श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मयोग-मार्गकेही अनुकूल है। सारांश-रूपसे सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्याय- तक ग्यारह अध्यायोंका तात्पर्य यही है, कि संसारमें चारों ओर एकही परमे- श्वर व्याप्त है, फिर तुम चाहे उसे विश्वरूप-दर्शनके द्वारा पहचानो, चाहे ज्ञान- चक्षुके द्वारा। शरीरमें क्षेत्रज्ञभी वही है, और क्षर-सृष्टिमें अक्षरभी वही है। वही दृश्य सृष्टिमें व्याप्त है, और उसके बाहर अथवा परेभी है। यद्यपि वह एक है, तोभी प्रकृतिके गुणभेदके कारण व्यक्त सृष्टिमें नानात्व या वैचित्र्य दीख पड़ता है, और इस मायामे अथवा प्रकृतिके गुणभेदके कारणही दान, श्रद्धा, तप, यज्ञ, धृति, ज्ञान इत्यादि तथा मनुष्योंमेंभी अनेक भेद हो जाते हैं। परंतु इन सब भेदोंमें जो एकता है, उसे पहचानकर उस एक और नित्य तत्त्वकी उपासनाके द्वारा - फिर वह उपासना चाहे व्यक्तकी हो, अथवा अव्यक्तकी - प्रत्येक मनुष्य अपनी बुद्धिको स्थिर और सम करे, तथा उस निष्काम, सात्त्विक अथवा साम्य-बुद्धि- सेही संसारमें स्वधर्मानुसार प्राप्त सब व्यवहार केवल कर्तव्य समझ किया करे। इस ज्ञान-विज्ञानका प्रतिपादन, इस ग्रंथके अर्थात् गीतारहस्यके पिछले प्रकरणोंमें विस्तृत रीतिसे किया गया है, इसलिये हमने सातवें अध्यायसे लगाकर सत्रहवें अध्यायतकका सारांशही इस प्रकरणमें दिया है - अधिक विस्तार नहीं किया। हमारा प्रस्तुत उद्देश्य केवल गीताके अध्यायोंकी संगति देखनाही है; अतएव उस कामके लिये जितना भाग आवश्यक है, उतनेकाही हमने यहाँ उल्लेख किया है। कर्मयोगमें कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ है, इसलिये इस बुद्धिको शुद्ध और सम करनेके लिये परमेश्वरकी सर्वव्यापकता अर्थात् सर्वभूतान्तर्गत आत्मैक्यका जो 'ज्ञानविज्ञान' आवश्यक होता है, उसका वर्णन आरंभ करके अबतक इस बातका निरूपण किया गया, कि भिन्न भिन्न अधिकारके अनुसार व्यक्त या अव्यक्तकी उपासनाके द्वारा जब यह यह ज्ञान हृदयमें भिद जाता है, तब बुद्धिको स्थिरता और समता प्राप्त हो जाती है; और कर्मोंका त्याग न करनेपरभी अंतमें मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसीके साथ क्षराक्षरका और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकाभी विचार किया गया है। परंतु भगवानने निश्चित रूपसे कह दिया है, कि इस प्रकार बुद्धिके सम हो जानेपरभी कर्मोंका त्याग करनेकी अपेक्षा फलाशाको छोड़ देना और लोकसंग्रहके लिये आमरण कर्मही करते रहना अधिक श्रेयस्कर है ( गीता ५.२ ) । अतएव स्मृति-ग्रंथोंमें वर्णित 'संन्यासाश्रम' इस कर्मयोगमें नहीं होता; और इससे मन्वादि स्मृति-ग्रंथोंका तथा इस कर्मयोगका विरोध हो जाना संभव है। इसी शंकाको मनमें लाकर अठारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने 'संन्यास' और 'त्याग' का रहस्य पूछा है। भगवान् इस विषयमे यह उत्तर देते हैं, कि 'संन्यास'का मूल अर्थ 'छोड़ना' है; और कर्मयोग-मार्गमें यद्यपि कर्मोंको नहीं छोड़ते, तथापि फलाशाको छोड़ते हैं, इसलिये, कर्मयोग तत्त्वतः संन्यासही होता है; क्योंकि यद्यपि संन्यासीका भेष धारण करके भिक्षा न मांगी जावे, तथापि वैराग्यका और संन्यासका जो तत्त्व स्मृतियोंमें कहा