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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 956 में से

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पृष्ठ 523

४७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बहुधा छोटे छोटे कर्मोंकी नैतिक योग्यताभी बड़े बड़े कर्मोंकी योग्यताके बराबरही हो जाती है। इसके विपरीत - अर्थात् जब बुद्धि शुद्ध न हो तब - किसी कर्मकी नैतिक योग्यताका विचार करनेपर यह मालूम होगा, कि यद्यपि हत्या करना केवल एकही कर्म है; तथापि अपनी जान बचानेके लिये आक्रमणकारीकी हत्या करनेमें और किसी राह चलते धनवान् मुसाफ़िरको द्रव्यके लोभसे मार डालनेमें, नैतिक दृष्टिसे बहुत अंतर है। जर्मन कवि शिलरने इसी आशयके एक प्रसंगका वर्णन अपने 'विलियम टेल' नामक नाटकके अंतमें किया है; और वहाँ बाह्यतः एकहीसे दीख पड़नेवाले दो कृत्योंमें बुद्धिकी शुद्धता-अशुद्धताके कारण जो भेद दिखलाया गया है, वही भेद स्वार्थत्याग और स्वार्थके लिये की गई हत्यामेंभी है। इससे मालूम होता है, कि कर्म छोटे-बड़े हों या बराबर हों; उनमें नैतिक दृष्टिसे जो भेद हो जाता है, वह कर्ताके हेतुके कारणही हुआ करता है। इस हेतुकोही उद्देश्य, वासना या बुद्धि कहते हैं। इसका कारण यह है, कि 'बुद्धि' शब्दका शास्त्रीय अर्थ यद्यपि 'व्यवसायात्मक इंद्रिय' है; तोभी ज्ञान, वासना, उद्देश्य या हेतु सब बुद्धींद्रियके व्यापारकेही फल हैं, अतएव इनके लियेभी बुद्धि शब्दहीका सामान्यतः प्रयोग किया जाता है; और पहलेभी यह बतलाया जा चुका है, कि स्थितप्रज्ञकी साम्य-बुद्धिमें व्यवसायात्मक बुद्धिकी स्थिरता और वासनात्मक बुद्धिकी शुद्धता, दोनोंका समावेश होता है, भगवान्ने अर्जुनसे कुछ यह सोचनेको नहीं कहा, कि युद्ध करनेसे कितने मनुष्योंका कितना कल्याण होगा और कितने लोगोंकी कितनी हानि होगी; बल्कि अर्जुनसे भगवान् यही कहते हैं, कि इस समय यह विचार गौण है, कि तुम्हारे युद्ध करनेसे भीष्म मरेंगे कि द्रोण; मुख्य प्रश्न यही है, कि तुम किस बुद्धि (हेतु या उद्देश्य) से युद्ध करनेको तैयार हुए हो। यदि तुम्हारी बुद्धि स्थितप्रज्ञोंके समान होगी, और यदि तुम उस शुद्ध और पवित्र बुद्धिसे अपना कर्तव्य करने लगोगे, तो फिर चाहे भीष्म मरे या द्रोण; तुम्हें उसका पाप नहीं लगेगा। तुम कुछ इस फलकी आशासे तो युद्ध करही नहीं रहो हो, कि भीष्म मारे जावें। जिस राज्यपर तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है, उसका हिस्सा तुमने माँगा; और युद्ध टालनेके लिये यथाशक्ति गम खाकर बीच-बचाव करनेकाभी तुमने बहुत कुछ प्रयत्न किया। परंतु जब इस मेलके प्रयत्नसे और साधुपनके मार्गसे निर्वाह नहीं हो सका, तब लाचारीसे तुमने युद्ध करनेका निश्चय किया है, इसमें तुम्हारा कुछ दोष नहीं है। क्योंकि दुष्ट मनुष्यसे किसी ब्राह्मणकी नाईं अपने धर्मानुसार प्राप्त अधिकारकी भिक्षा न माँगते हुए, आवश्यकता आ पड़नेपर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार लोकसंग्रहार्थ उसकी प्राप्तिके लिये अंतमें युद्ध करनाही तुम्हारा कर्तव्य है (महा. उ. २८, ३२; वनपर्व ३३. १८, ५०)। भगवान्के उक्त युक्तिवादको व्यासजीनेभी स्वीकार किया है, और, उन्होंने इसीके द्वारा आगे चलकर शांतिपर्वमें युधिष्ठिरका समाधान किया है (शां. अ. ३०. ३३)। परंतु कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये बुद्धिको इस तरहसे श्रेष्ठ

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