श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 510, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंगया है - अर्थात् बुद्धिका निष्काम होना - वह कर्मयोगमेंभी स्थिर रहता है। परंतु फलाशाके छूटनेसे स्वर्ग-प्राप्तिकीभी आशा नहीं रहती, इसलिये यहाँ एक और शंका उपस्थित होती है, कि ऐसी दशामें यज्ञायागादिक श्रौतकर्म करनेकी क्या आवश्यकता है? इसपर भगवानने अपना यह निश्चित मत बतलाया है, कि उपर्युक्त कर्म चित्त- शुद्धिकारक हुआ करते हैं; इसलिये उन्हेंभी अन्य कर्मोंके साथ निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये और इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये यज्ञचक्रको हमेशा जारी रखना चाहिये। अर्जुनके प्रश्नोंका इस प्रकार उत्तर देनेपर प्रकृति-स्वभावानुरूप ज्ञान, कर्म_ कर्त्ता, बुद्धि, धृति और सुखके जो सात्त्विक, तामस और राजस भेद हुआ करते हैं, उनका निरूपण करके गुणवैचित्र्यका विषय पूरा किया है। इसके बाद निश्चय किया गया है, कि निष्काम कर्म, निष्काम कर्त्ता, आसक्ति-रहित बुद्धि, अनासक्तिसे होनेवाला सुख, और 'अविभक्तं विभक्तेषु' इस नियमके अनुसार होनेवाला आत्मैक्य-ज्ञान - येही सात्त्विक या श्रेष्ठ हैं। इसी तत्त्वके अनुसार चातुर्वर्ण्यकीभी उपपत्ति बतलाई गई है और कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्य-धर्मसे प्राप्त हुए कर्मोंको सात्त्विक अर्थात् निष्काम बुद्धिसे केवल कर्तव्य मानकर करते रहनेसेही मनुष्य इस संसारमें कृतकृत्य हो जाता है और अंतमें उसे शांति तथा मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। अंतमें भगवानने अर्जुनको भक्ति-मार्गका यह निश्चित उपदेश किया है, कि कर्म तो प्रकृतिका धर्म है, इसलिये यदि तू उन्हें छोड़ना चाहे, तोभी वे न छूटेंगे, अतएव यह समझकर, कि सब करनेवाला और करानेवाला परमेश्वरही है, तू उसकी शरणमें जा और सब काम निष्काम बुद्धिसे करता जा। मैंही वह परमेश्वर हूँ, मुझपर विश्वास रख, मुझे भज, मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा। ऐसा उपदेश करके भगवानने गीताके प्रवृत्ति-प्रधान धर्मका निरूपण पूरा किया है। सारांश यह है, कि इस लोक और परलोक इन दोनोंका विचार करके ज्ञानवान् एवं शिष्ट जनोंने 'सांख्य' और 'कर्मयोग' नामक जिन दो निष्ठाओंको प्रचलित किया है, उन्हींसे गीताके उपदेशका आरंभ हुआ है। इन दोनोंमें-से, पांचवें अध्यायके निर्णयानुसार, जिस कर्मयोगीकी योग्यता अधिक है, जिस कर्मयोगकी सिद्धिके लिये छठे अध्यायमें पातंजलयोगका वर्णन किया है, जिस कर्मयोगके आचरणकी विधिका वर्णन अगले ग्यारह अध्यायोंमें (७ से १७ तक) पिण्डब्रह्मांड-ज्ञानपूर्वक विस्तारसे किया गया है; और यह कहा गया है, कि उस विधिसे आचरण करनेपर परमेश्वरका पूरा ज्ञान हो जाता है, एवं अंतमें मोक्षकी प्राप्ति होती है, उसी कर्मयोगका समर्थन अठारहवें अध्यायमें अर्थात् अंतमेंभी है। और मोक्षरूपी आत्मकल्याणके आड़े न आकर परमेश्वरार्पण-पूर्वक केवल कर्तव्य- बुद्धिसे स्वधर्मानुसार लोकसंग्रहके लिये सब कर्मोंको करते रहनेका जो यह योग या युक्ति है, उसकी श्रेष्ठताका यह भगवत्प्रणीत उपपादन जब अर्जुनने सुना, तभी उसने संन्यास लेकर भिक्षा माँगनेका अपना पहला विचार छोड़ दिया और अब
- केवल भगवानके कहनेहीसे नहीं; किंतु कर्माकर्म-शास्त्रका पूर्ण ज्ञान हो जानेके गी. र. ३०