श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र था; इसलिये मैंने वही योग (कर्मयोग-मार्ग) तुझे फिरसे बतलाया है। तब अर्जुनने पूछा, कि आप विवस्वानके पहले कैसे होगे ? इसका उत्तर देते हुए भगवानने बतलाया है, कि साधुओंकी रक्षा, दुष्टोंका नाश और धर्मकी संस्थापना करनाही मेरे अवतारोंका प्रयोजन है, एवं इस प्रकार लोकसंग्रहकारक कर्मोंको करते हुएभी उनमें मेरी कुछ आसक्ति नहीं है, इसलिये मैं उनके पापपुण्यादि फलोंका भागी नहीं होता । इस प्रकार कर्मयोगका समर्थन करके और यह उदाहरण देकर कि प्राचीन समयमें जनक आदिनेभी इसी तत्त्वको ध्यानमें लाकर कर्मोंका आचरण किया है; भगवानने अर्जुनको फिर यही उपदेश दिया है, कि "तूभी वैसेही कर्म कर।" तीसरे अध्यायमें मीमांसकोंका जो सिद्धान्त बतलाया गया था, कि "यज्ञके लिये किये गये कर्म बंधक नहीं होते" उसीको अब फिरसे बतलाकर 'यज्ञ'की विस्तृत और व्यापक व्याख्या इस प्रकारकी है-केवल तिल और चावलको जलाना अथवा पशुओंको मारना एक प्रकारका यज्ञ है सही; परंतु यह द्रव्यमय यज्ञ हलके दर्जेका है, और संयमाग्निमें कामक्रोधादि इंद्रिय-वृत्तियोंको जलाना अथवा 'न मम' कहकर सब कर्मोंको ब्रह्ममें स्वाहा कर देना ऊँचे दर्जेका यज्ञ है। इसलिये अब अर्जुनको ऐसा उपदेश किया है, कि तू इस ऊँचे दर्जेके यज्ञके लिये फलाशाका त्याग करके कर्म कर। क्योंकि मीमांसकोंके न्यायके अनुसार यज्ञार्थ किये गये कर्म यदि स्वतंत्र रीतिसे बंधक न हों, तोभी यज्ञका कुछ-न-कुछ फल बिना प्राप्त हुए नहीं रहता, इसलिये यज्ञभी यदि निष्काम बुद्धिसेही किया जावे, तो उसके लिये किया गया कर्म और स्वयं यज्ञ दोनों बंधक न होंगे। अंतमें कहा है, कि साम्य-बुद्धि उसे कहते हैं, जिससे यह ज्ञान हो जावे, कि सब प्राणी अपनेमें या भगवानमें हैं। जब ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तभी सब कर्म भस्म हो जाते हैं; और कर्ताको उनकी कुछ बाधा नहीं होती। "सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते" - सब कर्मोंका लय ज्ञानमें हो जाता है; कर्म स्वयं बंधक नहीं होते, बंध केवल अज्ञानसे उत्पन्न होता है। इसलिये अर्जुनको यह उपदेश देकर, इस अध्यायको पूरा किया गया है, कि अज्ञानको छोड़ कर्मयोगका आश्रय कर; और लड़ाईके लिये खड़ा हो जा। सारांश, इस अध्यायमें ज्ञानकी इस प्रकार प्रस्तावना की गई है, कि कर्मयोग-मार्गकी सिद्धिके लियेभी साम्य-बुद्धिरूप ज्ञानकी आवश्यकता है। कर्मयोगकी आवश्यकता क्या है या कर्म क्यों किये जावें ? इसके कारणोंका विचार तीसरे और चौथे अध्यायमें किया गया है सही; परंतु दूसरे अध्यायमें सांख्य- ज्ञानका वर्णन करके कर्मयोगके विवेचनमेंभी बारबार कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ बतलाई गयी है, इसलिये यह बतलाना अब अत्यंत आवश्यक है, कि इन दो मार्गोंमें कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है। क्योंकि यदि दोनों मार्ग एक-सी योग्यताके कहे जायें, तो परिणाम यह होगा, कि जिसे जो मार्ग अच्छा लगेगा वह उसीको अंगीकार कर लेगा, केवल कर्मयोगकोही स्वीकार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। अर्जुनके