भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 515

४७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संन्यास और वैराग्यका अर्थ यह नहीं किया है, कि कर्मोंको छोड़ देना चाहिये; किन्तु यह कहा है, कि केवल फलाशाकाही त्याग करनेमें सच्चा वैराग्य या संन्यास है, और अन्तमें सिद्धान्त किया है, कि उपनिषत्कारोंके कर्म-संन्यासकी अपेक्षा निष्काम कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर है। कर्मकांडी मीमांसकोंका यह मतभी गीताको मान्य है, कि यदि केवल यज्ञके लियेही वेदविहित यज्ञयागादि कर्मोंका आचरण किया जावे, तो वे बंधक नहीं होते; परंतु 'यज्ञ' शब्दका अर्थ विस्तृत करके गीताने उक्त मतमें यह सिद्धान्त और जोड़ दिया है, कि यदि फलाशा त्याग कर सब कर्म किये जावें, तो यही एक बड़ा भारी यज्ञ हो जाता है, इस लिये मनुष्यका यही कर्तव्य है, कि वह वर्णा- श्रमविहित सब कर्मोंको केवल निष्काम बुद्धिसे सदैव करता रहे। सृष्टिकी उत्पत्तिके क्रमके विषयमें उपनिषत्कारोंके मतकी अपेक्षा सांख्योंका मत गीतामें प्रधान माना गया है; तोभी प्रकृति और पुरुषतकही न ठहर कर, सृष्टिके उत्पत्तिक्रमकी परंपरा उपनिषदोंमें वर्णित नित्य परमात्मापर्यंत ले जाकर भिड़ा दी गई है। केवल बुद्धिके द्वारा अध्यात्मज्ञानको प्राप्त कर लेना क्लेशदायक है, इसलिये 'भागवत या नारायणीय धर्ममें जो कहा है, कि उसे भक्ति और श्रद्धाके द्वारा प्राप्त कर लेना चाहिये, उस वासुदेव-भक्तिकी विधिका वर्णनभी गीतामें किया गया है; परंतु इस विषयमेंभी भागवत धर्मकी सब बातोंमें कुछ नक़ल नहीं की गई है; वरन् भागवत् धर्ममेंभी वर्णित जीवके उत्पत्तिविषयक इस मतको वेदान्त-सूत्रकी नाईं गीतानेभी त्याज्य माना है, कि वासुदेवसे संकर्षण या जीव उत्पन्न हुआ है; और भागवत धर्ममें वर्णित भक्तिका तथा उपनिषदोंके क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-संबंधी सिद्धान्तका गीतामें पूरा पूरा मेल कर दिया है। इसके सिवा मोक्ष-प्राप्तिका दूसरा साधन पातंजलयोग है। यद्यपि गीताका कहना यह नहीं कि पातंजलयोगही जीवनका मुख्य कर्तव्य है; तथापि गीता यह कहती है, कि बुद्धिको सम करनेके लिये इंद्रियनिग्रह करनेकी आवश्यकता है, इसलिये उतने भरके लिये पातंजलयोगके यम-नियम-आसन आदि साधनोंका उपयोग कर लेन चाहिये। सारांश, वैदिक धर्ममें मोक्ष-प्राप्तिके जो जो साधन बतलाये गये हैं, उन सभीका कुछ-न-कुछ वर्णन, कर्मयोगका सांगोपांग विवेचन करनेके समय, गीतामें प्रसंगानुसार करना पड़ा है। यदि इस सब वर्णनोंको स्वतंत्र माना जाय, तो विसंगति उत्पन्न होकर ऐसा आभास होता है कि गीताके सिद्धान्त परस्पर विरोधी हैं; और यह आभास भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाओंसे तो औरभी अधिक दृढ़ हो जाता है। परंतु जैसा हमने ऊपर कहा है, उसके अनुसार यदि यह सिद्धान्त किया गया, कि ब्रह्मज्ञान और भक्तिका मेल करके अंतमें उनके द्वारा कर्मयोगका समर्थन करनाही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है, तो ये सब विरोध लुप्त हो जाते हैं और पूर्ण व्यापक दृष्टिको स्वीकार कर जिस अलौकिक चातुर्यसे गीताके तत्त्वज्ञानके साथ भक्ति तथा कर्मयोगका यथोचित मेल कर दिया गया है, उसको देख दाँतों तले अँगुली दबाकर रह जाना पड़ता है। गंगामें कितनीही नदियाँ क्यों न आ मिलें;