर