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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

४५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

अभिप्रायसे शांतिपर्वके अंतमें वैशंपायनने जनमेजयसे कहा है, कि "भगवद्गीतामें प्रवृत्ति-प्रधान नारायणीय धर्म और उसकी विधियोंका वर्णन किया गया है।" (पहले प्रकरणके आरंभमें दिये गये श्लोक देखिये) । वैशंपायनके कथनानुसार इसीमें संन्यास-मार्गकी विधियोंकाभी अंतर्भाव होता है। क्योकि यद्यपि इन दोनों मार्गोंमें "कर्म करना अथवा कर्मोंको छोड़ना" यही भेद है, तथापि दोनोंको एकही ज्ञानविज्ञानकी आवश्यकता है, इसलिये दोनों मार्गोंमें ज्ञान-प्राप्तिकी विधियाँ एक- ही-सी होती हैं। परंतु जबकि उपर्युक्त श्लोकमें "कर्मयोगका आचरण करते हुए" – ऐसे प्रत्यक्ष पद रखे गये हैं, तब स्पष्ट रीतिसे यही सिद्ध होता है, कि गीताके सातवें और उसके अगले अध्यायोंमें ज्ञान-विज्ञानका निरूपण मुख्यतः कर्मयोगहीकी पूर्तिके लिये किया है और उसकी व्यापकताके कारण उसमें संन्यासमार्गकीभी विधियोंका समावेश हो जाता है, कर्मयोगको छोड़कर केवल सांख्यनिष्ठाके समर्थनके लिये यह ज्ञानविज्ञान नहीं बतलाया गया है। दूसरी यह बातभी ध्यान देने योग्य है, कि सांख्य-मार्गवाले यद्यपि ज्ञानको महत्त्व दिया करते हैं, तथापि वे कर्मको या भक्तिको कुछभी महत्त्व नहीं देते; और गीतामें तो भक्ति सुगम तथा प्रधान मानी गई है, इतनाही क्यों, वरन् अध्यात्मज्ञान और भक्तिका वर्णन करते समय श्रीकृष्णने अर्जुनको जगह-जगहपर यही उपदेश दिया है, कि "तू कर्म अर्थात् युद्ध कर" (गीता ८.७; ११.३३; १६. २४; १८.६)। इसलिये यही सिद्धान्त करना पड़ता है, गीताके सातवें और अगले अध्यायोंमें ज्ञान-विज्ञानका जो निरूपण है, वह पिछले छः अध्यायोंमें कहे गये कर्मयोगकी पूर्ति और समर्थनके लियेही बतलाया गया है, यहाँ केवल सांख्यनिष्ठाका या केवल भक्तिका स्वतंत्र समर्थन विवक्षित नहीं है। ऐसा सिद्धान्त करनेपर कर्म, भक्ति और ज्ञान इस प्रकार गीताके तीन परस्पर स्वतंत्र विभाग नहीं हो सकते। इतनाही नहीं; परंतु अब यह विदित हो जायगा, कि यह मतभी (जिसे कुछ लोग प्रकट किया करते हैं) केवल काल्पनिक अतएव मिथ्या है, कि 'तत्त्वमसि' महावाक्यमें तीनही पद हैं, और गीताके अध्यायभी अठारह हैं, इसलिये 'छः त्रिक अठारह' के हिसाबसे गीताके छः छः अध्यायोंके तीन समान विभाग करके, पहले छः अध्यायोंमें 'त्वम्' पदका, दूसरे छः अध्यायोंमें 'तत्' पदका और तीसरे छः अध्यायोंमें 'असि' पदका विवेचन किया गया है। इस मतको काल्पनिक या मिथ्या कहनेका कारण यही है, कि अब तो यह एकदेशीय पक्षही शेष नहीं रहने पाता; जो यह कहे, कि सारी गीतामें केवल ब्रह्मज्ञानकाही प्रतिपादन किया गया है, तथा 'तत्त्वमसि' महावाक्यके विवरणके सिवा गीतामें और कुछ अधिक नहीं है। इस प्रकार जब मालूम हो गया, कि भगवद्गीतामें भक्ति और ज्ञानका विवे- चन क्यों किया गया है, तब सातवेंसे सत्रहवे अध्यायके अंततक ग्यारहों अध्यायोंकी संगति सहजही ध्यानमें आ जाती है। पीछे छठे प्रकरणमें बतला दिया गया है, कि