भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 505

४६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इन विषयोंका संक्षेपमें विवेचन है, कि सारे जगतमें अविनाशी या अक्षर-तत्त्व कौन-सा है; सब संसारका संहार कैसे और कब होता है; जिस मनुष्यको परमेश्वरके स्वरूप- का ज्ञान हो जाता है, उसको कौन-सी गति प्राप्त होती है; और ज्ञानके बिना केवल काम्य-कर्म करनेवालेको कौन-सी गति मिलती है। नवें अध्यायमेंभी यही विषय है। इसमें भगवान्ने उपदेश किया है, कि जो अव्यक्त परमेश्वर इस प्रकार चारों ओर प्राप्त है, उसके व्यक्त स्वरूपकी भक्तिके द्वारा पहचान करके अनन्य भावसे उसकी शरणमें जाना ही ब्रह्म-प्राप्तिका प्रत्यक्षावगम्य और सुगम मार्ग अथवा राजमार्ग है; और इसीको राजविद्या या राजगुह्य कहते हैं। तथापि इन तीनों अध्यायोंमें बीच बीचमें भगवान् कर्मयोग-मार्गका यह प्रधान तत्त्व बतलाना नहीं भूले हैं, कि ज्ञानवान् या भक्तिमान् पुरुषोंको कर्म करतेही रहना चाहिये। उदाहरणार्थ, आठवें अध्यायमें कहा है, कि "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च" - इसलिये सदा अपने मनमें मेरा स्मरण रख और युद्ध कर (गीता ८. ७); और नवें अध्यायमें कहा है, कि "सब कर्मोंको मुझे अर्पण कर देनेसे उनके शुभाशुभ फलोंसे तू मुक्त हो जायगा" (गीता ९. २७, २८)। ऊपर भगवान्ने जो यह कहा है, कि सारा संसार मुझमे उत्पन्न हुआ है; और वह मेराही रूप है, वही बात दसवें अध्यायमें ऐसे अनेक उदा- हरण देकर अर्जुनको भली भाँति समझा दी है, कि "संसारकी प्रत्येक श्रेष्ठ वस्तु मेरीही विभूति है।" फिर अर्जुनके प्रार्थना करनेपर ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्ने उसे अपना विश्वरूप प्रत्यक्ष दिखलाया है; और उसकी दृष्टिके सन्मुख इस बातकी सत्यताका अनुभव करा दिया है, कि मैं ही (परमेश्वर) सारे संसारमें चा ओररों व्याप्त हूँ। परन्तु इस प्रकार विश्वरूप दिखला कर और अर्जुनके मनमें यह विश्वास करा के, कि "सब कर्मोंका करानेवाला मैंही हूँ" भगवान्ने तुरंतही कहा है, कि "सच्चा कर्ता तो मैही हूँ, तू निमित्तमात्र है; इसलिये निःशंक होकर युद्ध कर." (गीता ११. ३३)। यद्यपि इस प्रकार यह सिद्ध हो गया, कि संसारमें एकही परमेश्वर है, तोभी अनेक स्थानोंमें परमेश्वरके अव्यक्त स्वरूप कोही प्रधान मानकर यह वर्णन किया गया है, कि "मैं अव्यक्त हूँ परंतु मूर्ख लोग मुझे व्यक्त समझते हैं" (गीता ७. २४); "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति" (गीता ८. ११)। जिसे वेदवेत्तागण अक्षर कहते है; "अव्यक्तको अक्षर कहते हैं" (गीता ८. २१); "मेरे यथार्थ स्वरूपको न पहचानकर मूर्ख लोग मुझे देहधारी मानते है" (गीता ९. ११); "विद्याओंमें अध्यात्मविद्या श्रेष्ठ" (गीता १०. ३२); और अर्जुनके कथनानुसार "त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्" (गीता ११. ३७)। इसीलिये बारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने पूछा है, कि किस परमेश्वरकी - व्यक्तकी या अव्यक्तकी - उपासना करनी चाहिये? तब भगवान्ने अपना यह मत प्रदर्शित किया है, कि जिस व्यक्त स्वरूपकी उपासनाका वर्णन नवें अध्यायमें हो चुका है,