भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 500

गीताध्याय-संगति ४५५

कि गीतामें 'कर्मयोग' और 'संन्यास' इन्ही दो निष्ठाओंका विचार है (गीता ५. १); और यहभी साफ़ साफ़ बतला दिया है, कि इनमेंसे 'कर्मयोग'ही अधिक श्रेयस्कर है (गीता ५. २)। भक्तिकी तीसरी निष्ठा तो कही बतलाईभी नहीं गई है। अर्था यह कल्पना सांप्रदायिक टीकाकारोंकी मनगढंत है, कि ज्ञान, कर्म और भक्ति तीन स्वतंत्र निष्ठाएँ हैं; और उनकी यह समझ होनेके कारण, कि गीतामें केवल मोक्षके उपायोंकाही वर्णन किया गया है, उन्हें ये तीन निष्ठाएं कदाचित् भागवतमें सूझी हों (भाग. ११. २०. ६)। परंतु टीकाकारोंके ध्यानमें यह बात नही आई, कि भागवत-पुराण और भगवद्गीताका तात्पर्य एक नहीं है। यह सिद्धान्त भागवतकार कोभी मान्य है, कि केवल कर्मोंसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, मोक्षके लिये ज्ञानकी आवश्यकता रहती है। परंतु इसके अतिरिक्त, भागवत-पुराणका यह भी कथन है, कि यद्यपि ज्ञान और नैष्कर्म्य मोक्षदायक हो, तथापि ये दोनों (अर्थात् गीता-प्रति- पादित निष्काम कर्मयोग) भक्तिके बिना शोभा नहीं देते - "नैष्कर्म्यमप्यच्युत- भाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम्" (भाग. १२. १२. ५२; १. २. १२)। इस प्रकार देखा जाय तो स्पष्ट प्रकट होता है, कि भागवतकार केवल भक्तिकोही सच्ची निष्ठा अर्थात् अंतिम मोक्षप्रद स्थिति मानते हैं। भागवतका न तो यह कहना है, कि भगवद्भक्तोंको ईश्वरार्पण बुद्धिसे कर्म करनाही नहीं चाहिये; और न यह कहना है, कि करनाही चाहिये। भागवत-पुराणका सिर्फ यह कहना है, कि निष्काम कर्म करो अथवा न करो - ये सब भक्तियोगकेही भिन्न भिन्न प्रकार हैं (भाग. ३. २९. ७-१९)। भक्तिके अभावमें सब कर्मयोग पुनः संसारमें अर्थात् जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाले हो जाते हैं (भाग. १. ५. ३४, ३५)। सारांश, यह है, कि भागवतकारका मार्ग विशेषतः भक्तिपरही होनेके कारण उन्होंने निष्काम कर्मयोग- कोभी भक्तियोगमेंही ढकेल दिया है; और यह प्रतिपादन किया है, कि अकेली भक्तिही सच्ची निष्ठा है ! परंतु भक्तिही कुछ गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय नहीं है। इसलिये भागवतके उपर्युक्त सिद्धान्त या परिभाषाको गीतामें घुसेड़ देना वैसेही अयोग्य है, जैसे कि आममें शरीफेकी कलम लगाना। गीता इस बातको पूरी तरह मानती है, कि परमेश्वरके ज्ञानके सिवा और किसीभी अन्य उपायसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, और इस ज्ञानकी प्राप्तिके लिये भक्ति एक सुगम मार्ग है, परंतु इसी मार्गके विषयमे आग्रह न कर गीता यहभी कहती है, कि मोक्षप्राप्तिके लिये जिस ज्ञानकी आवश्यकता है, उसकी प्राप्ति, जिसे जो मार्ग सुगम हो, वह उसी मार्गसे कर ले। गीताका मुख्य विषय तो यही है, कि अंतमें अर्थात् ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर मनुष्य कर्म करे अथवा न करे। इसलिये संसारमें जीवन्मुक्त पुरुषोंके जीवन व्यतीत करनेके जो दो मार्ग दीख पड़ते हैं - अर्थात् कर्म करना और कर्म छोड़ना - वहींसे गीताके उपदेशका आरंभ किया गया है। इनमेंसे पहले मार्गको गीताने भागवतकारकी नाई 'भक्तियोग' यह नया नाम नहीं दिया है; किंतु नारायणीय धर्ममें प्रचलित प्राचीन