श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नामही - अर्थात् ईश्वरार्पण-बुद्धिसे कर्म करनेको 'कर्मयोग' या 'कर्मनिष्ठा' और ज्ञानोत्तर कर्मोंका त्याग करनेको 'सांख्य' या 'ज्ञाननिष्ठा', यही नाम गीतामें स्थिर रखे गये हैं। गीताकी इस परिभाषाको स्वीकार कर यदि विचार किया जाय, तो दीख पड़ेगा, कि ज्ञान और कर्मकी बराबरीकी भक्ति नामक कोई तीसरी स्वतंत्र निष्ठा कदापि नहीं हो सकती । इसका कारण यह है, कि 'कर्म करना' और 'न करना' अर्थात् 'छोड़ना' (योग और सांख्य) ऐसे अस्तिनास्तिरूप दो पक्षोंके अतिरिक्त कर्मके विषयमें तीसरा पक्षही अब बाकी नहीं रहता । इसलिये यदि गीताके अनुसार किसी भक्तिमान् पुरुषकी निष्ठाके विषयमें निश्चय करना हो, तो यह निर्णय केवल इसी बातसे नहीं किया जा सकता, कि वह भक्तिभावमें लगा हुआ है, परंतु इस बातका विचार किया जाना चाहिये, कि वह कर्म करता है या नहीं । भक्ति परमेश्वर- प्राप्तिका एक सुगम साधन है और साधनके नातेसे यदि भक्तिहीको 'योग' कहें (गीता १४. २६), तो वह अंतिम 'निष्ठा' नहीं हो सकती । भक्तिके द्वारा परमेश्वरका ज्ञान हो जानेपर जो मनुष्य कर्म करेगा, उसे 'कर्मनिष्ठ' और जो न करेगा, उसे 'सांख्यनिष्ठ' कहना चाहिये, पाँचवें अध्यायमें भगवानने अपना यह अभिप्राय स्पष्ट बतला दिया है, कि उक्त दोनों निष्ठाओंमें कर्म करनेकी निष्ठा अधिक श्रेयस्कर है। परंतु कर्मपर संन्यास-मार्गवालोंका यह महत्त्वपूर्ण आक्षेप है, कि परमेश्वरका ज्ञान होनेमें कर्मसे प्रतिबंध होता है; और परमेश्वरके ज्ञानबिना तो मोक्षकी प्राप्तिही नहीं हो सकती, इसलिये कर्मोंका त्यागही करना चाहिये । पाँचवें अध्यायमें सामान्यतः यह बतलाया गया है, कि उपर्युक्त आक्षेप असत्य है; और संन्यास-मार्गसे जो मोक्ष मिलता है, वही कर्मयोग-मार्गसेभी मिलता है (गीता ५. ५) परंतु वहाँ इस सामान्य सिद्धान्तका कुछभी स्पष्टीकरण नहीं किया गया था, इसलिये अब भगवान् उस बचे हुए तथा महत्त्वपूर्ण विषयका विस्तृत निरूपण कर रहे हैं, कि कर्म करते रहनेहीसे परमेश्वरके ज्ञानकी प्राप्ति होकर मोक्ष किस प्रकार मिलता है । इसी हेतुसे सातवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनसे यह न कहकर, कि मैं तुझे भक्ति नामक एक स्वतंत्र तीसरी निष्ठा बतलाता हूं, भगवान् यह कहते हैं, कि :- मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युंजन मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ "हे पार्थ ! मुझमें चित्तको स्थिर करके और मेरा आश्रय लेकर योग याने कर्म- योगका आचरण करते समय, 'यथा' अर्थात् जिस रीतिसे मुझे संदेहरहित पूर्णतया जान सकेगा, वह (रीति तुझे बतलाता हूँ) सुन" (गीता. ७ १) ; और इसीको आगेके श्लोकमें 'ज्ञानविज्ञान' कहा है (गीता ७. २) । इनमेंसे पहले अर्थात् ऊपर दिये गये 'मय्यासक्तमनाः' श्लोकके 'योगं युंजन' - अर्थात् "कर्मयोगका आचरण करते हुए" - ये पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। परंतु किसीभी टीकाकारने इनकी ओर