श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताध्याय-संगति ४७१
परंतु इससे उसका मूल स्वरूप नहीं बदलता; बस, ठीक यही हाल गीताकाभी है। उसमें सब कुछ भलेही हो; परंतु उसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय तो कर्मयोगही है। यद्यपि इस प्रकार कर्मयोगही मुख्य विषय है; तथापि कर्मके साथही मोक्ष-धर्मके मर्मकाभी इसमें भली भाँति निरूपण किया गया है, इसलिये कार्य-अकार्यका निर्णय करनेके हेतु बतलाया गया यह गीता-धर्मही- “स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने ” (मभा. अश्व. १६. १२) – ब्रह्मकी प्राप्ति करा देनेके लियेभी पूर्ण समर्थ है; और भगवानने अर्जुनसे अनुगीताके आरंभमें स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि इस मार्गमे चलनेवालेको मोक्ष-प्राप्तिके लिये किसीभी अन्य अनुष्ठानकी आव- श्यकता नहीं है। हम जानते हैं, कि संन्यास-मार्गके उन लोगोंको हमारा उपरोक्त कथन रोचक प्रतीत न होगा, जो यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि विना सब व्याव- हारिक कर्मोंका त्याग किये मोक्षकी प्राप्ति होती नहीं; परंतु इसके लिये कोई अन्य उपाय नहीं है। गीता-ग्रंथ न तो संन्यास-मार्गका है और न निवृत्ति-प्रधान किसी दूसरेही पंथकाभी। इतनाही नहीं, तो गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति इसीलिये हुई है, कि वह ब्रह्मज्ञानकी दृष्टिसे ठीक ठीक युक्तिसहित इस प्रश्नका उत्तर दे, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपरभी कर्मोंका संन्यास करना अनुचित क्यों है? इसलिये संन्यास-मार्गके अनुयायियोंको चाहिये, कि वे गीताकोभी ‘संन्यास देने’ की झंझटमें न पड़ ‘संन्यास- मार्ग-प्रतिपादक’ जो अन्य वैदिक ग्रंथ हैं, उन्हींमे संतुष्ट रहें। अथवा गीतामें संन्यास- मार्गकोभी भगवानने जिस निरभिमान बुद्धिसे निःश्रेयस्कर कहा है, उसी मम-बुद्धिसे सांख्यमार्गवालोंकोभी यह कहना चाहिये, कि “परमेश्वरका हेतु यह है, कि संसार चलता रहे; और जब कि इसीलिये वह बार बार अवतार धारण करता है, तब ज्ञानप्राप्तिके अनंतर निष्कामबुद्धिसे व्यावहारिक कर्मोंको करते रहनेके जिस मार्गका उपदेश भगवानने गीतामें दिया है, वही मार्ग कलिकालमें उपयुक्त है।” – और ऐसा कहनाही उनके लिये सर्वोत्तम पक्ष है।