श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलो। जब कि ये यज्ञ बिना कर्म किये सिद्ध नहीं होते; तो अब यज्ञको कर्मही कहना चाहिये। इसलिये यह सिद्ध होता है, कि मनुष्य और कर्म साथही साथ उत्पन्न हुए हैं। परंतु ये कर्म केवल यज्ञके लियेही हैं; और यज्ञ करना मनुष्यका कर्तव्य है, इसलिये इन कर्मोंके फल मनुष्यको बंधनमें डालनेवाले नहीं होते। अब यह सच है, कि जो मनुष्य पूर्ण ज्ञानी हो गया, स्वयं उसके लिये कोईभी कर्तव्य शेष नहीं रहता; और न लोगोंमेंभी उसका कुछ अटका रहता है। परंतु इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं हो जाता, कि कर्म मत करो। क्योंकि कर्म करनेसे किसीकोभी छुटकारा न मिलनेके कारण यही अनुमान करना पड़ता है, कि यदि स्वार्थके लिये न हो; तोभी अब उसी कर्मको निष्काम बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये (गीता ३. १७-१९)। इन्हीं बातोंपर ध्यान देकर प्राचीन कालमें जनक आदि ज्ञानी पुरुषोंने कर्म किये हैं; और मैंभी कर रहा हूँ। इसके अतिरिक्त यहभी स्मरण रहे, कि ज्ञानी पुरुषोंके कर्तव्योंमेंसेही एक मुख्य कर्तव्य है, 'लोकसंग्रह करना' अर्थात् अपने बर्तावसे लोगोंको सन्मार्गकी शिक्षा देना और उन्हें उन्नतिके मार्गमें लगा देना, ज्ञानी पुरुषहीका कर्तव्य है। मनुष्य कितनाही ज्ञानवान् क्यों न हो जावे; परंतु प्रकृतिके व्यवहारोंसे उसका छुटकारा नहीं है, इसलिये कर्म छोड़ना तो दूरही रहा; परंतु कर्तव्य समझकर स्वधर्मानुसार कर्म करते रहना और आवश्यकता होनेपर उसीमें मर जानाभी श्रेयस्कर है (गीता. ३. ३०-३५); - इस प्रकार तीसरे अध्यायमें भगवान्ने उपदेश दिया है। भगवान्ने इस प्रकार प्रकृतिको सब कामोंका कर्तृत्व दे दिया, यह देख अर्जुनने प्रश्न किया, कि मनुष्य, इच्छा न रहनेपरभी पाप, क्यों करता है ? तब भगवान्ने यह उत्तर देकर अध्याय समाप्त कर दिया है, कि काम-क्रोध आदि विकार बलात्कारसे मनको भ्रष्ट कर देते हैं; अतएव अपनी इंद्रियोंका निग्रह करके प्रत्येक मनुष्यको अपना मन अपने अधीन रखना चाहिये। सारांश, स्थितप्रज्ञकी नाईं बुद्धिकी समता हो जानेपरभी कर्मसे किसीका छुटकारा नहीं, अतएव यदि स्वार्थके लिये न हो, तोभी लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे कर्म करतेही रहना चाहिये - इस प्रकार कर्मयोगकी आवश्यकता सिद्ध की गई है; और भक्ति-मार्गके परमेश्वरार्पणपूर्वक कर्म करनेके इस तत्त्वकाभी, " कि मुझे सब कर्म अर्पण कर " (गीता ३. ३०-३१) - इसी अध्यायमें प्रथम उल्लेख हो गया है। परंतु यह विवेचन तीसरे अध्यायमें पूरा नहीं हुआ; इसलिये चौथा अध्यायभी उसी विवेचनके लिये आरंभ किया गया है। किसीके मनमें यह शंका न आने पाये, कि अबतक किया गया प्रतिपादन केवल अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लियेही नूतन रचा गया होगा, इसलिये चौथे अध्यायके आरंभमें इस कर्मयोगकी अर्थात् भागवत या नारायणीय धर्मकी त्रेतायुगवाली परंपरा बतलाई गई है। जब श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा, कि आदौ याने युगके आरंभमें मैंनेही यह कर्मयोग-मार्ग विवस्वान्को, विव- स्वान्ने मनुको और मनुने इक्ष्वाकुको बतलाया था, परंतु इस बीचमें यह नष्ट हो गया