भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 522

उपसंहार ४७७ व्यक्त होती है। यह तो सभी जानते हैं, कि धैर्य आदि गुणोंके समान शुद्ध बुद्धिकी सच्ची परीक्षा संकटकालमेंही हुआ करती है; और कांटनेभी अपने नीतिग्रंथके आरंभमें यही प्रतिपादन किया है, कि संकटके समयभी जिसकी शुद्ध बुद्धि (नैतिक सत्त्व) भ्रष्ट नहीं होती, वही सच्चा नीतिमान् है। उक्त नेवलेका अभिप्रायभी यही था। परंतु युधिष्ठिरकी शुद्ध बुद्धिकी परीक्षा कुछ राज्यारूढ होनेपर संपत्ति- कालमें किये गये एक अश्वमेध-यज्ञमेही होनेकी न थी; उसके पहलेही अर्थात् आपत्ति- कालकी अनेक अड़चनोंके प्रसंगोपर ब्राह्मणके समानही उसकी पूरी परीक्षा हो चुकी थी। इसीलिये महाभारतका यह सिद्धान्त है, कि धर्म-अधर्मके निर्णयके सूक्ष्म न्यायसेभी युधिष्ठिरको धार्मिकही कहना चाहिये। कहना नहीं होगा, कि वह नेवला निंदक ठहराया गया है। तथापि महाभारतमें यह वर्णन है, कि अश्वमेध करनेवालेको जो गति मिलती है, वही उस ब्राह्मणकोभी मिली। इससे यही सिद्ध होता है, कि उस ब्राह्मणके कर्मकी योग्यता युधिष्ठिरके यज्ञकी अपेक्षा अधिक भलेही नहो; तथापि इसमें संदेह नहीं, कि महाभारतकार उन दोनोंकी नैतिक और धार्मिक योग्यता एकसमान मानते हैं। व्यावहारिक कार्योंको देखनेसेभी मालूम हो सकता है. कि जब किसी धर्मकृत्यके लिये या लोकोपयोगी कार्यके लिये लखपति मनुष्य हजार रुपये चंदा देता है और कोई गरीब मनुष्य एक रुपया चंदा देता है; तब हम लोग उन दोनोंकी नैतिक योग्यता एक समानही समझते हैं! 'चंदा' शब्दको देखकर यह दृष्टान्त कुछ लोगोंको कदाचित् नया मालूम हो, परंतु यथार्थमें बात ऐसी नहीं है, क्योंकि उक्त नेवलेकी कथाका निरूपण करते समय महाभारतमेंही धर्म-अधर्मके विवेचनमें कहा गया है, कि :- सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च । दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः ॥ "हजारवालेने सौ, सौवालेने दस, अथवा किसीने यथाशक्ति थोड़ासा पानीभी दिया, तोभी ये सब तुल्यफल हैं; अर्थात् इन सबकी योग्यता एकसमान है" (महा. अश्व. ९०.९७); और "पत्रं पुष्पं फलं तोयं" (गीता. ९. २६) - इस गीतावाक्यका तात्पर्यभी यही है। हमारे धर्ममेंही क्या, ईसाई धर्ममेंभी इस तत्त्वका संग्रह है। ईसा मसीहने एक जगह कहा है - "जिसके पास अधिक है, उससे अधिक पानेकी आशा की जाती है" (ल्यूक. १२.४८)। एक दिन जब ईसा मंदिर (गिरिजाघर) गया था, तब वहाँ धर्मार्थ द्रव्य इकट्ठा करनेका काम शुरू होनेपर एक अत्यंत गरीब विधवा स्त्रीने अपने पासके दो पैसे उस धर्मकार्यके लिये दे दिये। यह देखकर ईसाके मुँहसे यह उद्गार निकल पड़ा, कि "इस स्त्रीने अन्य सब लोगोंकी अपेक्षा अधिक दान दिया है।" इसका वर्णन बाइबलमें (मार्क. १२. ४३; ४४) है। इससे यह स्पष्ट है, कि यह बात ईसाकोभी मान्य थी, कि कर्मकी योग्यता कर्ताकी बुद्धिसेही निश्चित की जानी चाहिये; और यदि कर्ताकी बुद्धि शुद्ध हो. तो