भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 520

उपसंहार ४७५ शास्त्रकी अथवा कर्मयोगकी तुलनाकाही विषय बाकी रह जाता है, जिसके बारेमें कुछ लोगोंकी समझ है, कि इसकी उपपत्ति हमारे प्राचीन शास्त्रकारोंने नहीं बतलाई है। परंतु इस एकही विषयका विचारभी इतना विस्तृत है, कि उसका पूर्णतय प्रतिपादन करनेके लिये एक स्वतंत्र ग्रंथही लिखना पड़ेगा। तथापि, इस विषयपर इस ग्रंथमें थोड़ाभी विचार न करना उचित न होगा; इसलिये केवल दिग्दर्शन करनेके लिये उसकी कुछ महत्त्वपूर्ण बातोंका विवेचन इस उपसंहारमें किया जावेगा। - थोड़ाभी विचार करनेपर यह सहजही ध्यानमें आ सकता है, कि सदाचार और दुराचार, तथा धर्म और अधर्म शब्दोंका उपयोग यथार्थमें ज्ञानवान् मनुष्यके कर्मोंकेही लिये होता है; और यही कारण है, कि नीतिमत्ता केवल जड़ कर्मोंमें नहीं किंतु बुद्धिमें रहती है। "धर्मो हि तेषामधिको विशेषः" - धर्म-अधर्मका ज्ञान मनुष्यका अर्थात् बुद्धिमान् प्राणियोंकाही विशिष्ट गुण है - इस वचनका तात्पर्य और भावार्थही वही है। किसी गधे या बैलके कर्मोंके परिणामको देखकर हम उसे उपद्रवी तो बेशक कहा करते हैं, परंतु जब वह धक्का देता है, तब उसपर कोई नालिश करने नहीं जाता। इसी तरह किसी नदीमें बाढ़ आ जानेसे फसल बह जाती है, तो "अधिकांश लोगोंकी अधिक हानि" होनेके कारण कोई उसे दुराचारिणी, लुटेरी, या अनीतिमान् नहीं कहता। इसपर कोई प्रश्न कर सकते हैं, कि यदि धर्म- अधर्मके नियम मनुष्यके व्यवहारोंहीके लिये उपयुक्त हुआ करते हैं, तो मनुष्यके कर्मोंके भले-बुरेपनका विचारभी केवल उसके कर्मोंसेही करनेमें क्या हानि है? इस प्रश्नका उत्तर देना कुछ कठिन नहीं। क्योंकि अचेतन वस्तुओं अथवा पशुपक्षी आदि मूढ़ योनिके प्राणियोंका दृष्टान्त छोड़, यदि मनुष्यकेही कृत्योंका विचार करें, तोभी दीख पड़ेगा, कि जब कोई आदमी अपने पागलपनसे अथवा अनजानेमें कोई अपराध कर डालता है, तब वह संसारमें और कानून द्वारा क्षम्य माना जाता है। इससे यही बात सिद्ध होती है, कि मनुष्यकेभी कर्म-अकर्मकी भलाई-बुराई ठहरानेके लिये, सबसे पहले कर्ताकी बुद्धिकाही विचार करना पड़ता है - अर्थात् यह विचार करना पड़ता है, कि उसने उस कार्यको किस उद्देश्य, भाव या हेतुसे किया; और उसको उस कर्मके परिणामका ज्ञान था या नहीं। किसी धनवान् मनुष्यके लिये यह कोई कठिन काम नहीं, कि वह अपनी इच्छाके अनुसार मन-माना दान दे दें। यह दानविषयक काम 'अच्छा' भलेही हो; परंतु उसकी सच्ची नैतिक योग्यता उस दानकी स्वाभाविक क्रियासे नहीं ठहराई जा सकती। इसके लिये यहभी देखना पड़ेगा, कि उस धनवान् मनुष्यकी बुद्धि सचमुच श्रद्धायुक्त है, या नहीं; और उसका निर्णय करनेके लिये यदि स्वाभाविक रीतिसे किये गये दानके सिवा और कुछ प्रमाण न हो; तो इस दानकी योग्यता किसी श्रद्धापूर्वक किये गये दानकी योग्यताके बराबर नहीं समझी जाती; और कुछ नहीं, तो संदेह करनेके लिये उचित कारण अवश्य रह जाता है। सब धर्म-अधर्मका विवेचन हो जानेपर महाभारतमें यही बात एक आख्यानके रूपमें उत्तम रीतिसे समझाई