भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 508

गीताध्याय-संगति ४६३ जब भगवान्ने अर्जुनके कर्मचक्षुओंको विश्वरूप-दर्शनके द्वारा यह प्रत्यक्ष अनुभव करा दिया, कि परमेश्वरही सारे ब्रह्मांडमें या क्षराक्षर-सृष्टिमें समाया हुआ है; तब तेरहवें अध्यायमें ऐसा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार बतलाया है, कि यही परमेश्वर पिंडमें अर्थात् मनुष्यके शरीरमें या क्षेत्रमें आत्माके रूपमे निवास करता है; और इस आत्माका अर्थात् क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही परमेश्वरकाभी ( परमात्माका ) ज्ञान है। प्रथम परमात्माका अर्थात् परब्रह्मका “ अनादिमत्परं ब्रह्म।” इत्यादि प्रकार-से उपनिषदोंके आधार-से वर्णन करके आगे बतलाया गया है, कि यही क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ-विचार 'प्रकृति' और 'पुरुष' नामक सांख्य-विवेचनमें अंतर्भूत हो गया है; और अंतमें यह वर्णन किया गया है, कि जो 'प्रकृति' और 'पुरुष'के भेदको पहचान- कर अपने 'ज्ञानचक्षुओं'के द्वारा निर्गुण परमात्माको जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। परंतु उसमेंभी कर्मयोगका यह मूल स्थिर रखा गया है, कि “ सब काम प्रकृति करती है, आत्मा कर्ता नहीं है — यह जाननेसे कर्म बंधक नहीं होते ” ( गीता १३. २९) ; और भक्तिका “ ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति ” (गीता. १३. २४) यह सूत्रभी स्थिर रखा है। चौदहवें अध्यायमें इसी ज्ञानका वर्णन करते हुए सांख्य-शास्त्रके अनुसार बतलाया गया है, कि सर्वत्र एकही आत्मा या परमेश्वरके होनेपरभी प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम गुणोंके भेदोंके कारण संसारमें वैचित्र्य उत्पन्न होता है। आगे कहा गया है, कि जो मनुष्य प्रकृतिके इस खेलको जानकर और अपनेको कर्ता न समझ भक्तियोगसे परमेश्वरकी सेवा करता है, वही सच्चा त्रिगुणातीत या मुक्त है। अंतमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर स्थितप्रज्ञ और भक्तिमान् पुरुषकी स्थितिके समानही त्रिगुणातीतकी स्थितिका वर्णन किया गया है। श्रुति-ग्रंथोंमें परमेश्वरका कहीं कहीं वृक्षरूपमे जो वर्णन पाया जाता है, उसीका पंद्रहवें अध्यायके आरंभमें वर्णन करके भगवान्ने बतलाया है, कि जिसे सांख्यवादी “ प्रकृतिका पसारा ” कहते हैं, वही यह अश्वत्थ वृक्ष है; और अंतमें भगवान्ने अर्जुनको यह उपदेश किया है, कि क्षर और अक्षर दोनोंके परे जो पुरुषोत्तम है, उसे पहचानकर उसकी 'भक्ति' करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है; तूभी ऐसाही कर। सोलहवें अध्यायमें कहा गया है, कि प्रकृतिभेदके कारण संसारमें जैसे वैचित्र्य उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मनुष्योंमेंभी दो भेद अर्थात् दैवी संपत्तिवाले और आसुरी संपत्तिवाले होते हैं; इसके बाद उनके कर्मोंका वर्णन किया गया है; और यह बतलाया गया है, कि उन्हें कौन-सी गति प्राप्त होती है। अर्जुनके पूछनेपर सत्रहवें अध्यायमें इस बातका विवेचन किया गया है, कि त्रिगुणात्मक प्रकृतिके गुणोंकी विषमताके कारण उत्पन्न होनेवाला वैचित्र्य श्रद्धा, दान, यज्ञ, तप इत्यादिमेंभी दीख पड़ता है। इसके बाद यह बतलाया गया है, कि 'ॐ तत्सत्' इस ब्रह्मनिर्देशके 'तत्' पदका अर्थ “ निष्कामबुद्धिसे किया गया कर्म ” और 'सत्' पदका अर्थ “ अच्छा परंतु काम्य- बुद्धिसे किया गया कर्म ” होता है; और इस अर्थके अनुसार वह सामान्य ब्रह्म-निर्देशभी