श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरो, सच बोलो, धर्माचरण करो, इत्यादि बातें इसी प्रकारकी हैं। मनुस्मृति आदि स्मृति-ग्रंथोंमें तथा उपनिषदोंमें ये विधियाँ, आज्ञाएँ अथवा आचार स्पष्ट रीतिसे बतलाये गये हैं। परंतु मनुष्य ज्ञानवान् प्राणी है; इसलिये उसका समाधान केवल ऐसी विधियों या आज्ञाओंमें नहीं हो सकता; क्योंकि मनुष्यकी यही स्वाभाविक इच्छा होती है, कि वह उन नियमोंके बनाये जानेका कारणभी जान ले; और इसलिये वह विचार करके इन नियमोंके नित्य तथा मूल तत्त्वकी खोज करता है - बस; यही दूसरी रीति है, कि जिसमें कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप आदिका विचार किया जाता है। व्यावहारिक धर्मके अंतको इस रीतिसे देखकर उसके मूल तत्त्वोंको ढूँढ़ निकालना शास्त्रका काम है; तथा उस विषयके केवल नियमोंको एकत्र करके बतलाना आचारसंग्रह कहलाता है। कर्ममार्गका आचार-संग्रह स्मृति-ग्रंथोंमें है; और उनके आचारोंके मूल तत्त्वोंका शास्त्रीय अर्थात् तात्त्विक विवेचन भगवद्गीतामें संवाद- पद्धतिसे या पौराणिक रीतिसे किया गया है। अतएव भगवद्गीताके प्रतिपाद्य विषयको केवल कर्मयोग न कहकर कर्मयोगशास्त्र कहनाही अधिक उचित तथा प्रशस्त होगा; और यही योगशास्त्र शब्द भगवद्गीताके अध्याय-समाप्ति-सूचक संकल्पमें आया है। जिन पश्चिमी पंडितोंने पारलौकिक दृष्टिको त्याग दिया है या जो लोग उसे गौण मानते हैं, वे गीतामें प्रतिपादित कर्मयोगशास्त्रकोही भिन्न भिन्न लौकिक नाम दिया करते हैं - जैसे सद्व्यवहारशास्त्र, सदाचारशास्त्र, नीतिशास्त्र, नीतिमीमांसा, नीतिशास्त्रके मूल तत्त्व, कर्तव्यशास्त्र, कार्य-अकार्य व्यवस्थिति, समाजधारण- शास्त्र इत्यादि। इन लोगोंकी नीति-मीमांसाकी पद्धतिभी लौकिकही रहती है। इसी कारणसे ऐसे पाश्चात्त्य पंडितोंके ग्रंथोंका जिन्होंने अवलोकन किया है, उनमेंसे बहुतोंकी यह समझ हो जाती है, कि संस्कृत साहित्यमें सदाचरण या नीतिके मूल तत्त्वोंकी चर्चा किसीने नहीं की है। वे कहने लगते हैं कि, "हमारे यहाँ जो कुछ गहन तत्त्वज्ञान है, वह सिर्फ़ हमारा वेदान्तही है, और वर्तमान वेदान्त-ग्रंथोंको देखो; तो मालूम होगा, कि वे सांसारिक कर्मोंके विषयमें प्रायः उदासीन हैं। ऐसी अवस्थामें कर्मयोगशास्त्रका अथवा नीतिका विचार कहाँ मिलेगा ? यह विचार व्याकरण अथवा न्यायके ग्रंथोंमें तो मिलनेवाला हैही नहीं; और स्मृति-ग्रंथोंमें धर्मशास्त्रके संग्रहके सिवा और कुछभी नहीं; इसलिये हमारे प्राचीन शास्त्रकार, मोक्षहीके गूढ विचारोंमें निमग्न होनेके कारण सदाचरणके या नीतिधर्मके मूल-तत्त्वोंका विवेचन करना भूल गये !" परंतु महाभारत और गीताको ध्यानपूर्वक पढ़नेसे यह भ्रमपूर्ण समझ दूर हो जा सकती है। इतनेपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि महाभारत एक अत्यंत विस्तीर्ण ग्रंथ है, इसलिये उसको पढ़कर पूर्णतया मनन करना बहुतही कठिन है; और गीता यद्यपि एक छोटा-सा ग्रंथ है तोभी उसमें सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतानुसार केवल मोक्ष-प्राप्तिहीका ज्ञान बतलाया गया है। परंतु किसीने इस बातको नहीं जाँचा, कि संन्यास और कर्मयोग, दोनों मार्ग हमारे यहाँ वैदिक कालसेही