श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताध्याय-संगति ४५९ जिस परमेश्वर-स्वरूपके ज्ञानसे बुद्धि रसवर्ज्य और सम होती है, उस परमेश्वर- स्वरूपका विचार एक बार क्षराक्षर-दृष्टिसे और फिर क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-दृष्टिसे करना पड़ता है; और उसमें अंतमें यह सिद्धान्त किया जाता है, कि जो तत्त्व पिंडमें है वही ब्रह्मांडमें है। इन्हीं विषयोंका अब गीतामें वर्णन है। परंतु जब इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका विचार करने लगते हैं, तब दीख पड़ता है, कि परमेश्वरका स्वरूप कभी तो व्यक्त ( इंद्रियगोचर ) होता है और कभी अव्यक्त। फिर ऐसे प्रश्नोंकाभी विचार इस निरूपणमें करना पड़ता है, कि इन दोनों स्वरूपोंमें श्रेष्ठ कौन-सा है; और इस श्रेष्ठ स्वरूप कैसे उत्पन्न होता है ? इसी प्रकार अब इस बातकाभी निर्णय करना पड़ता है, कि परमेश्वरके पूर्ण ज्ञानमे बुद्धिको स्थिर, सम और आत्मनिष्ठ करनेके लिये परमेश्वरकी जो उपासना करनी पड़ती है, वह कैसी हो – अव्यक्तकी उपासना करना अच्छा है, अथवा व्यक्तकी ? और इसीके साथ साथ इस विषयकी उपपत्ति बतलानी पड़ती है, कि परमेश्वर यदि एक है, तो व्यक्त सृष्टिमें यह अनेकता क्यों दीख पड़ती है ? इन सब विषयोंको व्यवस्थित रीतिसे बतलानेके लिये यदि ग्यारह अध्याय लग गये, तो कुछ आश्चर्य नहीं। हम यह नहीं कहते, कि गीतामें भक्ति और ज्ञानका बिलकुल विवेचनही नहीं है। हमारा केवल इतनाही कहना है, कि कर्म, भक्ति और ज्ञानको तीन स्वतंत्र विषय या निष्ठाएँ, अर्थात् तुल्यबलकी समझकर, इन तीनोंमें गीताके अठारह अध्यायोंके जो अलग अलग और बराबर बराबर हिस्से कर दिये जाते हैं, वैसा करना उचित नहीं है, किंतु सारी गीतामें एकही निष्ठाका अर्थात् ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान कर्म-योगका प्रतिपादन किया है; और सांख्य- निष्ठा, ज्ञान-विज्ञान या भक्तिका जो निरूपण भगवद्गीतामें पाया जाता है, वह सिर्फ़ कर्मयोग-निष्ठाकीही पूर्ति और समर्थनके लिये आनुषंगिक है, किसी स्वतंत्र विषयका प्रतिपादन करनेके लिये नहीं। अब यह देखना है, कि हमारे इस सिद्धान्तके अनुसार कर्मयोगकी पूर्ति और समर्थनके लिये बतलाये गये ज्ञान-विज्ञानका विभाग गीताके अध्यायोंके क्रमानुसार किस प्रकार किया गया है। सातवें अध्यायमें क्षराक्षर-सृष्टिके अर्थात् ब्रह्मांडके विचारको आरंभ करके भगवानने प्रथम अव्यक्त अथवा अक्षर परब्रह्मके ज्ञानके विषयमें यह कहा है, कि जो इस सारी सृष्टिको – पुरुष और प्रकृतिको – मेरेही पर और अपर स्वरूप जानते हैं, और जो इस मायाके परेके अव्यक्त रूपको पहचानकर मुझे भजते हैं, उनकी बुद्धि सम हो जाती है; तथा उन्हें मैं सद्गति देता हूँ; और फिर उन्होंने अपने स्वरूपका इस प्रकार वर्णन किया है, कि सब देवता, सब प्राणी, सब यज्ञ, सब कर्म और सब अध्यात्म मैही हूँ; मेरे सिवा इस संसारमें अन्य कुछभी नहीं है। इसके बाद आठवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने अध्यात्म, अधियज्ञ, अधिदेव और अधिभूत शब्दोंका अर्थ पूछा है। इन शब्दोंका अर्थ बतलाकर भगवानने कहा है, कि इस प्रकार जिसने मेरा स्वरूप पहचान लिया, उसे मैं कभी नहीं भूलता। इसके बाद