भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 956 में से

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पृष्ठ 502

विशेष ध्यान नहीं दिया है । 'योग' अर्थात् वही कर्मयोग है, कि जिसका वर्णन पहले छः अध्यायोंमें किया जा चुका है; और इस कर्मयोगका आचरण करते हुए जिस विधि या रीतिसे भगवान्‌का पूरा ज्ञान हो जायगा, उस रीति या विधिका वर्णन अब याने सातवें अध्यायमे प्रारंभ करना है- यही इस श्लोकका अर्थ है । अर्थात् पहले छः अध्यायोंका अगले अध्यायोंमे संबंध बतलानेके लिये यह श्लोक जानबूझकर सातवे अध्यायके आरंभमें रखा गया है । इसलिये इस श्लोकके अर्थकी ओर ध्यान न देकर यह कहना बिलकुल अनुचित है, कि "पहले छः अध्यायोंके बाद भक्तिनिष्ठाका स्वतंत्र रीतिमे वर्णन किया गया है।" केवल इतनाही नहीं, वरन् यहभी कहा जा सकता है, कि इस श्लोकमें 'योगं युञ्जन्' पद जानबूझकर इसी लिये रखे गये हैं, कि जिससे कोई ऐसा विपरीत अर्थ न करने पावे । गीताके पहले पाँच अध्यायोंमें कर्मकी आवश्यकता बतलाकर सांख्य-मार्गकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ कहा गया है; और इसके बाद छठे अध्यायमें पातंजलयोगके साधनोंका वर्णन किया गया है, जो कर्म- योगमें इंद्रियनिग्रह कर्मयोगके लिये आवश्यक है । परंतु इतनेहीसे कर्मयोगका वर्णन पूरा नहीं हो जाता । इंद्रियनिग्रह मानो कर्मेंद्रियोंसे एक प्रकारकी कसरत करना है । यह सच है, कि अभ्यासके द्वारा इंद्रियोंको हम अपने अधीन रख सकते हैं; परंतु यदि मनुष्यकी वासनाही बुरी होगी, तो इंद्रियोंको काबूमें रखनेसे कुछभी लाभ नही होगा । क्योंकि देखा जाता है, कि दुष्ट वासनाओके कारण कुछ लोग इसी इंद्रियनिग्रहरूप सिद्धिका जारण-मारण आदि दुष्कर्मोंमें उपयोग किया करते हैं । इसलिये छठे अध्यायमें कहा है, कि इंद्रियनिग्रहके साथही वासनाभी "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" की नाई शुद्ध हो जानी चाहिये (गीता ६. २९); और ब्रह्मात्मैक्यरूप परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपकी पहचान हुए बिना वासनाकी इस प्रकार शुद्धता होना असंभव है । तात्पर्य यह है, कि जो इंद्रियनिग्रह कर्मयोगके लिये आवश्यक है, वह भलेही प्राप्त हो जाय; परंतु 'रस' अर्थात् विषयोंकी चाह मनमें ज्यों-की-त्यों बनीही रहती है। इस रस अथवा विषयवासनाका नाश करनेके लिये परमेश्वरसंबंधी पूर्ण ज्ञानकीही आवश्यकता है-यह बात गीताके दूसरे अध्यायमें कही गई है (गीता २. ५९) । इसलिये कर्मयोगका आचरण करते हुएही जिस रीति अथवा विधिसे परमेश्वरका यह ज्ञान प्राप्त होता है, उसी विधिका अब भगवान् सातवें अध्यायसे वर्णन करते हैं।"कर्मयोगका आचरण करते हुए"-इस पदमे यहभी सिद्ध होता है, कि कर्मयोगके जारी रहतेही इस ज्ञानकी प्राप्ति कर लेनी है, उसके लिये कर्मोंको छोड़ नहीं बैठना है; और इसीसे यह कहनाभी निर्मूल हो जाता है, कि भक्ति और ज्ञानको कर्मयोगके बदले विकल्प मानकर इन्ही दो स्वतंत्र मार्गोका वर्णन सातवें अध्यायमे आगे किया गया है। गीताका कर्मयोग भागवत धर्मसेही लिया गया है, इसलिये कर्मयोगमें ज्ञान-प्राप्तिकी विधिका जो वर्णन है, वह भागवत धर्म अथवा नारायणीय धर्ममें कही गई विधिकाही वर्णन है; और इसी