श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
४६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इन विषयोंका संक्षेपमें विवेचन है, कि सारे जगतमें अविनाशी या अक्षर-तत्त्व कौन-सा है; सब संसारका संहार कैसे और कब होता है; जिस मनुष्यको परमेश्वरके स्वरूप- का ज्ञान हो जाता है, उसको कौन-सी गति प्राप्त होती है; और ज्ञानके बिना केवल काम्य-कर्म करनेवालेको कौन-सी गति मिलती है। नवें अध्यायमेंभी यही विषय है। इसमें भगवान्ने उपदेश किया है, कि जो अव्यक्त परमेश्वर इस प्रकार चारों ओर प्राप्त है, उसके व्यक्त स्वरूपकी भक्तिके द्वारा पहचान करके अनन्य भावसे उसकी शरणमें जाना ही ब्रह्म-प्राप्तिका प्रत्यक्षावगम्य और सुगम मार्ग अथवा राजमार्ग है; और इसीको राजविद्या या राजगुह्य कहते हैं। तथापि इन तीनों अध्यायोंमें बीच बीचमें भगवान् कर्मयोग-मार्गका यह प्रधान तत्त्व बतलाना नहीं भूले हैं, कि ज्ञानवान् या भक्तिमान् पुरुषोंको कर्म करतेही रहना चाहिये। उदाहरणार्थ, आठवें अध्यायमें कहा है, कि "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च" - इसलिये सदा अपने मनमें मेरा स्मरण रख और युद्ध कर (गीता ८. ७); और नवें अध्यायमें कहा है, कि "सब कर्मोंको मुझे अर्पण कर देनेसे उनके शुभाशुभ फलोंसे तू मुक्त हो जायगा" (गीता ९. २७, २८)। ऊपर भगवान्ने जो यह कहा है, कि सारा संसार मुझमे उत्पन्न हुआ है; और वह मेराही रूप है, वही बात दसवें अध्यायमें ऐसे अनेक उदा- हरण देकर अर्जुनको भली भाँति समझा दी है, कि "संसारकी प्रत्येक श्रेष्ठ वस्तु मेरीही विभूति है।" फिर अर्जुनके प्रार्थना करनेपर ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्ने उसे अपना विश्वरूप प्रत्यक्ष दिखलाया है; और उसकी दृष्टिके सन्मुख इस बातकी सत्यताका अनुभव करा दिया है, कि मैं ही (परमेश्वर) सारे संसारमें चा ओररों व्याप्त हूँ। परन्तु इस प्रकार विश्वरूप दिखला कर और अर्जुनके मनमें यह विश्वास करा के, कि "सब कर्मोंका करानेवाला मैंही हूँ" भगवान्ने तुरंतही कहा है, कि "सच्चा कर्ता तो मैही हूँ, तू निमित्तमात्र है; इसलिये निःशंक होकर युद्ध कर." (गीता ११. ३३)। यद्यपि इस प्रकार यह सिद्ध हो गया, कि संसारमें एकही परमेश्वर है, तोभी अनेक स्थानोंमें परमेश्वरके अव्यक्त स्वरूप कोही प्रधान मानकर यह वर्णन किया गया है, कि "मैं अव्यक्त हूँ परंतु मूर्ख लोग मुझे व्यक्त समझते हैं" (गीता ७. २४); "यदक्षरं वेदविदो वदन्ति" (गीता ८. ११)। जिसे वेदवेत्तागण अक्षर कहते है; "अव्यक्तको अक्षर कहते हैं" (गीता ८. २१); "मेरे यथार्थ स्वरूपको न पहचानकर मूर्ख लोग मुझे देहधारी मानते है" (गीता ९. ११); "विद्याओंमें अध्यात्मविद्या श्रेष्ठ" (गीता १०. ३२); और अर्जुनके कथनानुसार "त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्" (गीता ११. ३७)। इसीलिये बारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने पूछा है, कि किस परमेश्वरकी - व्यक्तकी या अव्यक्तकी - उपासना करनी चाहिये? तब भगवान्ने अपना यह मत प्रदर्शित किया है, कि जिस व्यक्त स्वरूपकी उपासनाका वर्णन नवें अध्यायमें हो चुका है,
गीताध्याय-संगति ४६१ वही सुगम है, और दूसरे अध्यायमें स्थितप्रज्ञका जैसा वर्णन है, वैसाही परम भगवद्- भक्तोंकी स्थितिका वर्णन करके यह अध्याय पूरा कर दिया है। कुछ लोगोंकी राय है, कि यद्यपि गीताके कर्म, भक्ति और ज्ञान ये तीन स्वतंत्र भाग न भी किये जा सकें; तथापि सातवें अध्यायसे ज्ञान-विज्ञानका जो विषय आरंभ हुआ है, उसके भक्ति और ज्ञान ये दो पृथक् भाग सहजही हो जाते हैं; और वे लोग कहते हैं, कि द्वितीय षडध्यायी भक्तिप्रधान है। परंतु कुछ विचार करनेके उपरान्त किसीकोभी ज्ञात हो जावेगा, कि यह मतभी ठीक नहीं है। कारण यह है, कि सातवें अध्यायका आरंभ क्षराक्षर-सृष्टिके ज्ञान-विज्ञानसे किया गया है; न कि भक्तिसे । और, यदि कहा जाय, कि बारहवें अध्यायमें भक्तिका वर्णन पूरा हो गया है; तो हम देखते हैं, कि अगले अध्यायोंमें ठौर ठौरपर भक्तिके विषयमें बारबार यह उपदेश किया गया है, कि जो बुद्धिके द्वारा स्वरूपको नहीं जान सकते, वे श्रद्धापूर्वक दूसरोंके वचनोंपर विश्वास रखकर मेरा ध्यान करें." (गीता १३. २५), "जो मेरी अव्यभिचारिणी भक्ति करता है, वही ब्रह्मभूत होता है" ( १४. गीता २६), “जो मुझेही पुरुषोत्तम जानता है, वह मेरीही भक्ति करता है" (गीता १५. १९); और अंतमें अठारहवें अध्यायमें पुनः भक्तिकाही इस प्रकार उपदेश किया है, कि "सब धर्मोंको छोड़कर तू मुझको भज" (गीता १८. ६६); इस- लिये हम यह नहीं कह सकते, कि केवल दूसरी षड्ध्यायीहीमें भक्तिका उपदेश है। इसी प्रकार, यदि भगवान्का यह अभिप्राय होता, कि ज्ञानसे भक्ति भिन्न है; तो चौथे अध्यायमें ज्ञानकी प्रस्तावना करके (गीता ४. ३४-३७) सातवें अध्यायके अर्थात् उपर्युक्त आक्षेपकोंके मतानुसार भक्ति-प्रधान षड्ध्यायीके आरंभमें, भगवानने यह न कहा होता, कि अब मैं तुझे वही "ज्ञान और विज्ञान" बतलाता हूँ (गीता ७. २)। यह सच है, कि इससे आगेके नवें अध्यायमें राजविद्या और राजगुह्य अर्थात् प्रत्यक्षावगम्य भक्ति-मार्ग बतलाया है; परंतु अध्यायके आरंभमेंही कह दिया है, कि "तुझे विज्ञानसहित ज्ञान बतलाता हूँ (गीता. ९. १) । इससे स्पष्ट होता है, कि गीतामें भक्तिका समावेश ज्ञानहीमें गया प्रकट किया हैं। दसवें अध्यायमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है; परंतु ग्यारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने उसेही 'अध्यात्म' कहा है (गीता ११. १), और ऊपर यह बतलाही दिया गया है, कि परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय बीच-बीचमें व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्त स्वरूपकी श्रेष्ठताकाभी बातें आ गई हैं। इन्हीं सब बातोंसे बारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने यह प्रश्न किया है, कि उपासना व्यक्त परमे- श्वरकी की जावे या अव्यक्तकी ? तब यह उत्तर देकर, कि अव्यक्तकी अपेक्षा व्यक्तकी उपासना अर्थात् भक्ति सुगम है, भगवानने तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका 'ज्ञान' बतलाना आरंभ कर दिया; और सातवें अध्यायके आरंभके समान चौदहवें अध्यायके आरंभमेंभी कहा है, कि "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् " -
फिरसे मैं तुझे वही 'ज्ञानविज्ञान' पूरी तरहसे बतलाता हूँ ( गीता १८. १ )। इस ज्ञानका वर्णन करते समय भक्तिका सूत्र या संबधभी टूटने नहीं पाया है। इसमे यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है, कि भगवान्का उद्देश्य और ज्ञान इन दोनोंको पृथक् रीतिसे बतलानेका नहीं था; किंतु सातवें अध्यायमे जिस ज्ञान-विज्ञानका आरंभ किया गया है, उसीमें दोनों एकत्र गूंथ दिये गये हैं। भक्ति भिन्न है और ज्ञान भिन्न है - यह कहना उस संप्रदायके अभिमानियोंकी नासमझी है, वास्तवमें गीताका अभिप्राय ऐसा नहीं है। अव्यक्तोपासनामें ( ज्ञानमार्गमें ) अध्यात्मविचारमे परमे- श्वरके स्वरूपका जो ज्ञान प्राप्त कर लेना पड़ता है, वही भक्ति-मार्गमेंभी आवश्यक है; परंतु व्यक्तोपासनामें ( भक्ति-मार्गमें ) आरंभमें वह ज्ञान दूसरोंसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जा सकता है ( गीता १३. २५ ); इसलिये भक्ति-मार्ग प्रत्यक्षावगम्य और सामान्यतः सभी लोगोंके लिये सुखकारक है ( गीता ९. २ ), और ज्ञान-मार्ग ( या अव्यक्तोपासना ) क्लेशमय ( गीता १२. ५ ) है - बस, इसके अतिरिक्त इन दो साधनोंमें गीताकी दृष्टिसे और कुछभी भेद नहीं है। परमेश्वर-स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके बुद्धिको सम करनेका जो कर्मयोगका उद्देश्य या साध्य है, वह इन दोनों साधनोंके द्वारा एक-सा-ही प्राप्त होता है। इसलिये चाहे व्यक्तोपासना कीजिये या अव्यक्तोपासना; भगवान्को दोनों एकही समान ग्राह्य हैं। तथापि ज्ञानी पुरुष- कोभी उपासनाकी थोड़ी-बहुत आवश्यकता होतीही है; इसलिये चतुर्विध भक्तोंमें भक्तिमान् ज्ञानीको श्रेष्ठ कहकर ( गीता. ७. १७ ) भगवान्ने ज्ञान और भक्तिके विरोधको हटा दिया है। कुछभी हो; परंतु जब कि ज्ञान-विज्ञानका वर्णन किया जा रहा है, तब प्रसंगानुसार एक-आध अध्यायमे व्यक्तोपासनाका और किसी दूसरे अध्यायमें अव्यक्तोपासनाका विशेष वर्णन हो जाना अपरिहार्य है। परंतु इतनेहीसे यह संदेह न हो जावे, कि ये दोनों पृथक् पृथक् हैं; इसलिये परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय व्यक्त स्वरूपकी अपेक्षा अव्यक्तकी श्रेष्ठता और अव्यक्त स्वरूपका वर्णन करते समय भक्तिकी आवश्यकता बतला देनाभी भगवान् नहीं भूले हैं। अब विश्वरूपके और विभूतियोंके वर्णनमेंही तीन-चार अध्याय लग गये हैं, इस- लिये यदि इन तीन-चार अध्यायोंको ( षडध्यायीको नहीं ) स्थूलमानसे 'भक्ति-मार्ग' नाम देनाही किसीको पसंद हो, तो ऐसा करनेमें कोई हानि नहीं। कुछभी कहिये; परंतु यह तो निश्चित रूपसे मानना पड़ेगा, कि गीतामें भक्ति और ज्ञानको न तो पृथक् किया है; और न इन दोनों मार्गोंको स्वतंत्रभी कहा है। संक्षेपमें उक्त निरूपणका यही भावार्थ ध्यानमें रहे, कि कर्मयोगमें जिस साम्य-बुद्धिको प्रधानता दी जाती है, उसकी प्राप्तिके लिये परमेश्वरके सर्वव्यापी स्वरूपका ज्ञान हो जाना, चाहिये, फिर यह ज्ञान चाहे व्यक्तकी उपासनासे हो, चाहे अव्यक्तकी; सुगमताके अतिरिक्त इनमें अन्य कोई भेद नहीं है; और गीतामें सातवेंसे लगाकर सत्रहवें अध्यायतक सब विषयोंको 'ज्ञानविज्ञान'को 'अध्यात्म' यही नाम दिया गया है।
गीताध्याय-संगति ४६३ जब भगवान्ने अर्जुनके कर्मचक्षुओंको विश्वरूप-दर्शनके द्वारा यह प्रत्यक्ष अनुभव करा दिया, कि परमेश्वरही सारे ब्रह्मांडमें या क्षराक्षर-सृष्टिमें समाया हुआ है; तब तेरहवें अध्यायमें ऐसा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार बतलाया है, कि यही परमेश्वर पिंडमें अर्थात् मनुष्यके शरीरमें या क्षेत्रमें आत्माके रूपमे निवास करता है; और इस आत्माका अर्थात् क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही परमेश्वरकाभी ( परमात्माका ) ज्ञान है। प्रथम परमात्माका अर्थात् परब्रह्मका “ अनादिमत्परं ब्रह्म।” इत्यादि प्रकार-से उपनिषदोंके आधार-से वर्णन करके आगे बतलाया गया है, कि यही क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ-विचार 'प्रकृति' और 'पुरुष' नामक सांख्य-विवेचनमें अंतर्भूत हो गया है; और अंतमें यह वर्णन किया गया है, कि जो 'प्रकृति' और 'पुरुष'के भेदको पहचान- कर अपने 'ज्ञानचक्षुओं'के द्वारा निर्गुण परमात्माको जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। परंतु उसमेंभी कर्मयोगका यह मूल स्थिर रखा गया है, कि “ सब काम प्रकृति करती है, आत्मा कर्ता नहीं है — यह जाननेसे कर्म बंधक नहीं होते ” ( गीता १३. २९) ; और भक्तिका “ ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति ” (गीता. १३. २४) यह सूत्रभी स्थिर रखा है। चौदहवें अध्यायमें इसी ज्ञानका वर्णन करते हुए सांख्य-शास्त्रके अनुसार बतलाया गया है, कि सर्वत्र एकही आत्मा या परमेश्वरके होनेपरभी प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम गुणोंके भेदोंके कारण संसारमें वैचित्र्य उत्पन्न होता है। आगे कहा गया है, कि जो मनुष्य प्रकृतिके इस खेलको जानकर और अपनेको कर्ता न समझ भक्तियोगसे परमेश्वरकी सेवा करता है, वही सच्चा त्रिगुणातीत या मुक्त है। अंतमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर स्थितप्रज्ञ और भक्तिमान् पुरुषकी स्थितिके समानही त्रिगुणातीतकी स्थितिका वर्णन किया गया है। श्रुति-ग्रंथोंमें परमेश्वरका कहीं कहीं वृक्षरूपमे जो वर्णन पाया जाता है, उसीका पंद्रहवें अध्यायके आरंभमें वर्णन करके भगवान्ने बतलाया है, कि जिसे सांख्यवादी “ प्रकृतिका पसारा ” कहते हैं, वही यह अश्वत्थ वृक्ष है; और अंतमें भगवान्ने अर्जुनको यह उपदेश किया है, कि क्षर और अक्षर दोनोंके परे जो पुरुषोत्तम है, उसे पहचानकर उसकी 'भक्ति' करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है; तूभी ऐसाही कर। सोलहवें अध्यायमें कहा गया है, कि प्रकृतिभेदके कारण संसारमें जैसे वैचित्र्य उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मनुष्योंमेंभी दो भेद अर्थात् दैवी संपत्तिवाले और आसुरी संपत्तिवाले होते हैं; इसके बाद उनके कर्मोंका वर्णन किया गया है; और यह बतलाया गया है, कि उन्हें कौन-सी गति प्राप्त होती है। अर्जुनके पूछनेपर सत्रहवें अध्यायमें इस बातका विवेचन किया गया है, कि त्रिगुणात्मक प्रकृतिके गुणोंकी विषमताके कारण उत्पन्न होनेवाला वैचित्र्य श्रद्धा, दान, यज्ञ, तप इत्यादिमेंभी दीख पड़ता है। इसके बाद यह बतलाया गया है, कि 'ॐ तत्सत्' इस ब्रह्मनिर्देशके 'तत्' पदका अर्थ “ निष्कामबुद्धिसे किया गया कर्म ” और 'सत्' पदका अर्थ “ अच्छा परंतु काम्य- बुद्धिसे किया गया कर्म ” होता है; और इस अर्थके अनुसार वह सामान्य ब्रह्म-निर्देशभी
४६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मयोग-मार्गकेही अनुकूल है। सारांश-रूपसे सातवें अध्यायसे लेकर सत्रहवें अध्याय- तक ग्यारह अध्यायोंका तात्पर्य यही है, कि संसारमें चारों ओर एकही परमे- श्वर व्याप्त है, फिर तुम चाहे उसे विश्वरूप-दर्शनके द्वारा पहचानो, चाहे ज्ञान- चक्षुके द्वारा। शरीरमें क्षेत्रज्ञभी वही है, और क्षर-सृष्टिमें अक्षरभी वही है। वही दृश्य सृष्टिमें व्याप्त है, और उसके बाहर अथवा परेभी है। यद्यपि वह एक है, तोभी प्रकृतिके गुणभेदके कारण व्यक्त सृष्टिमें नानात्व या वैचित्र्य दीख पड़ता है, और इस मायामे अथवा प्रकृतिके गुणभेदके कारणही दान, श्रद्धा, तप, यज्ञ, धृति, ज्ञान इत्यादि तथा मनुष्योंमेंभी अनेक भेद हो जाते हैं। परंतु इन सब भेदोंमें जो एकता है, उसे पहचानकर उस एक और नित्य तत्त्वकी उपासनाके द्वारा - फिर वह उपासना चाहे व्यक्तकी हो, अथवा अव्यक्तकी - प्रत्येक मनुष्य अपनी बुद्धिको स्थिर और सम करे, तथा उस निष्काम, सात्त्विक अथवा साम्य-बुद्धि- सेही संसारमें स्वधर्मानुसार प्राप्त सब व्यवहार केवल कर्तव्य समझ किया करे। इस ज्ञान-विज्ञानका प्रतिपादन, इस ग्रंथके अर्थात् गीतारहस्यके पिछले प्रकरणोंमें विस्तृत रीतिसे किया गया है, इसलिये हमने सातवें अध्यायसे लगाकर सत्रहवें अध्यायतकका सारांशही इस प्रकरणमें दिया है - अधिक विस्तार नहीं किया। हमारा प्रस्तुत उद्देश्य केवल गीताके अध्यायोंकी संगति देखनाही है; अतएव उस कामके लिये जितना भाग आवश्यक है, उतनेकाही हमने यहाँ उल्लेख किया है। कर्मयोगमें कर्मकी अपेक्षा बुद्धिही श्रेष्ठ है, इसलिये इस बुद्धिको शुद्ध और सम करनेके लिये परमेश्वरकी सर्वव्यापकता अर्थात् सर्वभूतान्तर्गत आत्मैक्यका जो 'ज्ञानविज्ञान' आवश्यक होता है, उसका वर्णन आरंभ करके अबतक इस बातका निरूपण किया गया, कि भिन्न भिन्न अधिकारके अनुसार व्यक्त या अव्यक्तकी उपासनाके द्वारा जब यह यह ज्ञान हृदयमें भिद जाता है, तब बुद्धिको स्थिरता और समता प्राप्त हो जाती है; और कर्मोंका त्याग न करनेपरभी अंतमें मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसीके साथ क्षराक्षरका और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञकाभी विचार किया गया है। परंतु भगवानने निश्चित रूपसे कह दिया है, कि इस प्रकार बुद्धिके सम हो जानेपरभी कर्मोंका त्याग करनेकी अपेक्षा फलाशाको छोड़ देना और लोकसंग्रहके लिये आमरण कर्मही करते रहना अधिक श्रेयस्कर है ( गीता ५.२ ) । अतएव स्मृति-ग्रंथोंमें वर्णित 'संन्यासाश्रम' इस कर्मयोगमें नहीं होता; और इससे मन्वादि स्मृति-ग्रंथोंका तथा इस कर्मयोगका विरोध हो जाना संभव है। इसी शंकाको मनमें लाकर अठारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने 'संन्यास' और 'त्याग' का रहस्य पूछा है। भगवान् इस विषयमे यह उत्तर देते हैं, कि 'संन्यास'का मूल अर्थ 'छोड़ना' है; और कर्मयोग-मार्गमें यद्यपि कर्मोंको नहीं छोड़ते, तथापि फलाशाको छोड़ते हैं, इसलिये, कर्मयोग तत्त्वतः संन्यासही होता है; क्योंकि यद्यपि संन्यासीका भेष धारण करके भिक्षा न मांगी जावे, तथापि वैराग्यका और संन्यासका जो तत्त्व स्मृतियोंमें कहा
गया है - अर्थात् बुद्धिका निष्काम होना - वह कर्मयोगमेंभी स्थिर रहता है। परंतु फलाशाके छूटनेसे स्वर्ग-प्राप्तिकीभी आशा नहीं रहती, इसलिये यहाँ एक और शंका उपस्थित होती है, कि ऐसी दशामें यज्ञायागादिक श्रौतकर्म करनेकी क्या आवश्यकता है? इसपर भगवानने अपना यह निश्चित मत बतलाया है, कि उपर्युक्त कर्म चित्त- शुद्धिकारक हुआ करते हैं; इसलिये उन्हेंभी अन्य कर्मोंके साथ निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये और इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये यज्ञचक्रको हमेशा जारी रखना चाहिये। अर्जुनके प्रश्नोंका इस प्रकार उत्तर देनेपर प्रकृति-स्वभावानुरूप ज्ञान, कर्म_ कर्त्ता, बुद्धि, धृति और सुखके जो सात्त्विक, तामस और राजस भेद हुआ करते हैं, उनका निरूपण करके गुणवैचित्र्यका विषय पूरा किया है। इसके बाद निश्चय किया गया है, कि निष्काम कर्म, निष्काम कर्त्ता, आसक्ति-रहित बुद्धि, अनासक्तिसे होनेवाला सुख, और 'अविभक्तं विभक्तेषु' इस नियमके अनुसार होनेवाला आत्मैक्य-ज्ञान - येही सात्त्विक या श्रेष्ठ हैं। इसी तत्त्वके अनुसार चातुर्वर्ण्यकीभी उपपत्ति बतलाई गई है और कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्य-धर्मसे प्राप्त हुए कर्मोंको सात्त्विक अर्थात् निष्काम बुद्धिसे केवल कर्तव्य मानकर करते रहनेसेही मनुष्य इस संसारमें कृतकृत्य हो जाता है और अंतमें उसे शांति तथा मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। अंतमें भगवानने अर्जुनको भक्ति-मार्गका यह निश्चित उपदेश किया है, कि कर्म तो प्रकृतिका धर्म है, इसलिये यदि तू उन्हें छोड़ना चाहे, तोभी वे न छूटेंगे, अतएव यह समझकर, कि सब करनेवाला और करानेवाला परमेश्वरही है, तू उसकी शरणमें जा और सब काम निष्काम बुद्धिसे करता जा। मैंही वह परमेश्वर हूँ, मुझपर विश्वास रख, मुझे भज, मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा। ऐसा उपदेश करके भगवानने गीताके प्रवृत्ति-प्रधान धर्मका निरूपण पूरा किया है। सारांश यह है, कि इस लोक और परलोक इन दोनोंका विचार करके ज्ञानवान् एवं शिष्ट जनोंने 'सांख्य' और 'कर्मयोग' नामक जिन दो निष्ठाओंको प्रचलित किया है, उन्हींसे गीताके उपदेशका आरंभ हुआ है। इन दोनोंमें-से, पांचवें अध्यायके निर्णयानुसार, जिस कर्मयोगीकी योग्यता अधिक है, जिस कर्मयोगकी सिद्धिके लिये छठे अध्यायमें पातंजलयोगका वर्णन किया है, जिस कर्मयोगके आचरणकी विधिका वर्णन अगले ग्यारह अध्यायोंमें (७ से १७ तक) पिण्डब्रह्मांड-ज्ञानपूर्वक विस्तारसे किया गया है; और यह कहा गया है, कि उस विधिसे आचरण करनेपर परमेश्वरका पूरा ज्ञान हो जाता है, एवं अंतमें मोक्षकी प्राप्ति होती है, उसी कर्मयोगका समर्थन अठारहवें अध्यायमें अर्थात् अंतमेंभी है। और मोक्षरूपी आत्मकल्याणके आड़े न आकर परमेश्वरार्पण-पूर्वक केवल कर्तव्य- बुद्धिसे स्वधर्मानुसार लोकसंग्रहके लिये सब कर्मोंको करते रहनेका जो यह योग या युक्ति है, उसकी श्रेष्ठताका यह भगवत्प्रणीत उपपादन जब अर्जुनने सुना, तभी उसने संन्यास लेकर भिक्षा माँगनेका अपना पहला विचार छोड़ दिया और अब
- केवल भगवानके कहनेहीसे नहीं; किंतु कर्माकर्म-शास्त्रका पूर्ण ज्ञान हो जानेके गी. र. ३०
४६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण - वह स्वयं अपनी इच्छासे युद्ध करनेके लिये प्रवृत्त हो गया है। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लियेही गीताका आरंभ हुआ है; और उसका अंतभी वैसेही हुआ है ( गीता १८. ७३ ) । गीताके अठारह अध्यायोंकी जो संगति ऊपर बतलाई गई है, उससे यह प्रकट हो जायगा, कि गीता केवल कर्म, भक्ति और ज्ञान इन तीन स्वतंत्र निष्ठाओंकी खिचड़ी नहीं है; अथवा वह सूत, रेशम और जरीके चिथड़ोंकी सिली हुई गुदड़ी नहीं है; वरन् दीख पड़ेगा, कि सूत, रेशम और जरीके ताने-बानेको यथास्थानमें योग्य रीतिसे एकत्र करके, यह कर्मयोग नामक मूल्यवान् और मनोहर गीतारूपी वस्त्र आदिसे अंत तक " अत्यन्त योगयुक्त चित्तसे " एक-सा बुना गया है। यह सच है, कि निरूपणकी पद्धति संवादात्मक होनेके कारण शास्त्रीय पद्धतिकी अपेक्षा वह, जरा ढीली है, परंतु यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि संवादात्मक निरूपणसे शास्त्रीय पद्धतिकी रुक्षता हट गई है; और उसके बदले गीतामें सुलभता और प्रेमरस भरगया है; तो शास्त्रीय पद्धतिके हेतु-अनुमानोंकी केवल बुद्धिग्राह्य तथा नीरस कटकट छूट जानेका किसीकोभी तिलमात्र बुरा न लगेगा। इसी प्रकार यद्यपि गीता-निरूपणकी पद्धति पौराणिक या संवादात्मक है, तोभी यह बात इस ग्रंथके कुल- विवेचन-से मालूम हो जायगी, कि ग्रंथपरीक्षणकी मीमांसकोंकी सब कसौटियोंपर कसनेपरभी गीताका तात्पर्य निश्चित करनेमें कुछभी बाधा नहीं होती। गीताका आरंभ देखा जाय तो मालूम होगा, कि अर्जुन क्षात्र-धर्मके अनुसार लड़ाई करनेके लिये चला था। जब धर्माधर्मकी विचिकित्साके चक्करमें पड़ गया, तब उसे वेदान्त- शास्त्रके आधारपर प्रवृत्ति-प्रधान कर्मयोग-धर्मका उपदेश करनेके लिये गीता प्रवृत्त हुई है; और हमने पहलेही प्रकरणमें यह बतला दिया है, कि गीताके उपसंहार और फल दोनों इसी प्रकारके अर्थात् प्रवृत्ति-प्रधानही हैं। इसके बाद हमने बतलाया है, कि गीतामें अर्जुनको जो उपदेश किया है, उसमें " तू युद्ध अर्थात् कर्मही कर " ऐसा दस-बारह बार स्पष्ट रीतिसे और पर्यायसे तो अनेक बार ( अभ्यास ) बतलाया है; और हमने यहभी बतलाया है, कि संस्कृत-साहित्यमें कर्मयोगकी उपपत्ति बतलानेवाला गीताके सिवा दूसरा ग्रंथ नहीं है, इसलिये अभ्यास और अपूर्वता इन दो प्रमाणोंसे गीतामें कर्मयोगकी प्रधानताही अधिक व्यक्त होती है। मीमांसकोंने ग्रंथ-तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये जो कसौटियाँ बतलाई हैं, उनमेंसे अर्थवाद और उपपत्ति ये दोनों शेष रह गई थीं। उनके विषयमें पहले पृथक् पृथक् प्रकरणोंमें और अब गीताके अध्यायोंके क्रमानुसार इस प्रकरणमें जो विवेचन किया गया है, उससे यही निष्पन्न हुआ है, कि गीतामें अकेला 'कर्मयोग' ही प्रतिपाद्य विषय है। इस प्रकार ग्रंथतात्पर्य-निर्णयके मीमांसकोंके सब नियमोंका उपयोग करनेपर यही बात निर्विवाद सिद्ध होती है, कि गीता-ग्रंथमें ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान कर्मयोगहीका प्रतिपादन किया गया है। अब इसमें संदेह नहीं, कि इसके अतिरिक्त शेष सब गीता-तात्पर्य
गीताध्याय-संगति ४६७ केवल सांप्रदायिक है। यद्यपि ये सब तात्पर्य सांप्रदायिक हों, तथापि यह प्रश्न किया जा सकता है, कि कुछ लोगोंको गीतामें ये सांप्रदायिक अर्थ — विशेषतः संन्यास-प्रधान अर्थ — ढूँढ़नेका मौक़ा कैसे मिल गया ? जबतक इस प्रश्नका भी विचार न हो जायगा, तब तक यह नहीं कहा जा सकता, कि सांप्रदायिक अर्थोंकी चर्चा पूरी हो चुकी है, इसलिये अब संक्षेपमें इसी बातका विचार किया जायगा, कि ये सांप्रदायिक टीकाकार गीताका संन्यास-प्रधान अर्थ कैसे कर सके, और फिर यह प्रकरण पूरा किया जायगा। हमारे शास्त्रकारोंका यह सिद्धान्त है, कि चूंकि मनुष्य बुद्धिमान् प्राणी है, इसलिये पिंड-ब्रह्मांडके तत्त्वको पहचाननाही उसका मुख्य काम या पुरुषार्थ है, और इसीको धर्मशास्त्रमें 'मोक्ष' कहते हैं। परंतु दृश्य सृष्टिके व्यवहारोंकी ओर ध्यान देकर शास्त्रोंमेंही यह प्रतिपादन किया गया है, कि पुरुषार्थ चार प्रकारके हैं — जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह पहलेही बतला दिया गया है, कि इस स्थानपर 'धर्म' शब्दका अर्थ व्यावहारिक, सामाजिक और नैतिक धर्म समझना चाहिये। अब पुरुषार्थको इस प्रकार चतुर्विध माननेपर यह प्रश्न सहजही उत्पन्न हो जाता है, कि पुरुषार्थके चारों अंग या भाग परस्पर पोषक हैं या नहीं ? इसलिये स्मरण रहे, कि पिंडमें और ब्रह्मांडमें जो तत्त्व है, उसका ज्ञान हुए बिना मोक्ष नहीं मिलता, फिर वह ज्ञान किसीभी मार्गसे प्राप्त हो। इस सिद्धान्तके विषयमें शाब्दिक मतभेद भलेही हो; परंतु तत्त्वतः कुछ मतभेद नहीं है। कमसे कम गीता-शास्त्रका तो यह सिद्धान्त सर्वथैव ग्राह्य है। इसी प्रकार गीताको यह तत्त्वभी पूर्णतया मान्य है, कि यदि अर्थ और काम, इन दोनों पुरुषार्थोंको प्राप्त करना हो, तो वेभी नीति- धर्मसेही प्राप्त किये जावें। अब केवल धर्म '(अर्थात् व्यावहारिक चातुर्वर्ण्य-धर्म) और मोक्षके पारस्परिक संबंधकाही निर्णय करना शेष रह गया। उनमेंसे धर्मके विषयमें तो यह सिद्धान्त सभी पक्षोंको मान्य है, कि धर्म के द्वारा चित्तको शुद्ध किये बिना मोक्षकी बात ही करना व्यर्थ है। परंतु इस प्रकार चित्तको शुद्ध करनेके लिये बहुत समय लगता है; इसलिये मोक्षकी दृष्टिसे विचार करनेपरभी यही सिद्ध होता है, कि तत्पूर्वकालमें पहले पहल संसारके सब कर्तव्योंको 'धर्म-से' पूरा कर लेना चाहिये (मनु. ६. ३५-३७)। संन्यासका अर्थ है 'छोड़ना'; और जिसने धर्मके द्वारा इस संसारमें कुछ प्राप्त या सिद्ध नहीं किया है वह त्यागही क्या करेगा ? अथवा जो 'प्रपंच' (सांसारिक कर्म) ही ठीक ठीक साध नहीं सकता, उस 'अभागी'से परमार्थभी कैसे ठीक सधेगा (दास. १२. १. १-१०; १२. ८. २१-३१)? किसीका अंतिम उद्देश्य या साध्य चाहे सांसारिक हो अथवा पारमार्थिक, परंतु यह बात प्रकट है, कि उसकी सिद्धिके लिये दीर्घ प्रयत्न, मनोनिग्रह और सामर्थ्य इत्यादि गुणोंकी एक-सी आवश्यकता होती है; और जिसमें ये गुण विद्यमान नहीं होते उसे किसीभी उद्देश्य या साध्यकी प्राप्ति नहीं होती। इस बातको मान लेनेपरभी कुछ
४६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोग इससे आगे बढ़कर कहते हैं, कि जब दीर्घ प्रयत्न और मनोनिग्रहके द्वारा आत्मज्ञान हो जाता है, तब अंतमें संसारके विषयोपभोगरूपी सब व्यवहार निस्सार प्रतीत होने लगते हैं; और जिस प्रकार साँप अपनी निरुपयोगी केंचुलीको छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषभी सब सांसारिक विषयोंको छोड़ केवल परमेश्वर-स्वरूपमेंही लीन हो जाया करते हैं (बृ. ४. ४. ७) । जीवन व्यतीत करनेके इस मार्गमें चूंकि सब व्यवहारोंका त्यागकर अंतमें केवल ज्ञानकोही प्रधानता दी जाती है, अतएव उसे ज्ञाननिष्ठा, सांख्यनिष्ठा अथवा सब व्यवहारोंका त्याग करनेसे संन्यास निष्ठाभी कहते हैं। परंतु इसके विपरीत गीताशास्त्रमें कहा है, कि आरंभमें चित्तकी शुद्धताके लिये 'धर्म'की आवश्यकता तो हैही, परंतु आगे चित्तकी शुद्धि होनेपरभी - स्वयं अपने लिये विषयोपभोगरूपी व्यवहार चाहे तुच्छ हो जावें; तोभी - उन्हीं व्यवहारोंको केवल स्वधर्म और कर्तव्य समझकर, लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे करते रहना आवश्यक है। यदि ज्ञानी मनुष्य ऐसा न करेगा, तो लोगोंको आदर्श बतलानेवाला कोईभी न रहेगा, और फिर इस संसारका नाश हो जायगा। इस कर्मभूमिमें किसी- केभी कर्म छूट नहीं सकते; और यदि बुद्धि निष्काम हो जावे, तो कोईभी कर्म मोक्षके आड़े आ नहीं सकता। इसलिये संसारके कर्मोंका त्याग न कर सब व्यवहारोंको विरक्त-बुद्धिसे अन्य जनोंकी नाईं मृत्यपर्यंत करते रहनाही ज्ञानी पुरुषकाभी कर्तव्य हो जाता है। गीता-प्रतिपादित जीवन व्यतीत करनेके इस मार्गकोही कर्मनिष्ठा या कर्मयोग कहते हैं। परंतु यद्यपि कर्मयोग इस प्रकार श्रेष्ठ निश्चित किया गय- है, तथापि उसके लिये गीतामें संन्यास-मार्गकी कहींभी निंदा नहीं की गई है, उलटे, यह कहा है, कि वहभी मोक्षका देनेवालाही है। स्पष्टही है, कि सृष्टिके आरंभमें सनत्कुमार प्रभृतिने और आगे चल कर शुक-याज्ञवल्क्य आदि ऋषियोंने जिस मार्गका स्वीकार किया है, उसे भगवानभी किस प्रकार सर्वथैव त्याज्य कहेंगे ? संसारके व्यवहार किसी मनुष्यको अंशतः उसके प्रारब्ध-कर्मानुसार प्राप्त हुए जन्म-स्वभावसे नीरस या मधुर मालूम होते हैं; और यह पहले कह चुके हैं, कि ज्ञान हो जानेपरभी प्रारब्ध-कर्मको भोगे बिना छुटकारा नहीं। इसलिये इस प्रारब्ध-कर्मानुसार प्राप्त हुए जन्म-स्वभावके कारण यदि किसी ज्ञानी पुरुषका जी सांसारिक व्यवहारोंसे ऊब जावे; और यदि वह संन्यासी हो जाये, तो उसकी निंदा करनेसे कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानके द्वारा जिस सिद्ध पुरुषकी बुद्धि निःसंग और पवित्र हो गई है, वह इस संसारमें चाहे और कुछ करे, या न करे, परंतु इस बातको नहीं भूलना चाहिये, कि वह मानवी बुद्धिकी शुद्धताकी परम सीमा, और विषयोंमें स्वभावतः लुब्ध होनेवाली हठीली मनोवृत्तियोंको अपने ताबेमें रखनेकी सामर्थ्यकी पराकाष्ठा सब लोगोंको प्रत्यक्ष रीति-से दिखला देता है। उसका यह कार्य लोकसंग्रहकी दृष्टिसेभी कुछ छोटा नहीं है। लोगोंके मनमें संन्यास-धर्मके विषयमें जो आदर-बुद्धि विद्यमान है, उसका सच्चा कारण यही है; और मोक्षकी दृष्टिमे वह गीताकोभी संमत है। परंतु केवल
गीताध्याय-संगति ४६९ जन्म-स्वभावकी ओर, अर्थात् प्रारब्ध-कर्मकीही ओर ध्यान न देकर यदि शास्त्रकी नीतिके अनुसार इस बातका विचार किया जावे, कि जिसने पूरी आत्म-स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी पुरुषको इस कर्म-भूमिमें किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये; तो गीताके अनुसार यह सिद्धान्त करना पड़ता है, कि कर्मत्याग-पक्ष गौण है; और सृष्टिके आरंभमे मरीचि प्रभृतिने तथा आगे चल कर जनक आदिकोंने जिस कर्मयोगका आचरण किया है, उसीको ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रहके लिये स्वीकार करे। क्योंकि, अब न्यायतः यही कहना पड़ता है, कि परमेश्वरकी निर्माण की हुई सृष्टिको चलानेका कामभी ज्ञानी मनुष्यकोही करना चाहिये; और, इस मार्गमे ज्ञान-सामर्थ्यके साथही कर्म-सामर्थ्यकाभी विरोधरहित मेल होनेके कारण, यह कर्मयोग केवल सांख्यमार्गकी अपेक्षा कहीं अधिक योग्यताका निश्चित होता है। सांख्य और कर्मयोग, इन दोनों निष्ठाओमें जो मुख्य भेद है, उसका उक्त रीति-से विचार करने पर सांख्य + निष्काम कर्म = कर्मयोग यह समीकरण निष्पन्न होता है, और वैशंपायनके कथनानुसार गीता-प्रतिपादन प्रवृत्ति-प्रधान कर्मयोगके प्रतिपादनमेंही सांख्य-निष्ठाके निरूपणकाभी सरलतासे समावेश हो जाता है (मभा. शां. ३४८. ५३) ; और इसी कारणसे गीताके संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंको यह बतलानेके लिये अच्छा अवसर मिल गया है, कि गीतामें उनका सांख्य या संन्यास- मार्गही प्रतिपादित है। गीताके जिन श्लोकोंमें कर्मको श्रेयस्कर निश्चित कर कर्म करनेको कहा है, उन श्लोकोंकी ओर ध्यान न देनेसे अथवा यह मनगढ़ंत बात कह देनेसे, कि वे सब श्लोक अर्थवादात्मक अर्थात् आनुषंगिक एवं प्रशंसात्मक हैं या किसी अन्य युक्तिसे उपर्युक्त समीकरणके 'निष्काम कर्म' को उड़ा देनेसे, उसी समीकरणका 'सांख्य = कर्मयोग' यह रूपान्तर हो जाता है; और फिर यह कहनेके लिये अवसर मिल जाना है, कि गीतामें सांख्य-मार्गकाही प्रतिपादन किया है। परंतु इस रीतिसे गीताका अर्थ किया है, वह गीताके उपक्रमोपसंहारके अत्यंत विरुद्ध है; और इस ग्रंथमें हमने स्थान-स्थानपर स्पष्ट रीतिसे दिखला दिया है, कि गीतामें कर्मयोगको गौण तथा संन्यासको प्रधान मानना वैसेही अनुचित है, जैसे घर-मालिकको कोई उसीके घरमें पाहुना कह दे; और पाहुनेको घर-मालिक ठहरा दे; और जिन लोगोंका मत है, कि गीतामे केवल वेदान्त, केवल भक्ति या सिर्फ पातंजलयोगहीका प्रतिपादन किया गया है, उनके उन मतोंकाभी खंडन हम करही चुके हैं। गीतामें कौन-सी बात नहीं है? वैदिक धर्ममे मोक्ष-प्राप्तिके जितने साधन या मार्ग हैं, उनमेंसे प्रत्येक मार्गका कुछ-न-कुछ भाग गीतामें है; और इतना होनेपरभी, "भूतभृन्न च भूतस्थो"के (गीता ९. ५) न्यायसे गीताका सच्चा रहस्य इन मार्गोंकी अपेक्षा भिन्नही है। संन्यास-मार्ग अर्थात् उपनिषदोंका यह तत्त्व गीताको ग्राह्य है, कि ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं; परंतु उसे निष्काम कर्मके साथ जोड़ देनेके कारण गीता-प्रतिपादित भागवत धर्ममेंही यति-धर्मकाभी सहजही समावेश हो गया है। तथापि गीताम
४७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संन्यास और वैराग्यका अर्थ यह नहीं किया है, कि कर्मोंको छोड़ देना चाहिये; किन्तु यह कहा है, कि केवल फलाशाकाही त्याग करनेमें सच्चा वैराग्य या संन्यास है, और अन्तमें सिद्धान्त किया है, कि उपनिषत्कारोंके कर्म-संन्यासकी अपेक्षा निष्काम कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर है। कर्मकांडी मीमांसकोंका यह मतभी गीताको मान्य है, कि यदि केवल यज्ञके लियेही वेदविहित यज्ञयागादि कर्मोंका आचरण किया जावे, तो वे बंधक नहीं होते; परंतु 'यज्ञ' शब्दका अर्थ विस्तृत करके गीताने उक्त मतमें यह सिद्धान्त और जोड़ दिया है, कि यदि फलाशा त्याग कर सब कर्म किये जावें, तो यही एक बड़ा भारी यज्ञ हो जाता है, इस लिये मनुष्यका यही कर्तव्य है, कि वह वर्णा- श्रमविहित सब कर्मोंको केवल निष्काम बुद्धिसे सदैव करता रहे। सृष्टिकी उत्पत्तिके क्रमके विषयमें उपनिषत्कारोंके मतकी अपेक्षा सांख्योंका मत गीतामें प्रधान माना गया है; तोभी प्रकृति और पुरुषतकही न ठहर कर, सृष्टिके उत्पत्तिक्रमकी परंपरा उपनिषदोंमें वर्णित नित्य परमात्मापर्यंत ले जाकर भिड़ा दी गई है। केवल बुद्धिके द्वारा अध्यात्मज्ञानको प्राप्त कर लेना क्लेशदायक है, इसलिये 'भागवत या नारायणीय धर्ममें जो कहा है, कि उसे भक्ति और श्रद्धाके द्वारा प्राप्त कर लेना चाहिये, उस वासुदेव-भक्तिकी विधिका वर्णनभी गीतामें किया गया है; परंतु इस विषयमेंभी भागवत धर्मकी सब बातोंमें कुछ नक़ल नहीं की गई है; वरन् भागवत् धर्ममेंभी वर्णित जीवके उत्पत्तिविषयक इस मतको वेदान्त-सूत्रकी नाईं गीतानेभी त्याज्य माना है, कि वासुदेवसे संकर्षण या जीव उत्पन्न हुआ है; और भागवत धर्ममें वर्णित भक्तिका तथा उपनिषदोंके क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-संबंधी सिद्धान्तका गीतामें पूरा पूरा मेल कर दिया है। इसके सिवा मोक्ष-प्राप्तिका दूसरा साधन पातंजलयोग है। यद्यपि गीताका कहना यह नहीं कि पातंजलयोगही जीवनका मुख्य कर्तव्य है; तथापि गीता यह कहती है, कि बुद्धिको सम करनेके लिये इंद्रियनिग्रह करनेकी आवश्यकता है, इसलिये उतने भरके लिये पातंजलयोगके यम-नियम-आसन आदि साधनोंका उपयोग कर लेन चाहिये। सारांश, वैदिक धर्ममें मोक्ष-प्राप्तिके जो जो साधन बतलाये गये हैं, उन सभीका कुछ-न-कुछ वर्णन, कर्मयोगका सांगोपांग विवेचन करनेके समय, गीतामें प्रसंगानुसार करना पड़ा है। यदि इस सब वर्णनोंको स्वतंत्र माना जाय, तो विसंगति उत्पन्न होकर ऐसा आभास होता है कि गीताके सिद्धान्त परस्पर विरोधी हैं; और यह आभास भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाओंसे तो औरभी अधिक दृढ़ हो जाता है। परंतु जैसा हमने ऊपर कहा है, उसके अनुसार यदि यह सिद्धान्त किया गया, कि ब्रह्मज्ञान और भक्तिका मेल करके अंतमें उनके द्वारा कर्मयोगका समर्थन करनाही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है, तो ये सब विरोध लुप्त हो जाते हैं और पूर्ण व्यापक दृष्टिको स्वीकार कर जिस अलौकिक चातुर्यसे गीताके तत्त्वज्ञानके साथ भक्ति तथा कर्मयोगका यथोचित मेल कर दिया गया है, उसको देख दाँतों तले अँगुली दबाकर रह जाना पड़ता है। गंगामें कितनीही नदियाँ क्यों न आ मिलें;
गीताध्याय-संगति ४७१
परंतु इससे उसका मूल स्वरूप नहीं बदलता; बस, ठीक यही हाल गीताकाभी है। उसमें सब कुछ भलेही हो; परंतु उसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय तो कर्मयोगही है। यद्यपि इस प्रकार कर्मयोगही मुख्य विषय है; तथापि कर्मके साथही मोक्ष-धर्मके मर्मकाभी इसमें भली भाँति निरूपण किया गया है, इसलिये कार्य-अकार्यका निर्णय करनेके हेतु बतलाया गया यह गीता-धर्मही- “स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने ” (मभा. अश्व. १६. १२) – ब्रह्मकी प्राप्ति करा देनेके लियेभी पूर्ण समर्थ है; और भगवानने अर्जुनसे अनुगीताके आरंभमें स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि इस मार्गमे चलनेवालेको मोक्ष-प्राप्तिके लिये किसीभी अन्य अनुष्ठानकी आव- श्यकता नहीं है। हम जानते हैं, कि संन्यास-मार्गके उन लोगोंको हमारा उपरोक्त कथन रोचक प्रतीत न होगा, जो यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि विना सब व्याव- हारिक कर्मोंका त्याग किये मोक्षकी प्राप्ति होती नहीं; परंतु इसके लिये कोई अन्य उपाय नहीं है। गीता-ग्रंथ न तो संन्यास-मार्गका है और न निवृत्ति-प्रधान किसी दूसरेही पंथकाभी। इतनाही नहीं, तो गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति इसीलिये हुई है, कि वह ब्रह्मज्ञानकी दृष्टिसे ठीक ठीक युक्तिसहित इस प्रश्नका उत्तर दे, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपरभी कर्मोंका संन्यास करना अनुचित क्यों है? इसलिये संन्यास-मार्गके अनुयायियोंको चाहिये, कि वे गीताकोभी ‘संन्यास देने’ की झंझटमें न पड़ ‘संन्यास- मार्ग-प्रतिपादक’ जो अन्य वैदिक ग्रंथ हैं, उन्हींमे संतुष्ट रहें। अथवा गीतामें संन्यास- मार्गकोभी भगवानने जिस निरभिमान बुद्धिसे निःश्रेयस्कर कहा है, उसी मम-बुद्धिसे सांख्यमार्गवालोंकोभी यह कहना चाहिये, कि “परमेश्वरका हेतु यह है, कि संसार चलता रहे; और जब कि इसीलिये वह बार बार अवतार धारण करता है, तब ज्ञानप्राप्तिके अनंतर निष्कामबुद्धिसे व्यावहारिक कर्मोंको करते रहनेके जिस मार्गका उपदेश भगवानने गीतामें दिया है, वही मार्ग कलिकालमें उपयुक्त है।” – और ऐसा कहनाही उनके लिये सर्वोत्तम पक्ष है।
पंद्रहवाँ प्रकरण उपसंहार तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । *
- गीता ८. ७ चाहे आप गीताके अध्यायोंकी संगति या मेल देखिये, या उन अध्यायोंके विष- योंका मीमांसकोंकी पद्धतिसे पृथक् पृथक् विवेचन कीजिये; किसीभी दृष्टिसे विचार कीजिये; अंतमें गीताका यही सच्चा तात्पर्य सिद्ध होता कि "ज्ञान भक्ति- युक्त कर्मयोग" ही गीताका सार है; अर्थात् सांप्रदायिक टीकाकारोंने कर्मयोगको गौण ठहरा कर गीताके जो अनेक प्रकारके तात्पर्य बतलाये हैं, वे यथार्थ नहीं, हैं; किंतु उपनिषदोंमें वर्णित अद्वैत वेदान्तका भक्तिके साथ मेल कर उसके द्वारा बड़े बड़े कर्मवीरोंके चरित्रोंका रहस्य या उनके जीवनक्रमकी उपपत्ति बतलानाही गीताका सच्चा तात्पर्य है। मीमांसकोंके कथनानुसार केवल श्रौत-स्मार्त कर्मोंको सदैव करते रहना भलेही शास्त्रोक्त हो; तोभी ज्ञानरहित केवल तांत्रिक क्रियासे बुद्धिमान् मनुष्यका समाधान नहीं होता; और यदि उपनिषदोंमें वर्णित धर्मको देखें, तो वह केवल ज्ञानमय होनेके कारण अल्प-बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये अत्यंत कष्टसाध्य है। इसके सिवा एक और बात है, उपनिषदोंका संन्यास-मार्गभी लोक- संग्रहका बाधक है; इसलिये भगवानने ऐसे ज्ञानमूलक, भक्ति-प्रधान और निष्काम कर्मविषयक धर्मका उपदेश गीतामें किया है, कि जिसका पालन आमरण किया जावे, जिसमे बुद्धि (ज्ञान), प्रेम (भक्ति) और कर्तव्यका ठीक ठीक मेल हो जावे; मोक्षकी प्राप्तिमें कुछ अंतर न पड़ने पावे; और लोक-व्यवहारभी सरलतासे होता रहे। इसीमें कर्म-अकर्मके शास्त्रका सब सार भरा हुआ है। अधिक क्या कहें, गीताके उपक्रम-उपसंहारसे यह बात स्पष्टतया विदित हो जाती है, कि अर्जुनको इस धर्मका उपदेश करनेमें कर्म-अकर्मका विवेचनही मूल कारण है। इस बातका विचार दो तरहसे किया जाता है, कि किस कर्मको धर्म्य, पुण्यप्रद, न्याय्य या श्रेयस्कर कहना चाहिये; और किस कर्मको इसके विरुद्ध अर्थात् अधर्म्य, पापप्रद, अन्याय्य या गर्ह्य कहना चाहिये। पहली रीति यह है, कि उपपत्ति, कारण या मर्म न बतलाकर केवल यह कह दे, कि किसी कामको अमुक रीतिसे करो, कि तो वह शुद्ध होगा, और अन्य रीतिसे करो, तो अशुद्ध हो जायगा। उदाहरणार्थ - हिंसा मत करो, चोरी मत
- "इसलिये सदैव मेरा स्मरण कर और लड़ाई कर।" लड़ाई कर - शब्दकी योजना यहापर प्रसंगानुसार की गई है; परंतु उसका अर्थ केवल 'लड़ाई कर' ही नहीं है यह अर्थभी समझा जाना चाहिये, कि "यथाधिकार कर्म कर।"
करो, सच बोलो, धर्माचरण करो, इत्यादि बातें इसी प्रकारकी हैं। मनुस्मृति आदि स्मृति-ग्रंथोंमें तथा उपनिषदोंमें ये विधियाँ, आज्ञाएँ अथवा आचार स्पष्ट रीतिसे बतलाये गये हैं। परंतु मनुष्य ज्ञानवान् प्राणी है; इसलिये उसका समाधान केवल ऐसी विधियों या आज्ञाओंमें नहीं हो सकता; क्योंकि मनुष्यकी यही स्वाभाविक इच्छा होती है, कि वह उन नियमोंके बनाये जानेका कारणभी जान ले; और इसलिये वह विचार करके इन नियमोंके नित्य तथा मूल तत्त्वकी खोज करता है - बस; यही दूसरी रीति है, कि जिसमें कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप आदिका विचार किया जाता है। व्यावहारिक धर्मके अंतको इस रीतिसे देखकर उसके मूल तत्त्वोंको ढूँढ़ निकालना शास्त्रका काम है; तथा उस विषयके केवल नियमोंको एकत्र करके बतलाना आचारसंग्रह कहलाता है। कर्ममार्गका आचार-संग्रह स्मृति-ग्रंथोंमें है; और उनके आचारोंके मूल तत्त्वोंका शास्त्रीय अर्थात् तात्त्विक विवेचन भगवद्गीतामें संवाद- पद्धतिसे या पौराणिक रीतिसे किया गया है। अतएव भगवद्गीताके प्रतिपाद्य विषयको केवल कर्मयोग न कहकर कर्मयोगशास्त्र कहनाही अधिक उचित तथा प्रशस्त होगा; और यही योगशास्त्र शब्द भगवद्गीताके अध्याय-समाप्ति-सूचक संकल्पमें आया है। जिन पश्चिमी पंडितोंने पारलौकिक दृष्टिको त्याग दिया है या जो लोग उसे गौण मानते हैं, वे गीतामें प्रतिपादित कर्मयोगशास्त्रकोही भिन्न भिन्न लौकिक नाम दिया करते हैं - जैसे सद्व्यवहारशास्त्र, सदाचारशास्त्र, नीतिशास्त्र, नीतिमीमांसा, नीतिशास्त्रके मूल तत्त्व, कर्तव्यशास्त्र, कार्य-अकार्य व्यवस्थिति, समाजधारण- शास्त्र इत्यादि। इन लोगोंकी नीति-मीमांसाकी पद्धतिभी लौकिकही रहती है। इसी कारणसे ऐसे पाश्चात्त्य पंडितोंके ग्रंथोंका जिन्होंने अवलोकन किया है, उनमेंसे बहुतोंकी यह समझ हो जाती है, कि संस्कृत साहित्यमें सदाचरण या नीतिके मूल तत्त्वोंकी चर्चा किसीने नहीं की है। वे कहने लगते हैं कि, "हमारे यहाँ जो कुछ गहन तत्त्वज्ञान है, वह सिर्फ़ हमारा वेदान्तही है, और वर्तमान वेदान्त-ग्रंथोंको देखो; तो मालूम होगा, कि वे सांसारिक कर्मोंके विषयमें प्रायः उदासीन हैं। ऐसी अवस्थामें कर्मयोगशास्त्रका अथवा नीतिका विचार कहाँ मिलेगा ? यह विचार व्याकरण अथवा न्यायके ग्रंथोंमें तो मिलनेवाला हैही नहीं; और स्मृति-ग्रंथोंमें धर्मशास्त्रके संग्रहके सिवा और कुछभी नहीं; इसलिये हमारे प्राचीन शास्त्रकार, मोक्षहीके गूढ विचारोंमें निमग्न होनेके कारण सदाचरणके या नीतिधर्मके मूल-तत्त्वोंका विवेचन करना भूल गये !" परंतु महाभारत और गीताको ध्यानपूर्वक पढ़नेसे यह भ्रमपूर्ण समझ दूर हो जा सकती है। इतनेपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि महाभारत एक अत्यंत विस्तीर्ण ग्रंथ है, इसलिये उसको पढ़कर पूर्णतया मनन करना बहुतही कठिन है; और गीता यद्यपि एक छोटा-सा ग्रंथ है तोभी उसमें सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतानुसार केवल मोक्ष-प्राप्तिहीका ज्ञान बतलाया गया है। परंतु किसीने इस बातको नहीं जाँचा, कि संन्यास और कर्मयोग, दोनों मार्ग हमारे यहाँ वैदिक कालसेही
४७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रचलित है, किसीभी समय समाजमें संन्यास-मार्गियोंकी अपेक्षा कर्मयोगमेंही अनुयायियोंकी संख्या हजारों गुना अधिक हुआ करती है; और, पुराण-इतिहासके जिन कर्मशील महापुरुषोंका अर्थात् कर्मवीरोंका वर्णन है, वे सब कर्मयोग-मार्गकाही अवलंब करनेवाले थे। यदि ये सब बातें सच हैं, तो क्या इन कर्मवीरोंमें किसीकोभी यह नहीं सूझा होगा, कि अपने कर्मयोग-मार्गका समर्थन किया जाना चाहिये ? अच्छा; यदि कहा जाय, कि उस समय जितना ज्ञान था, वह सब ब्राह्मण जातिमेंही था; और वेदान्ती ब्राह्मण कर्म करनेके विषयमें उदासीन रहा करते थे; इसलिये कर्मयोगविषयक ग्रंथ नहीं लिखे गये होंगे; तोभी यह आक्षेप उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उपनिषत्कालमें और उसके बाद क्षत्रियोंमेंभी जनक और श्रीकृष्ण सरीखे ज्ञानी पुरुष हो गये हैं; और व्याससदृश बुद्धिमान् ब्राह्मणोंने बड़े बड़े क्षत्रियोंका इतिहासभी लिखा है। इस इतिहासको लिखते समय क्या उनके मनमें यह विचार न आया होगा, कि जिन प्रसिद्ध पुरुषोंका इतिहास हम लिख रहे हैं, उनके चरित्रके मर्म या रहस्यकोभी प्रकट कर देना चाहिये ? इस मर्म या रहस्यको कर्मयोग अथवा व्यवहारशास्त्र कहते हैं; और इसे बतलानेके लियेही महाभारतमें स्थान-स्थानपर सूक्ष्म धर्म-अधर्मका विवेचन करके, अंतमें संसारके धारण एवं पोषणके लिये कारणभूत सदाचरण अर्थात् धर्मके मूल तत्त्वोंका विवेचन मोक्ष-दृष्टिको न छोड़ते हुए गीतामें किया गया है। अन्यान्य पुराणोंमें भी ऐसे बहुतसे प्रसंग पाये जाते हैं। परंतु गीताके तेजके सामने अन्य सब विवेचन फीके पड़ जाते हैं; इसी कारणसे भगवद्गीता कर्मयोग- शास्त्रका प्रधान ग्रंथ हो गया है। हमने इस बातका पिछले प्रकरणोंमें विस्तृत विवेचन किया है, कि कर्मयोगका सच्चा स्वरूप क्या है। तथापि जबतक इस बातकी तुलना न की जावे, कि गीतामें वर्णन किये गये कर्म-अकर्मके आध्यात्मिक मूल तत्त्वोंमें पश्चिमी पंडितों द्वारा प्रतिपादित नीतिके मूलतत्त्व कहाँ तक मिलते हैं; तबतक यह नहीं कहा जा सकता, कि गीता-धर्मका निरूपण पूरा हो गया। इस प्रकार तुलना करते समय दोनों ओरके अध्यात्मज्ञानकीभी तुलना करनी चाहिये। परंतु यह बात सर्वमान्य है, कि अबतक पश्चिमी आध्यात्मिक ज्ञानकी पहुँच हमारे वेदान्तसे अधिक दूरतक नहीं होने पाई है; इसी कारणसे पूर्वी और पश्चिमी अध्यात्मशास्त्रोंकी तुलना करनेकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती।* ऐसी अवस्थामें अब केवल उस नीति- * वेदान्त और पश्चिमी तत्त्वज्ञानकी तुलना प्रोफेसर डायसनके The Elements of Metaphysics नामक ग्रंथमें कई स्थानोंमें की गई है। इस ग्रंथके दूसरे संस्करणके अंतमें ' On the Philosophy of Vedanta' इस विषयपर एक व्याख्यानभी छापा गया है। जब प्रो. डायसन सन १८९३ में हिंदुस्तानमें आयेथे, तब उन्होंने बंबईकी रायल एशियाटिक सोसायटीमें यह व्याख्यान दिया था। इसके अतिरिक्त The Religion and Philosophy of the Upanishads नामक डायसनसाहबका ग्रंथभी इस विषयपर पढ़ने योग्य है।
उपसंहार ४७५ शास्त्रकी अथवा कर्मयोगकी तुलनाकाही विषय बाकी रह जाता है, जिसके बारेमें कुछ लोगोंकी समझ है, कि इसकी उपपत्ति हमारे प्राचीन शास्त्रकारोंने नहीं बतलाई है। परंतु इस एकही विषयका विचारभी इतना विस्तृत है, कि उसका पूर्णतय प्रतिपादन करनेके लिये एक स्वतंत्र ग्रंथही लिखना पड़ेगा। तथापि, इस विषयपर इस ग्रंथमें थोड़ाभी विचार न करना उचित न होगा; इसलिये केवल दिग्दर्शन करनेके लिये उसकी कुछ महत्त्वपूर्ण बातोंका विवेचन इस उपसंहारमें किया जावेगा। - थोड़ाभी विचार करनेपर यह सहजही ध्यानमें आ सकता है, कि सदाचार और दुराचार, तथा धर्म और अधर्म शब्दोंका उपयोग यथार्थमें ज्ञानवान् मनुष्यके कर्मोंकेही लिये होता है; और यही कारण है, कि नीतिमत्ता केवल जड़ कर्मोंमें नहीं किंतु बुद्धिमें रहती है। "धर्मो हि तेषामधिको विशेषः" - धर्म-अधर्मका ज्ञान मनुष्यका अर्थात् बुद्धिमान् प्राणियोंकाही विशिष्ट गुण है - इस वचनका तात्पर्य और भावार्थही वही है। किसी गधे या बैलके कर्मोंके परिणामको देखकर हम उसे उपद्रवी तो बेशक कहा करते हैं, परंतु जब वह धक्का देता है, तब उसपर कोई नालिश करने नहीं जाता। इसी तरह किसी नदीमें बाढ़ आ जानेसे फसल बह जाती है, तो "अधिकांश लोगोंकी अधिक हानि" होनेके कारण कोई उसे दुराचारिणी, लुटेरी, या अनीतिमान् नहीं कहता। इसपर कोई प्रश्न कर सकते हैं, कि यदि धर्म- अधर्मके नियम मनुष्यके व्यवहारोंहीके लिये उपयुक्त हुआ करते हैं, तो मनुष्यके कर्मोंके भले-बुरेपनका विचारभी केवल उसके कर्मोंसेही करनेमें क्या हानि है? इस प्रश्नका उत्तर देना कुछ कठिन नहीं। क्योंकि अचेतन वस्तुओं अथवा पशुपक्षी आदि मूढ़ योनिके प्राणियोंका दृष्टान्त छोड़, यदि मनुष्यकेही कृत्योंका विचार करें, तोभी दीख पड़ेगा, कि जब कोई आदमी अपने पागलपनसे अथवा अनजानेमें कोई अपराध कर डालता है, तब वह संसारमें और कानून द्वारा क्षम्य माना जाता है। इससे यही बात सिद्ध होती है, कि मनुष्यकेभी कर्म-अकर्मकी भलाई-बुराई ठहरानेके लिये, सबसे पहले कर्ताकी बुद्धिकाही विचार करना पड़ता है - अर्थात् यह विचार करना पड़ता है, कि उसने उस कार्यको किस उद्देश्य, भाव या हेतुसे किया; और उसको उस कर्मके परिणामका ज्ञान था या नहीं। किसी धनवान् मनुष्यके लिये यह कोई कठिन काम नहीं, कि वह अपनी इच्छाके अनुसार मन-माना दान दे दें। यह दानविषयक काम 'अच्छा' भलेही हो; परंतु उसकी सच्ची नैतिक योग्यता उस दानकी स्वाभाविक क्रियासे नहीं ठहराई जा सकती। इसके लिये यहभी देखना पड़ेगा, कि उस धनवान् मनुष्यकी बुद्धि सचमुच श्रद्धायुक्त है, या नहीं; और उसका निर्णय करनेके लिये यदि स्वाभाविक रीतिसे किये गये दानके सिवा और कुछ प्रमाण न हो; तो इस दानकी योग्यता किसी श्रद्धापूर्वक किये गये दानकी योग्यताके बराबर नहीं समझी जाती; और कुछ नहीं, तो संदेह करनेके लिये उचित कारण अवश्य रह जाता है। सब धर्म-अधर्मका विवेचन हो जानेपर महाभारतमें यही बात एक आख्यानके रूपमें उत्तम रीतिसे समझाई
४७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गई है। जब युधिष्ठिर राजगद्दी पा चुके तब उन्होंने एक बृहत् अश्वमेध-यज्ञ किया। उसमें अन्न और द्रव्य आदिके अपूर्व दान करनेसे और लाखों मनुष्योंके सन्तुष्ट होनेसे उनकी बहुत प्रशंसा होने लगी। उस समय वहाँ एक दिव्य नकुल (नेवला) आया; और युधिष्ठिरसे कहने लगा - "तुम्हारी व्यर्थही प्रशंसा की जाती है। पूर्वकालमें इसी कुरुक्षेत्रमें एक दरिद्री ब्राह्मण रहता था, जो उञ्छवृत्तिसे, अर्थात् खेतोंमें गिरे हुए अनाजके दानोंको चुनकर, अपना जीवन-निर्वाह किया करता था। एक दिन भोजन करनेके समय उसके यहाँ एक अपरिचित आदमी क्षुधासे पीड़ित अतिथि बन कर आ गया। यह दरिद्री ब्राह्मण और उसके कुटुंबी-जनभी कई दिनोंके भूखे थे; तोभी उसने अपने, अपनी स्त्रीके और अपने लड़कोंके सामने परोसा हुआ सब सत्तू उस अतिथिको समर्पण कर दिया। उस प्रकार उसने जो अतिथि-यज्ञ किया था, उसके महत्त्वकी बराबरी तुम्हारा यह यज्ञ - कितनाही बड़ा क्यों न हो - कभी नहीं कर सकता" (मभा. अश्व. ९०)। उस नेवलेका मुंह और आधा शरीर सोनेका था। उसने जो यह कहा, कि युधिष्ठिरके अश्वमेध-यज्ञकी योग्यता उस गरीब ब्राह्मणद्वारा अतिथिको दिये गये सेर भर सत्तूके बराबरभी नहीं है; उसका कारण उसने यह बतलाया है, कि - "उस ब्राह्मणके घरमें अतिथिकी जूठनपर लोटनेसे मेरा मुंह और आधा शरीर सोनेका हो गया; परन्तु युधिष्ठिरके यज्ञमंडपकी जूठन पर लोटनेसे मेरा बचा हुआ आधा शरीर सोनेका नहीं हो सका !" यहाँपर कर्मके बाह्य परिणामोंकोही देख कर यदि इसी बातका विचार करें - कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है - तो यही निर्णय करना पड़ेगा, कि एक अतिथिको तृप्त करनेकी अपेक्षा लाखों आदमियोंको तृप्त करनेकी योग्यता लाखगुनी अधिक है। परन्तु प्रश्न यह है, कि केवल धर्म-दृष्टिसेही नहीं, किन्तु नीति-दृष्टिसेभी क्या यह निर्णय ठीक होगा ? किसीको अधिक धन-संपत्ति मिल जाना या लोकोपयोगी अनेक अच्छे काम करनेका मौक़ा मिल जाना केवल उसके सदाचारपरही अवलंबित नहीं रहता है। यदि वह गरीब ब्राह्मण द्रव्यके अभावसे बड़ा भारी यज्ञ नहीं कर सकता था; और इसलिये यदि उसने अपनी शक्तिके अनुसार कुछ अल्प और तुच्छ कामही किया, तो क्या उसकी नैतिक या धार्मिक योग्यता कम समझी जायगी ? यदि कम समझी जावे तो यही कहना पड़ेगा, कि गरीबोंको धनवानोंके सदृश नीतिमान् और धार्मिक होनेकी कभी इच्छा और आशा नहीं रखनी चाहिये। आत्म-स्वातन्त्र्यके अनुसार अपनी बुद्धिको शुद्ध रखना उस ब्राह्मणके अधिकारमें था; और यदि उसके स्वल्पाचरणमे इस बातमें कुछ संदेह नहीं रह जाता, कि उसकी परोपकार बुद्धि युधिष्ठिरकेही समान शुद्ध थी; तो उस ब्राह्मणकी और उसके स्वल्पकृत्यकी नैतिक योग्यता युधिष्ठिरके और उनके बहु- व्ययसाध्य-यज्ञके बराबरीकीही मानी जानी चाहिये। बल्कि यहभी कहा जा सकता है, कि कई दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित होनेपरभी उस गरीब ब्राह्मणने अन्नदान करके अतिथिके प्राण बचानेमें जो स्वार्थत्याग किया, उससे उसकी शुद्ध बुद्धि औरभी अधिक
उपसंहार ४७७ व्यक्त होती है। यह तो सभी जानते हैं, कि धैर्य आदि गुणोंके समान शुद्ध बुद्धिकी सच्ची परीक्षा संकटकालमेंही हुआ करती है; और कांटनेभी अपने नीतिग्रंथके आरंभमें यही प्रतिपादन किया है, कि संकटके समयभी जिसकी शुद्ध बुद्धि (नैतिक सत्त्व) भ्रष्ट नहीं होती, वही सच्चा नीतिमान् है। उक्त नेवलेका अभिप्रायभी यही था। परंतु युधिष्ठिरकी शुद्ध बुद्धिकी परीक्षा कुछ राज्यारूढ होनेपर संपत्ति- कालमें किये गये एक अश्वमेध-यज्ञमेही होनेकी न थी; उसके पहलेही अर्थात् आपत्ति- कालकी अनेक अड़चनोंके प्रसंगोपर ब्राह्मणके समानही उसकी पूरी परीक्षा हो चुकी थी। इसीलिये महाभारतका यह सिद्धान्त है, कि धर्म-अधर्मके निर्णयके सूक्ष्म न्यायसेभी युधिष्ठिरको धार्मिकही कहना चाहिये। कहना नहीं होगा, कि वह नेवला निंदक ठहराया गया है। तथापि महाभारतमें यह वर्णन है, कि अश्वमेध करनेवालेको जो गति मिलती है, वही उस ब्राह्मणकोभी मिली। इससे यही सिद्ध होता है, कि उस ब्राह्मणके कर्मकी योग्यता युधिष्ठिरके यज्ञकी अपेक्षा अधिक भलेही नहो; तथापि इसमें संदेह नहीं, कि महाभारतकार उन दोनोंकी नैतिक और धार्मिक योग्यता एकसमान मानते हैं। व्यावहारिक कार्योंको देखनेसेभी मालूम हो सकता है. कि जब किसी धर्मकृत्यके लिये या लोकोपयोगी कार्यके लिये लखपति मनुष्य हजार रुपये चंदा देता है और कोई गरीब मनुष्य एक रुपया चंदा देता है; तब हम लोग उन दोनोंकी नैतिक योग्यता एक समानही समझते हैं! 'चंदा' शब्दको देखकर यह दृष्टान्त कुछ लोगोंको कदाचित् नया मालूम हो, परंतु यथार्थमें बात ऐसी नहीं है, क्योंकि उक्त नेवलेकी कथाका निरूपण करते समय महाभारतमेंही धर्म-अधर्मके विवेचनमें कहा गया है, कि :- सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च । दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः ॥ "हजारवालेने सौ, सौवालेने दस, अथवा किसीने यथाशक्ति थोड़ासा पानीभी दिया, तोभी ये सब तुल्यफल हैं; अर्थात् इन सबकी योग्यता एकसमान है" (महा. अश्व. ९०.९७); और "पत्रं पुष्पं फलं तोयं" (गीता. ९. २६) - इस गीतावाक्यका तात्पर्यभी यही है। हमारे धर्ममेंही क्या, ईसाई धर्ममेंभी इस तत्त्वका संग्रह है। ईसा मसीहने एक जगह कहा है - "जिसके पास अधिक है, उससे अधिक पानेकी आशा की जाती है" (ल्यूक. १२.४८)। एक दिन जब ईसा मंदिर (गिरिजाघर) गया था, तब वहाँ धर्मार्थ द्रव्य इकट्ठा करनेका काम शुरू होनेपर एक अत्यंत गरीब विधवा स्त्रीने अपने पासके दो पैसे उस धर्मकार्यके लिये दे दिये। यह देखकर ईसाके मुँहसे यह उद्गार निकल पड़ा, कि "इस स्त्रीने अन्य सब लोगोंकी अपेक्षा अधिक दान दिया है।" इसका वर्णन बाइबलमें (मार्क. १२. ४३; ४४) है। इससे यह स्पष्ट है, कि यह बात ईसाकोभी मान्य थी, कि कर्मकी योग्यता कर्ताकी बुद्धिसेही निश्चित की जानी चाहिये; और यदि कर्ताकी बुद्धि शुद्ध हो. तो
४७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बहुधा छोटे छोटे कर्मोंकी नैतिक योग्यताभी बड़े बड़े कर्मोंकी योग्यताके बराबरही हो जाती है। इसके विपरीत - अर्थात् जब बुद्धि शुद्ध न हो तब - किसी कर्मकी नैतिक योग्यताका विचार करनेपर यह मालूम होगा, कि यद्यपि हत्या करना केवल एकही कर्म है; तथापि अपनी जान बचानेके लिये आक्रमणकारीकी हत्या करनेमें और किसी राह चलते धनवान् मुसाफ़िरको द्रव्यके लोभसे मार डालनेमें, नैतिक दृष्टिसे बहुत अंतर है। जर्मन कवि शिलरने इसी आशयके एक प्रसंगका वर्णन अपने 'विलियम टेल' नामक नाटकके अंतमें किया है; और वहाँ बाह्यतः एकहीसे दीख पड़नेवाले दो कृत्योंमें बुद्धिकी शुद्धता-अशुद्धताके कारण जो भेद दिखलाया गया है, वही भेद स्वार्थत्याग और स्वार्थके लिये की गई हत्यामेंभी है। इससे मालूम होता है, कि कर्म छोटे-बड़े हों या बराबर हों; उनमें नैतिक दृष्टिसे जो भेद हो जाता है, वह कर्ताके हेतुके कारणही हुआ करता है। इस हेतुकोही उद्देश्य, वासना या बुद्धि कहते हैं। इसका कारण यह है, कि 'बुद्धि' शब्दका शास्त्रीय अर्थ यद्यपि 'व्यवसायात्मक इंद्रिय' है; तोभी ज्ञान, वासना, उद्देश्य या हेतु सब बुद्धींद्रियके व्यापारकेही फल हैं, अतएव इनके लियेभी बुद्धि शब्दहीका सामान्यतः प्रयोग किया जाता है; और पहलेभी यह बतलाया जा चुका है, कि स्थितप्रज्ञकी साम्य-बुद्धिमें व्यवसायात्मक बुद्धिकी स्थिरता और वासनात्मक बुद्धिकी शुद्धता, दोनोंका समावेश होता है, भगवान्ने अर्जुनसे कुछ यह सोचनेको नहीं कहा, कि युद्ध करनेसे कितने मनुष्योंका कितना कल्याण होगा और कितने लोगोंकी कितनी हानि होगी; बल्कि अर्जुनसे भगवान् यही कहते हैं, कि इस समय यह विचार गौण है, कि तुम्हारे युद्ध करनेसे भीष्म मरेंगे कि द्रोण; मुख्य प्रश्न यही है, कि तुम किस बुद्धि (हेतु या उद्देश्य) से युद्ध करनेको तैयार हुए हो। यदि तुम्हारी बुद्धि स्थितप्रज्ञोंके समान होगी, और यदि तुम उस शुद्ध और पवित्र बुद्धिसे अपना कर्तव्य करने लगोगे, तो फिर चाहे भीष्म मरे या द्रोण; तुम्हें उसका पाप नहीं लगेगा। तुम कुछ इस फलकी आशासे तो युद्ध करही नहीं रहो हो, कि भीष्म मारे जावें। जिस राज्यपर तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है, उसका हिस्सा तुमने माँगा; और युद्ध टालनेके लिये यथाशक्ति गम खाकर बीच-बचाव करनेकाभी तुमने बहुत कुछ प्रयत्न किया। परंतु जब इस मेलके प्रयत्नसे और साधुपनके मार्गसे निर्वाह नहीं हो सका, तब लाचारीसे तुमने युद्ध करनेका निश्चय किया है, इसमें तुम्हारा कुछ दोष नहीं है। क्योंकि दुष्ट मनुष्यसे किसी ब्राह्मणकी नाईं अपने धर्मानुसार प्राप्त अधिकारकी भिक्षा न माँगते हुए, आवश्यकता आ पड़नेपर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार लोकसंग्रहार्थ उसकी प्राप्तिके लिये अंतमें युद्ध करनाही तुम्हारा कर्तव्य है (महा. उ. २८, ३२; वनपर्व ३३. १८, ५०)। भगवान्के उक्त युक्तिवादको व्यासजीनेभी स्वीकार किया है, और, उन्होंने इसीके द्वारा आगे चलकर शांतिपर्वमें युधिष्ठिरका समाधान किया है (शां. अ. ३०. ३३)। परंतु कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये बुद्धिको इस तरहसे श्रेष्ठ
उपसंहार ४७९ मान लें, तोभी अब यह अवश्य जान लेना चाहिये, कि शुद्ध बुद्धि किसे कहते हैं। क्योंकि, मन और बुद्धि दोनों प्रकृतिके विकार हैं; इसलिये वे स्वभावतः तीन प्रकारके अर्थात् सात्त्विक, राजस और तामस हो सकते हैं। इसलिये गीतामें कहा है, कि शुद्ध या सात्त्विक बुद्धि वह है, कि जो बुद्धिसेभी परे रहनेवाले नित्य आत्माके स्वरूपको पहचाने; और यह पहचान कर, कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है, उसीके अनु- सार कार्य-अकार्यका निर्णय करे। इस सात्त्विक बुद्धिकाही दूसरा नाम साम्यबुद्धि है, और इसके 'साम्य' शब्दका अर्थ "सर्वभूतान्तर्गत आत्माकी एकता या समानता- को पहचाननेवाली" है। जो बुद्धि इस समानताको नहीं जानती, वह न तो शुद्ध है और न सात्त्विकभी। इस प्रकार जब यह मान लिया गया, कि नीतिका निर्णय करनेमें साम्य-बुद्धिही श्रेष्ठ है, तब यह प्रश्न उठता है, कि बुद्धिकी इस समता अथवा साम्यको कैसे पहचानना चाहिये? क्योंकि बुद्धि तो अंतरिंद्रिय है; इसलिये उसका भलाबुरापन हमारी आँखोंसे दीख नहीं पड़ता। अतः बुद्धिकी समता तथा शुद्धताकी परीक्षा करनेके लिये पहले मनुष्यके बाह्य आचरणको देखना चाहिये; नहीं तो कोईभी मनुष्य ऐसा कह कर - कि मेरी बुद्धि शुद्ध है - मनमाना बर्ताव करने लगेगा। इसीसे शास्त्रोंका सिद्धान्त है, कि सच्चे ब्रह्मज्ञानी पुरुषकी पहचान उसके स्वभावसेही हुआ करती है। जो केवल मुँहसे कोरी बातें करता है, वह सच्चा साधु नहीं। भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञ तथा भगवद्भक्तोंके लक्षण बतलाते समय आम करके इसी बातका वर्णन किया गया है, कि वे संसारके अन्य लोगोंके साथ कैसा बर्ताव करते हैं; और तेरहवें अध्यायमें ज्ञानकी व्याख्याभी इसी प्रकार - अर्थात् यह बतलाकर, कि स्वभावपर ज्ञानका क्या परिणाम होता है - की गई है। इससे यह साफ़ मालूम होता है, कि गीता यह कभी नहीं कहती, कि बाह्य कर्मोंकी ओर कुछभी ध्यान न दो। परंतु इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि किसी मनुष्यकी विशेषकरके अपरिचित मनुष्यकी - बुद्धिकी समताकी परीक्षा करनेके लिये यद्यपि केवल उसका बाह्य कर्म या आचरण और, उसमेंभी, संकट-समयका आचरणही प्रधान साधन है; तथापि केवल इस बाह्य आचरण द्वाराही नीतिमत्ताकी अचूक परीक्षा हमेशा नही हो सकती। क्योंकि उक्त नकुलोपाख्यानसे यह सिद्ध हो चुका है, कि यदि बाह्य कर्म छोटाभी हो; तथापि विशेष अवसरपर उसकी नैतिक योग्यता बड़े कर्मोंकेही बराबर हो जाती है। इसीलिये हमारे शास्त्रकारोंने यह सिद्धान्त किया है, कि बाह्य-कर्म चाहे छोटा हो या बड़ा, एकहीको सुख देनेवाला हो या अधिकांश लोगोंको; उसको केवल बुद्धिकी शुद्धताका एक प्रमाण मानना चाहिये, इसमे अधिक महत्त्व उसे नहीं देना चाहिये। किंतु उस बाह्य-कर्मके आधारपर पहले यह देख लेना चाहिये, कि कर्म करनेवालेकी बुद्धि कितनी शुद्ध है; और अंतमें इस रीतिसे व्यक्त होनेवाली बुद्धिके आधारपरही उक्त कर्मकी नीतिमत्ताका निर्णय करना चाहिये, यह निर्णय केवल बाह्य-कर्मोंको देखनेमे ठीक नहीं हो सकता। यही कारण है, कि