श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रचलित है, किसीभी समय समाजमें संन्यास-मार्गियोंकी अपेक्षा कर्मयोगमेंही अनुयायियोंकी संख्या हजारों गुना अधिक हुआ करती है; और, पुराण-इतिहासके जिन कर्मशील महापुरुषोंका अर्थात् कर्मवीरोंका वर्णन है, वे सब कर्मयोग-मार्गकाही अवलंब करनेवाले थे। यदि ये सब बातें सच हैं, तो क्या इन कर्मवीरोंमें किसीकोभी यह नहीं सूझा होगा, कि अपने कर्मयोग-मार्गका समर्थन किया जाना चाहिये ? अच्छा; यदि कहा जाय, कि उस समय जितना ज्ञान था, वह सब ब्राह्मण जातिमेंही था; और वेदान्ती ब्राह्मण कर्म करनेके विषयमें उदासीन रहा करते थे; इसलिये कर्मयोगविषयक ग्रंथ नहीं लिखे गये होंगे; तोभी यह आक्षेप उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उपनिषत्कालमें और उसके बाद क्षत्रियोंमेंभी जनक और श्रीकृष्ण सरीखे ज्ञानी पुरुष हो गये हैं; और व्याससदृश बुद्धिमान् ब्राह्मणोंने बड़े बड़े क्षत्रियोंका इतिहासभी लिखा है। इस इतिहासको लिखते समय क्या उनके मनमें यह विचार न आया होगा, कि जिन प्रसिद्ध पुरुषोंका इतिहास हम लिख रहे हैं, उनके चरित्रके मर्म या रहस्यकोभी प्रकट कर देना चाहिये ? इस मर्म या रहस्यको कर्मयोग अथवा व्यवहारशास्त्र कहते हैं; और इसे बतलानेके लियेही महाभारतमें स्थान-स्थानपर सूक्ष्म धर्म-अधर्मका विवेचन करके, अंतमें संसारके धारण एवं पोषणके लिये कारणभूत सदाचरण अर्थात् धर्मके मूल तत्त्वोंका विवेचन मोक्ष-दृष्टिको न छोड़ते हुए गीतामें किया गया है। अन्यान्य पुराणोंमें भी ऐसे बहुतसे प्रसंग पाये जाते हैं। परंतु गीताके तेजके सामने अन्य सब विवेचन फीके पड़ जाते हैं; इसी कारणसे भगवद्गीता कर्मयोग- शास्त्रका प्रधान ग्रंथ हो गया है। हमने इस बातका पिछले प्रकरणोंमें विस्तृत विवेचन किया है, कि कर्मयोगका सच्चा स्वरूप क्या है। तथापि जबतक इस बातकी तुलना न की जावे, कि गीतामें वर्णन किये गये कर्म-अकर्मके आध्यात्मिक मूल तत्त्वोंमें पश्चिमी पंडितों द्वारा प्रतिपादित नीतिके मूलतत्त्व कहाँ तक मिलते हैं; तबतक यह नहीं कहा जा सकता, कि गीता-धर्मका निरूपण पूरा हो गया। इस प्रकार तुलना करते समय दोनों ओरके अध्यात्मज्ञानकीभी तुलना करनी चाहिये। परंतु यह बात सर्वमान्य है, कि अबतक पश्चिमी आध्यात्मिक ज्ञानकी पहुँच हमारे वेदान्तसे अधिक दूरतक नहीं होने पाई है; इसी कारणसे पूर्वी और पश्चिमी अध्यात्मशास्त्रोंकी तुलना करनेकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती।* ऐसी अवस्थामें अब केवल उस नीति- * वेदान्त और पश्चिमी तत्त्वज्ञानकी तुलना प्रोफेसर डायसनके The Elements of Metaphysics नामक ग्रंथमें कई स्थानोंमें की गई है। इस ग्रंथके दूसरे संस्करणके अंतमें ' On the Philosophy of Vedanta' इस विषयपर एक व्याख्यानभी छापा गया है। जब प्रो. डायसन सन १८९३ में हिंदुस्तानमें आयेथे, तब उन्होंने बंबईकी रायल एशियाटिक सोसायटीमें यह व्याख्यान दिया था। इसके अतिरिक्त The Religion and Philosophy of the Upanishads नामक डायसनसाहबका ग्रंथभी इस विषयपर पढ़ने योग्य है।