श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परंतु यम-नियम-आसन-प्राणायाम आदि साधनोंके द्वारा यद्यपि इंद्रियोंका निग्रह किया जावे, तोभी उतनेमेही काम नहीं चलता, इसलिये आत्मैक्यज्ञानकीभी आवश्यकताके विषयमें इसी अध्यायमें कहा गया है, कि आगे उस पुरुषकी वृत्ति "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" अथवा "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति" (गीता ६. २९, ३०) इस प्रकार सब प्राणियोंमें सम हो जानी चाहिये। इतनेमें अर्जुनने यह शंका उपस्थित की, कि यदि यह साम्यबुद्धिरूपी योग एक जन्ममें सिद्ध न हो, तो फिर दूसरे जन्ममेंभी आरंभहीमे उसका अभ्यास करना होगा - और फिरभी वही दशा होगी - और इस प्रकार यदि यह चक्र हमेशा चलताही रहे, तो मनुष्यको इस मार्गके द्वारा सद्गति प्राप्त होना असंभव है। इस शंकाका निवारण करनेके लिये भगवानने पहले यह कहा है, कि योगमार्गमें कुछभी व्यर्थ नहीं जाता। पहले जन्मके संस्कार शेष रह जाते हैं; और उनकी सहायतासे दूसरे जन्ममें अधिक अभ्यास होता है, तथा क्रम-क्रमसे अंतमे सिद्धि मिल जाती है। इतना कहकर भगवानने इस अध्यायके अंतमे अर्जुनको पुनः यह निश्चित और स्पष्ट उपदेश किया है, कि कर्मयोग-मार्गही श्रेष्ठ और क्रमशः सुसाध्य है, इसलिये केवल (अर्थात् फलाशाको न छोड़ते हुए) कर्म करना, तपश्चर्या करना, ज्ञानके द्वारा कर्मसंन्यास करना इत्यादि सब मार्गोंको छोड़ दे, और तू योगी हो जा - अर्थात् निष्काम कर्मयोग- मार्गका आचरण करने लग। कुछ लोगोंका मत है, कि यहाँ अर्थात् पहले छः अध्यायोंमें कर्मयोगका विवेचन पूरा हो गया और इसके आगे ज्ञान और भक्तिको 'स्वतंत्र' निष्ठा मानकर भगवानने उनका वर्णन किया है - अर्थात् ये दोनों निष्ठाएँ परस्पर निरपेक्ष या कर्मयोगकी बराबरी की, परंतु उससे पृथक् और उसके बदले विकल्पके नातेसे आचरणीय हैं। सातवे अध्यायसे बारहवें अध्यायतक भक्तिका और आगे शेष छः अध्यायोंमें ज्ञानका वर्णन किया गया है; और इस प्रकार अठारह अध्यायोंके विभाग करनेसे कर्म, भक्ति और ज्ञानमेसे प्रत्येकके हिस्सेमे छः छः अध्याय आते हैं; तथा गीताके समान भाग हो जाते हैं। परंतु यह मत ठीक नहीं है। पाँचवें अध्यायके आरंभके श्लोकोंसे स्पष्ट मालूम हो जाता है, कि जब अर्जुनकी मुख्य शंका यही थी, कि "मैं सांख्यनिष्ठाके अनुसार युद्ध करना छोड़ दूँ, या युद्धके भयंकर परिणामको प्रत्यक्ष दृष्टिके सामने देखते हुएभी युद्धही करूँ? और यदि युद्धही करना पड़े, तो उसके पापसे कैसे बचूँ?" - तब उसका समाधान ऐसे अधूरे और अनिश्चित उत्तरसे कभी होही न सकता था, कि "ज्ञानसे मोक्ष मिलता है; और वह कर्मसेभी प्राप्त हो जाता है; अथवा यदि तेरी इच्छा हो, तो भक्ति नामकी एक और तीसरी निष्ठाभी है।" इसके अतिरिक्त यह माननाभी ठीक न होगा, कि जब अर्जुन किसी एकही निश्चयात्मक मार्गको जानना चाहता है, तब सर्वज्ञ और चतुर श्रीकृष्ण उसके प्रश्नके मूल स्वरूपको छोड़कर उसे तीन स्वतंत्र और विकल्पात्मक मार्ग बतला दें। सच बात तो यह है,