श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गई है। जब युधिष्ठिर राजगद्दी पा चुके तब उन्होंने एक बृहत् अश्वमेध-यज्ञ किया। उसमें अन्न और द्रव्य आदिके अपूर्व दान करनेसे और लाखों मनुष्योंके सन्तुष्ट होनेसे उनकी बहुत प्रशंसा होने लगी। उस समय वहाँ एक दिव्य नकुल (नेवला) आया; और युधिष्ठिरसे कहने लगा - "तुम्हारी व्यर्थही प्रशंसा की जाती है। पूर्वकालमें इसी कुरुक्षेत्रमें एक दरिद्री ब्राह्मण रहता था, जो उञ्छवृत्तिसे, अर्थात् खेतोंमें गिरे हुए अनाजके दानोंको चुनकर, अपना जीवन-निर्वाह किया करता था। एक दिन भोजन करनेके समय उसके यहाँ एक अपरिचित आदमी क्षुधासे पीड़ित अतिथि बन कर आ गया। यह दरिद्री ब्राह्मण और उसके कुटुंबी-जनभी कई दिनोंके भूखे थे; तोभी उसने अपने, अपनी स्त्रीके और अपने लड़कोंके सामने परोसा हुआ सब सत्तू उस अतिथिको समर्पण कर दिया। उस प्रकार उसने जो अतिथि-यज्ञ किया था, उसके महत्त्वकी बराबरी तुम्हारा यह यज्ञ - कितनाही बड़ा क्यों न हो - कभी नहीं कर सकता" (मभा. अश्व. ९०)। उस नेवलेका मुंह और आधा शरीर सोनेका था। उसने जो यह कहा, कि युधिष्ठिरके अश्वमेध-यज्ञकी योग्यता उस गरीब ब्राह्मणद्वारा अतिथिको दिये गये सेर भर सत्तूके बराबरभी नहीं है; उसका कारण उसने यह बतलाया है, कि - "उस ब्राह्मणके घरमें अतिथिकी जूठनपर लोटनेसे मेरा मुंह और आधा शरीर सोनेका हो गया; परन्तु युधिष्ठिरके यज्ञमंडपकी जूठन पर लोटनेसे मेरा बचा हुआ आधा शरीर सोनेका नहीं हो सका !" यहाँपर कर्मके बाह्य परिणामोंकोही देख कर यदि इसी बातका विचार करें - कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है - तो यही निर्णय करना पड़ेगा, कि एक अतिथिको तृप्त करनेकी अपेक्षा लाखों आदमियोंको तृप्त करनेकी योग्यता लाखगुनी अधिक है। परन्तु प्रश्न यह है, कि केवल धर्म-दृष्टिसेही नहीं, किन्तु नीति-दृष्टिसेभी क्या यह निर्णय ठीक होगा ? किसीको अधिक धन-संपत्ति मिल जाना या लोकोपयोगी अनेक अच्छे काम करनेका मौक़ा मिल जाना केवल उसके सदाचारपरही अवलंबित नहीं रहता है। यदि वह गरीब ब्राह्मण द्रव्यके अभावसे बड़ा भारी यज्ञ नहीं कर सकता था; और इसलिये यदि उसने अपनी शक्तिके अनुसार कुछ अल्प और तुच्छ कामही किया, तो क्या उसकी नैतिक या धार्मिक योग्यता कम समझी जायगी ? यदि कम समझी जावे तो यही कहना पड़ेगा, कि गरीबोंको धनवानोंके सदृश नीतिमान् और धार्मिक होनेकी कभी इच्छा और आशा नहीं रखनी चाहिये। आत्म-स्वातन्त्र्यके अनुसार अपनी बुद्धिको शुद्ध रखना उस ब्राह्मणके अधिकारमें था; और यदि उसके स्वल्पाचरणमे इस बातमें कुछ संदेह नहीं रह जाता, कि उसकी परोपकार बुद्धि युधिष्ठिरकेही समान शुद्ध थी; तो उस ब्राह्मणकी और उसके स्वल्पकृत्यकी नैतिक योग्यता युधिष्ठिरके और उनके बहु- व्ययसाध्य-यज्ञके बराबरीकीही मानी जानी चाहिये। बल्कि यहभी कहा जा सकता है, कि कई दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित होनेपरभी उस गरीब ब्राह्मणने अन्नदान करके अतिथिके प्राण बचानेमें जो स्वार्थत्याग किया, उससे उसकी शुद्ध बुद्धि औरभी अधिक