भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

फिरसे मैं तुझे वही 'ज्ञानविज्ञान' पूरी तरहसे बतलाता हूँ ( गीता १८. १ )। इस ज्ञानका वर्णन करते समय भक्तिका सूत्र या संबधभी टूटने नहीं पाया है। इसमे यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है, कि भगवान्‌का उद्देश्य और ज्ञान इन दोनोंको पृथक् रीतिसे बतलानेका नहीं था; किंतु सातवें अध्यायमे जिस ज्ञान-विज्ञानका आरंभ किया गया है, उसीमें दोनों एकत्र गूंथ दिये गये हैं। भक्ति भिन्न है और ज्ञान भिन्न है - यह कहना उस संप्रदायके अभिमानियोंकी नासमझी है, वास्तवमें गीताका अभिप्राय ऐसा नहीं है। अव्यक्तोपासनामें ( ज्ञानमार्गमें ) अध्यात्मविचारमे परमे- श्वरके स्वरूपका जो ज्ञान प्राप्त कर लेना पड़ता है, वही भक्ति-मार्गमेंभी आवश्यक है; परंतु व्यक्तोपासनामें ( भक्ति-मार्गमें ) आरंभमें वह ज्ञान दूसरोंसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जा सकता है ( गीता १३. २५ ); इसलिये भक्ति-मार्ग प्रत्यक्षावगम्य और सामान्यतः सभी लोगोंके लिये सुखकारक है ( गीता ९. २ ), और ज्ञान-मार्ग ( या अव्यक्तोपासना ) क्लेशमय ( गीता १२. ५ ) है - बस, इसके अतिरिक्त इन दो साधनोंमें गीताकी दृष्टिसे और कुछभी भेद नहीं है। परमेश्वर-स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके बुद्धिको सम करनेका जो कर्मयोगका उद्देश्य या साध्य है, वह इन दोनों साधनोंके द्वारा एक-सा-ही प्राप्त होता है। इसलिये चाहे व्यक्तोपासना कीजिये या अव्यक्तोपासना; भगवान्‌को दोनों एकही समान ग्राह्य हैं। तथापि ज्ञानी पुरुष- कोभी उपासनाकी थोड़ी-बहुत आवश्यकता होतीही है; इसलिये चतुर्विध भक्तोंमें भक्तिमान् ज्ञानीको श्रेष्ठ कहकर ( गीता. ७. १७ ) भगवान्‌ने ज्ञान और भक्तिके विरोधको हटा दिया है। कुछभी हो; परंतु जब कि ज्ञान-विज्ञानका वर्णन किया जा रहा है, तब प्रसंगानुसार एक-आध अध्यायमे व्यक्तोपासनाका और किसी दूसरे अध्यायमें अव्यक्तोपासनाका विशेष वर्णन हो जाना अपरिहार्य है। परंतु इतनेहीसे यह संदेह न हो जावे, कि ये दोनों पृथक् पृथक् हैं; इसलिये परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्तकी श्रेष्ठता और अव्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय भक्तिकी आवश्यकता बतला देनाभी भगवान् नहीं भूले हैं। अब विश्वरूपके और विभूतियोंके वर्णनमेंही तीन-चार अध्याय लग गये हैं, इस- लिये यदि इन तीन-चार अध्यायोंको ( षडध्यायीको नहीं ) स्थूलमानसे 'भक्ति-मार्ग' नाम देनाही किसीको पसंद हो, तो ऐसा करनेमें कोई हानि नहीं। कुछभी कहिये; परंतु यह तो निश्चित रूपसे मानना पड़ेगा, कि गीतामें भक्ति और ज्ञानको न तो पृथक् किया है; और न इन दोनों मार्गोंको स्वतंत्रभी कहा है। संक्षेपमें उक्त निरूपणका यही भावार्थ ध्यानमें रहे, कि कर्मयोगमें जिस साम्य-बुद्धिको प्रधानता दी जाती है, उसकी प्राप्तिके लिये परमेश्वरके सर्वव्यापी स्वरूपका ज्ञान हो जाना, चाहिये, फिर यह ज्ञान चाहे व्यक्तकी उपासनासे हो, चाहे अव्यक्तकी; सुगमताके अतिरिक्त इनमें अन्य कोई भेद नहीं है; और गीतामें सातवेंसे लगाकर सत्रहवें अध्यायतक सब विषयोंको 'ज्ञानविज्ञान'को 'अध्यात्म' यही नाम दिया गया है।