श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताध्याय-संगति ४६१ वही सुगम है, और दूसरे अध्यायमें स्थितप्रज्ञका जैसा वर्णन है, वैसाही परम भगवद्- भक्तोंकी स्थितिका वर्णन करके यह अध्याय पूरा कर दिया है। कुछ लोगोंकी राय है, कि यद्यपि गीताके कर्म, भक्ति और ज्ञान ये तीन स्वतंत्र भाग न भी किये जा सकें; तथापि सातवें अध्यायसे ज्ञान-विज्ञानका जो विषय आरंभ हुआ है, उसके भक्ति और ज्ञान ये दो पृथक् भाग सहजही हो जाते हैं; और वे लोग कहते हैं, कि द्वितीय षडध्यायी भक्तिप्रधान है। परंतु कुछ विचार करनेके उपरान्त किसीकोभी ज्ञात हो जावेगा, कि यह मतभी ठीक नहीं है। कारण यह है, कि सातवें अध्यायका आरंभ क्षराक्षर-सृष्टिके ज्ञान-विज्ञानसे किया गया है; न कि भक्तिसे । और, यदि कहा जाय, कि बारहवें अध्यायमें भक्तिका वर्णन पूरा हो गया है; तो हम देखते हैं, कि अगले अध्यायोंमें ठौर ठौरपर भक्तिके विषयमें बारबार यह उपदेश किया गया है, कि जो बुद्धिके द्वारा स्वरूपको नहीं जान सकते, वे श्रद्धापूर्वक दूसरोंके वचनोंपर विश्वास रखकर मेरा ध्यान करें." (गीता १३. २५), "जो मेरी अव्यभिचारिणी भक्ति करता है, वही ब्रह्मभूत होता है" ( १४. गीता २६), “जो मुझेही पुरुषोत्तम जानता है, वह मेरीही भक्ति करता है" (गीता १५. १९); और अंतमें अठारहवें अध्यायमें पुनः भक्तिकाही इस प्रकार उपदेश किया है, कि "सब धर्मोंको छोड़कर तू मुझको भज" (गीता १८. ६६); इस- लिये हम यह नहीं कह सकते, कि केवल दूसरी षड्ध्यायीहीमें भक्तिका उपदेश है। इसी प्रकार, यदि भगवान्का यह अभिप्राय होता, कि ज्ञानसे भक्ति भिन्न है; तो चौथे अध्यायमें ज्ञानकी प्रस्तावना करके (गीता ४. ३४-३७) सातवें अध्यायके अर्थात् उपर्युक्त आक्षेपकोंके मतानुसार भक्ति-प्रधान षड्ध्यायीके आरंभमें, भगवानने यह न कहा होता, कि अब मैं तुझे वही "ज्ञान और विज्ञान" बतलाता हूँ (गीता ७. २)। यह सच है, कि इससे आगेके नवें अध्यायमें राजविद्या और राजगुह्य अर्थात् प्रत्यक्षावगम्य भक्ति-मार्ग बतलाया है; परंतु अध्यायके आरंभमेंही कह दिया है, कि "तुझे विज्ञानसहित ज्ञान बतलाता हूँ (गीता. ९. १) । इससे स्पष्ट होता है, कि गीतामें भक्तिका समावेश ज्ञानहीमें गया प्रकट किया हैं। दसवें अध्यायमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है; परंतु ग्यारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने उसेही 'अध्यात्म' कहा है (गीता ११. १), और ऊपर यह बतलाही दिया गया है, कि परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय बीच-बीचमें व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्त स्वरूपकी श्रेष्ठताकाभी बातें आ गई हैं। इन्हीं सब बातोंसे बारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने यह प्रश्न किया है, कि उपासना व्यक्त परमे- श्वरकी की जावे या अव्यक्तकी ? तब यह उत्तर देकर, कि अव्यक्तकी अपेक्षा व्यक्तकी उपासना अर्थात् भक्ति सुगम है, भगवानने तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका 'ज्ञान' बतलाना आरंभ कर दिया; और सातवें अध्यायके आरंभके समान चौदहवें अध्यायके आरंभमेंभी कहा है, कि "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् " -