भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 511

४६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण - वह स्वयं अपनी इच्छासे युद्ध करनेके लिये प्रवृत्त हो गया है। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लियेही गीताका आरंभ हुआ है; और उसका अंतभी वैसेही हुआ है ( गीता १८. ७३ ) । गीताके अठारह अध्यायोंकी जो संगति ऊपर बतलाई गई है, उससे यह प्रकट हो जायगा, कि गीता केवल कर्म, भक्ति और ज्ञान इन तीन स्वतंत्र निष्ठाओंकी खिचड़ी नहीं है; अथवा वह सूत, रेशम और जरीके चिथड़ोंकी सिली हुई गुदड़ी नहीं है; वरन् दीख पड़ेगा, कि सूत, रेशम और जरीके ताने-बानेको यथास्थानमें योग्य रीतिसे एकत्र करके, यह कर्मयोग नामक मूल्यवान् और मनोहर गीतारूपी वस्त्र आदिसे अंत तक " अत्यन्त योगयुक्त चित्तसे " एक-सा बुना गया है। यह सच है, कि निरूपणकी पद्धति संवादात्मक होनेके कारण शास्त्रीय पद्धतिकी अपेक्षा वह, जरा ढीली है, परंतु यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि संवादात्मक निरूपणसे शास्त्रीय पद्धतिकी रुक्षता हट गई है; और उसके बदले गीतामें सुलभता और प्रेमरस भरगया है; तो शास्त्रीय पद्धतिके हेतु-अनुमानोंकी केवल बुद्धिग्राह्य तथा नीरस कटकट छूट जानेका किसीकोभी तिलमात्र बुरा न लगेगा। इसी प्रकार यद्यपि गीता-निरूपणकी पद्धति पौराणिक या संवादात्मक है, तोभी यह बात इस ग्रंथके कुल- विवेचन-से मालूम हो जायगी, कि ग्रंथपरीक्षणकी मीमांसकोंकी सब कसौटियोंपर कसनेपरभी गीताका तात्पर्य निश्चित करनेमें कुछभी बाधा नहीं होती। गीताका आरंभ देखा जाय तो मालूम होगा, कि अर्जुन क्षात्र-धर्मके अनुसार लड़ाई करनेके लिये चला था। जब धर्माधर्मकी विचिकित्साके चक्करमें पड़ गया, तब उसे वेदान्त- शास्त्रके आधारपर प्रवृत्ति-प्रधान कर्मयोग-धर्मका उपदेश करनेके लिये गीता प्रवृत्त हुई है; और हमने पहलेही प्रकरणमें यह बतला दिया है, कि गीताके उपसंहार और फल दोनों इसी प्रकारके अर्थात् प्रवृत्ति-प्रधानही हैं। इसके बाद हमने बतलाया है, कि गीतामें अर्जुनको जो उपदेश किया है, उसमें " तू युद्ध अर्थात् कर्मही कर " ऐसा दस-बारह बार स्पष्ट रीतिसे और पर्यायसे तो अनेक बार ( अभ्यास ) बतलाया है; और हमने यहभी बतलाया है, कि संस्कृत-साहित्यमें कर्मयोगकी उपपत्ति बतलानेवाला गीताके सिवा दूसरा ग्रंथ नहीं है, इसलिये अभ्यास और अपूर्वता इन दो प्रमाणोंसे गीतामें कर्मयोगकी प्रधानताही अधिक व्यक्त होती है। मीमांसकोंने ग्रंथ-तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये जो कसौटियाँ बतलाई हैं, उनमेंसे अर्थवाद और उपपत्ति ये दोनों शेष रह गई थीं। उनके विषयमें पहले पृथक् पृथक् प्रकरणोंमें और अब गीताके अध्यायोंके क्रमानुसार इस प्रकरणमें जो विवेचन किया गया है, उससे यही निष्पन्न हुआ है, कि गीतामें अकेला 'कर्मयोग' ही प्रतिपाद्य विषय है। इस प्रकार ग्रंथतात्पर्य-निर्णयके मीमांसकोंके सब नियमोंका उपयोग करनेपर यही बात निर्विवाद सिद्ध होती है, कि गीता-ग्रंथमें ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान कर्मयोगहीका प्रतिपादन किया गया है। अब इसमें संदेह नहीं, कि इसके अतिरिक्त शेष सब गीता-तात्पर्य

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 511, कुल 956 में से · BharatKosha