भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 514

गीताध्याय-संगति ४६९ जन्म-स्वभावकी ओर, अर्थात् प्रारब्ध-कर्मकीही ओर ध्यान न देकर यदि शास्त्रकी नीतिके अनुसार इस बातका विचार किया जावे, कि जिसने पूरी आत्म-स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी पुरुषको इस कर्म-भूमिमें किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये; तो गीताके अनुसार यह सिद्धान्त करना पड़ता है, कि कर्मत्याग-पक्ष गौण है; और सृष्टिके आरंभमे मरीचि प्रभृतिने तथा आगे चल कर जनक आदिकोंने जिस कर्मयोगका आचरण किया है, उसीको ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रहके लिये स्वीकार करे। क्योंकि, अब न्यायतः यही कहना पड़ता है, कि परमेश्वरकी निर्माण की हुई सृष्टिको चलानेका कामभी ज्ञानी मनुष्यकोही करना चाहिये; और, इस मार्गमे ज्ञान-सामर्थ्यके साथही कर्म-सामर्थ्यकाभी विरोधरहित मेल होनेके कारण, यह कर्मयोग केवल सांख्यमार्गकी अपेक्षा कहीं अधिक योग्यताका निश्चित होता है। सांख्य और कर्मयोग, इन दोनों निष्ठाओमें जो मुख्य भेद है, उसका उक्त रीति-से विचार करने पर सांख्य + निष्काम कर्म = कर्मयोग यह समीकरण निष्पन्न होता है, और वैशंपायनके कथनानुसार गीता-प्रतिपादन प्रवृत्ति-प्रधान कर्मयोगके प्रतिपादनमेंही सांख्य-निष्ठाके निरूपणकाभी सरलतासे समावेश हो जाता है (मभा. शां. ३४८. ५३) ; और इसी कारणसे गीताके संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंको यह बतलानेके लिये अच्छा अवसर मिल गया है, कि गीतामें उनका सांख्य या संन्यास- मार्गही प्रतिपादित है। गीताके जिन श्लोकोंमें कर्मको श्रेयस्कर निश्चित कर कर्म करनेको कहा है, उन श्लोकोंकी ओर ध्यान न देनेसे अथवा यह मनगढ़ंत बात कह देनेसे, कि वे सब श्लोक अर्थवादात्मक अर्थात् आनुषंगिक एवं प्रशंसात्मक हैं या किसी अन्य युक्तिसे उपर्युक्त समीकरणके 'निष्काम कर्म' को उड़ा देनेसे, उसी समीकरणका 'सांख्य = कर्मयोग' यह रूपान्तर हो जाता है; और फिर यह कहनेके लिये अवसर मिल जाना है, कि गीतामें सांख्य-मार्गकाही प्रतिपादन किया है। परंतु इस रीतिसे गीताका अर्थ किया है, वह गीताके उपक्रमोपसंहारके अत्यंत विरुद्ध है; और इस ग्रंथमें हमने स्थान-स्थानपर स्पष्ट रीतिसे दिखला दिया है, कि गीतामें कर्मयोगको गौण तथा संन्यासको प्रधान मानना वैसेही अनुचित है, जैसे घर-मालिकको कोई उसीके घरमें पाहुना कह दे; और पाहुनेको घर-मालिक ठहरा दे; और जिन लोगोंका मत है, कि गीतामे केवल वेदान्त, केवल भक्ति या सिर्फ पातंजलयोगहीका प्रतिपादन किया गया है, उनके उन मतोंकाभी खंडन हम करही चुके हैं। गीतामें कौन-सी बात नहीं है? वैदिक धर्ममे मोक्ष-प्राप्तिके जितने साधन या मार्ग हैं, उनमेंसे प्रत्येक मार्गका कुछ-न-कुछ भाग गीतामें है; और इतना होनेपरभी, "भूतभृन्न च भूतस्थो"के (गीता ९. ५) न्यायसे गीताका सच्चा रहस्य इन मार्गोंकी अपेक्षा भिन्नही है। संन्यास-मार्ग अर्थात् उपनिषदोंका यह तत्त्व गीताको ग्राह्य है, कि ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं; परंतु उसे निष्काम कर्मके साथ जोड़ देनेके कारण गीता-प्रतिपादित भागवत धर्ममेंही यति-धर्मकाभी सहजही समावेश हो गया है। तथापि गीताम