भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

पंद्रहवाँ प्रकरण उपसंहार तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । *

  • गीता ८. ७ चाहे आप गीताके अध्यायोंकी संगति या मेल देखिये, या उन अध्यायोंके विष- योंका मीमांसकोंकी पद्धतिसे पृथक् पृथक् विवेचन कीजिये; किसीभी दृष्टिसे विचार कीजिये; अंतमें गीताका यही सच्चा तात्पर्य सिद्ध होता कि "ज्ञान भक्ति- युक्त कर्मयोग" ही गीताका सार है; अर्थात् सांप्रदायिक टीकाकारोंने कर्मयोगको गौण ठहरा कर गीताके जो अनेक प्रकारके तात्पर्य बतलाये हैं, वे यथार्थ नहीं, हैं; किंतु उपनिषदोंमें वर्णित अद्वैत वेदान्तका भक्तिके साथ मेल कर उसके द्वारा बड़े बड़े कर्मवीरोंके चरित्रोंका रहस्य या उनके जीवनक्रमकी उपपत्ति बतलानाही गीताका सच्चा तात्पर्य है। मीमांसकोंके कथनानुसार केवल श्रौत-स्मार्त कर्मोंको सदैव करते रहना भलेही शास्त्रोक्त हो; तोभी ज्ञानरहित केवल तांत्रिक क्रियासे बुद्धिमान् मनुष्यका समाधान नहीं होता; और यदि उपनिषदोंमें वर्णित धर्मको देखें, तो वह केवल ज्ञानमय होनेके कारण अल्प-बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये अत्यंत कष्टसाध्य है। इसके सिवा एक और बात है, उपनिषदोंका संन्यास-मार्गभी लोक- संग्रहका बाधक है; इसलिये भगवानने ऐसे ज्ञानमूलक, भक्ति-प्रधान और निष्काम कर्मविषयक धर्मका उपदेश गीतामें किया है, कि जिसका पालन आमरण किया जावे, जिसमे बुद्धि (ज्ञान), प्रेम (भक्ति) और कर्तव्यका ठीक ठीक मेल हो जावे; मोक्षकी प्राप्तिमें कुछ अंतर न पड़ने पावे; और लोक-व्यवहारभी सरलतासे होता रहे। इसीमें कर्म-अकर्मके शास्त्रका सब सार भरा हुआ है। अधिक क्या कहें, गीताके उपक्रम-उपसंहारसे यह बात स्पष्टतया विदित हो जाती है, कि अर्जुनको इस धर्मका उपदेश करनेमें कर्म-अकर्मका विवेचनही मूल कारण है। इस बातका विचार दो तरहसे किया जाता है, कि किस कर्मको धर्म्य, पुण्यप्रद, न्याय्य या श्रेयस्कर कहना चाहिये; और किस कर्मको इसके विरुद्ध अर्थात् अधर्म्य, पापप्रद, अन्याय्य या गर्ह्य कहना चाहिये। पहली रीति यह है, कि उपपत्ति, कारण या मर्म न बतलाकर केवल यह कह दे, कि किसी कामको अमुक रीतिसे करो, कि तो वह शुद्ध होगा, और अन्य रीतिसे करो, तो अशुद्ध हो जायगा। उदाहरणार्थ - हिंसा मत करो, चोरी मत
  • "इसलिये सदैव मेरा स्मरण कर और लड़ाई कर।" लड़ाई कर - शब्दकी योजना यहापर प्रसंगानुसार की गई है; परंतु उसका अर्थ केवल 'लड़ाई कर' ही नहीं है यह अर्थभी समझा जाना चाहिये, कि "यथाधिकार कर्म कर।"