श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४७९ मान लें, तोभी अब यह अवश्य जान लेना चाहिये, कि शुद्ध बुद्धि किसे कहते हैं। क्योंकि, मन और बुद्धि दोनों प्रकृतिके विकार हैं; इसलिये वे स्वभावतः तीन प्रकारके अर्थात् सात्त्विक, राजस और तामस हो सकते हैं। इसलिये गीतामें कहा है, कि शुद्ध या सात्त्विक बुद्धि वह है, कि जो बुद्धिसेभी परे रहनेवाले नित्य आत्माके स्वरूपको पहचाने; और यह पहचान कर, कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है, उसीके अनु- सार कार्य-अकार्यका निर्णय करे। इस सात्त्विक बुद्धिकाही दूसरा नाम साम्यबुद्धि है, और इसके 'साम्य' शब्दका अर्थ "सर्वभूतान्तर्गत आत्माकी एकता या समानता- को पहचाननेवाली" है। जो बुद्धि इस समानताको नहीं जानती, वह न तो शुद्ध है और न सात्त्विकभी। इस प्रकार जब यह मान लिया गया, कि नीतिका निर्णय करनेमें साम्य-बुद्धिही श्रेष्ठ है, तब यह प्रश्न उठता है, कि बुद्धिकी इस समता अथवा साम्यको कैसे पहचानना चाहिये? क्योंकि बुद्धि तो अंतरिंद्रिय है; इसलिये उसका भलाबुरापन हमारी आँखोंसे दीख नहीं पड़ता। अतः बुद्धिकी समता तथा शुद्धताकी परीक्षा करनेके लिये पहले मनुष्यके बाह्य आचरणको देखना चाहिये; नहीं तो कोईभी मनुष्य ऐसा कह कर - कि मेरी बुद्धि शुद्ध है - मनमाना बर्ताव करने लगेगा। इसीसे शास्त्रोंका सिद्धान्त है, कि सच्चे ब्रह्मज्ञानी पुरुषकी पहचान उसके स्वभावसेही हुआ करती है। जो केवल मुँहसे कोरी बातें करता है, वह सच्चा साधु नहीं। भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञ तथा भगवद्भक्तोंके लक्षण बतलाते समय आम करके इसी बातका वर्णन किया गया है, कि वे संसारके अन्य लोगोंके साथ कैसा बर्ताव करते हैं; और तेरहवें अध्यायमें ज्ञानकी व्याख्याभी इसी प्रकार - अर्थात् यह बतलाकर, कि स्वभावपर ज्ञानका क्या परिणाम होता है - की गई है। इससे यह साफ़ मालूम होता है, कि गीता यह कभी नहीं कहती, कि बाह्य कर्मोंकी ओर कुछभी ध्यान न दो। परंतु इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि किसी मनुष्यकी विशेषकरके अपरिचित मनुष्यकी - बुद्धिकी समताकी परीक्षा करनेके लिये यद्यपि केवल उसका बाह्य कर्म या आचरण और, उसमेंभी, संकट-समयका आचरणही प्रधान साधन है; तथापि केवल इस बाह्य आचरण द्वाराही नीतिमत्ताकी अचूक परीक्षा हमेशा नही हो सकती। क्योंकि उक्त नकुलोपाख्यानसे यह सिद्ध हो चुका है, कि यदि बाह्य कर्म छोटाभी हो; तथापि विशेष अवसरपर उसकी नैतिक योग्यता बड़े कर्मोंकेही बराबर हो जाती है। इसीलिये हमारे शास्त्रकारोंने यह सिद्धान्त किया है, कि बाह्य-कर्म चाहे छोटा हो या बड़ा, एकहीको सुख देनेवाला हो या अधिकांश लोगोंको; उसको केवल बुद्धिकी शुद्धताका एक प्रमाण मानना चाहिये, इसमे अधिक महत्त्व उसे नहीं देना चाहिये। किंतु उस बाह्य-कर्मके आधारपर पहले यह देख लेना चाहिये, कि कर्म करनेवालेकी बुद्धि कितनी शुद्ध है; और अंतमें इस रीतिसे व्यक्त होनेवाली बुद्धिके आधारपरही उक्त कर्मकी नीतिमत्ताका निर्णय करना चाहिये, यह निर्णय केवल बाह्य-कर्मोंको देखनेमे ठीक नहीं हो सकता। यही कारण है, कि