भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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४८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है" (गीता. २. ४९) ऐसा कहकर गीताके कर्मयोगमें सम और शुद्ध-बुद्धिको अर्थात् वासनाकोही प्रधानता दी गई है। नारद-पंचरात्र नामक भागवतधर्मका गीतासे अर्वाचीन एक ग्रंथ है। उसमें मार्कंडेय नारदसे कहते हैं :- मानसं प्राणिनामेव सर्वकर्मैककारणम् । मनोनुरूपं वाक्यं च वाक्येन प्रस्फुटं मनः । "मनही लोगोंके सब कर्मोंका एक (मूल) कारण है। जैसा मन रहता है, वैसीही बात निकलती है; और बातचीतसे मन प्रकट होता है" (ना. पं. १. ७. १८) । सारांश यह है, कि मन (अर्थात् मनका निश्चय) सबसे प्रथम है, उसके अनन्तर सब कर्म हुआ करते हैं। इसीलिये कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये गीताके शुद्ध- बुद्धिके सिद्धान्तकोही बौद्ध ग्रंथकारोंने स्वीकृत किया है। उदाहरणार्थ, 'धम्मपद' नामक बौद्ध-धर्मोय प्रसिद्ध नीतिग्रंथके आरंभमेंही कहा है, कि :- मनोपुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा ( श्रेष्ठ ) मनोमया ॥ मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा ॥ ततो नं दुक्खमन्वेति चक्कंव वहतो पदं ॥ "मन याने मनका व्यापार प्रथम है। उसके अनंतर धर्म-अधर्मका आचरण होता है। ऐसा क्रम होनेके कारण इस काममें मनही मुख्य और श्रेष्ठ है, इसलिये इन सब धर्मोंको मनोमयही समझना चाहिये, अर्थात् कर्ताका मन जिस प्रकार शुद्ध या दुष्ट रहता है, उसी प्रकार उसके भाषण और कर्मभी भले-बुरे हुआ करते हैं, तथा उसी प्रकार आगे उसे सुख-दुःख मिलता है।"* इसी तरह उपनिषदों और गीताका यह अनुमानभी (कौषी. ३ १; गीता १८. १७) बौद्ध धर्ममें हो गया है, कि जिसका मन एक बार पूर्ण शुद्ध और निष्काम हो जाता है, उस स्थितप्रज्ञ पुरुषसे फिर कभी पाप होना संभव नही; अर्थात् सब कुछ करकेभी वह पाप-पुण्यसे अलिप्त रहता है। इसलिये बौद्ध धर्म-ग्रंथोंमें अनेक स्थलोंपर वर्णन किया गया है, कि 'अर्हत्' अर्थात् पूर्णावस्थामे पहुँचा हुआ मनुष्य हमेशाही शुद्ध और निष्पाप रहता है (धम्मपद २९४, २९५; मिलिंद प्र. ४. ५. ३) । पश्चिमी देशोंमें नीतिका निर्णय करनेके लिये दो पंथ हैं : पहला आधिदैवत पंथ, जिसके अनुसार, नीतिका निर्णय करनेके लिये सदसद्विवेक-देवताकी शरणमें

  • पाली भाषाके इस श्लोकका भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न अर्थ करते हैं। परंतु जहाँतक हम समझते हैं, इस श्लोककी रचना इसी तत्त्वपर की गई है, कि कर्म- अकर्मका निर्णय करनेके लिये मानसिक स्थितिका विचार अवश्य करना पड़ता है। 'धम्मपद'का मैक्समूलर साहबने अंग्रेजीमें भाषांतर किया है, उसमें इस श्लोककी टीका देखिये । S. B. E. Vol. X, pp. 3-4.