श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताध्याय-संगति ४५३ मनमें यही शंका उत्पन्न हुई, इसलिये उसने पाँचवे अध्यायके आरंभमें भगवान्से पूछा है, कि “सांख्य और योग, इनदोनों निष्ठाओंको एकत्र करके मुझे उपदेश कीजिये, मुझे केवल इतनाही निश्चयात्मक बतला दीजिये, कि इन दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है, जिससे कि मैं सहजही उसके अनुसार बर्ताव कर सकूँ।” इसपर भगवान्ने स्पष्ट रीतिसे यह कहकर अर्जुनका संदेह दूर कर दिया है, कि यद्यपि दोनों मार्ग निःश्रेयस्कर हैं, अर्थात् एक-सेही मोक्षप्रद हैं, तथापि उनमें कर्मयोगकी योग्यता अधिक है- “कर्मयोगो विशिष्यते” (गीता ५. २)। इसी सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये भगवान् औरभी कहते हैं, कि संन्यास या सांख्यनिष्ठासे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोगसेभी मिलता है। इतनाही नहीं, परंतु कर्मयोगमें जो निष्काम बुद्धि बतलाई गई है, उसे बिना प्राप्त किये संन्यास सिद्ध नहीं होता; और जब वह प्राप्त हो जाती है, तब योग-मार्गसे कर्म करते रहनेपरभी ब्रह्म-प्राप्ति अवश्य हो जाती है। फिर यह झगड़ा करनेसे क्या लाभ है, कि सांख्य और योग भिन्न भिन्न हैं? यदि हम चलना, बोलना, देखना, सुनना, सूंघना इत्यादि सैकड़ों कर्मोंको छोड़ना चाहें, तोभी वे नहीं छूटते, इस दशामें कर्मोंको छोड़नेका हठ न कर उन्हें ब्रह्मार्पण बुद्धिसे करते रहनाही बुद्धिमत्ताका मार्ग है। इसलिये तत्त्वज्ञानी पुरुष निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहते हैं; और अंतमें उन्हींके द्वारा मोक्षकी प्राप्ति कर लिया करते हैं। ईश्वर तुमसे न यह कहता है, कि कर्म करो; और न यह कहता है, कि उनका त्याग कर दो ! यह तो सब प्रकृतिकी क्रीड़ा है; और बंधक मनका धर्म है, इसलिये जो मनुष्य सम-बुद्धिसे अथवा, 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' होकर कर्म किया करता है, उसे उन कर्मोंकी बाधा नहीं होती। अधिक क्या कहें; इस अध्यायके अंतमें यहभी कहा है, कि जिसकी बुद्धि कुत्ता, चांडाल, ब्राह्मण, गौ, हाथी इत्यादिके प्रति सम हो जाती है, और जो सर्वभूतान्तर्गत आत्माकी एकताको पहचान कर अपने व्यवहार करने लगता है, उसे बैठे-बिठाये ब्रह्मानिर्वाणरूपी मोक्ष प्राप्त हो जाता है - मोक्ष- प्राप्तिके लिये उसे कहीं भटकना नहीं पड़ता; वह सदामुक्तही है। छठे अध्यायमें वही विषय आगे चल रहा है; और उसमें कर्मयोगकी सिद्धिके लिये आवश्यक सम-बुद्धिकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन है। पहलेही श्लोकमें भगवान्ने अपना मत स्पष्ट बतला दिया है, कि जो मनुष्य कर्मफलकी आशा न रख, केवल कर्तव्य समझकर सन्मार्गके प्राप्त कर्म करता रहता है, वही सच्चा योगी और सच्चा संन्यासी है; जो मनुष्य अग्निहोत्र आदि कर्मोंका त्यागकर चुपचाप बैठा रहे, वह सच्चा संन्यासी नहीं है। इसके बाद भगवान्ने आत्मस्वतंत्रताका इस प्रकार वर्णन किया है, कि कर्मयोग-मार्गमें बुद्धिको स्थिर करनेके लिये इन्द्रियनिग्रहरूपी जो कर्म करना पड़ता है, उसे स्वयं आपही करे; यदि कोई ऐसा न करे, तो किसी दूसरेपर उसका दोषारोपण नहीं किया जा सकता। इसके आगे इस अध्यायमें इंद्रियनिग्रह- रूपी योगकी साधनाका, पातंजलयोगकी दृष्टिसे, मुख्यतः वर्णन किया गया है।