श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
४८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है" (गीता. २. ४९) ऐसा कहकर गीताके कर्मयोगमें सम और शुद्ध-बुद्धिको अर्थात् वासनाकोही प्रधानता दी गई है। नारद-पंचरात्र नामक भागवतधर्मका गीतासे अर्वाचीन एक ग्रंथ है। उसमें मार्कंडेय नारदसे कहते हैं :- मानसं प्राणिनामेव सर्वकर्मैककारणम् । मनोनुरूपं वाक्यं च वाक्येन प्रस्फुटं मनः । "मनही लोगोंके सब कर्मोंका एक (मूल) कारण है। जैसा मन रहता है, वैसीही बात निकलती है; और बातचीतसे मन प्रकट होता है" (ना. पं. १. ७. १८) । सारांश यह है, कि मन (अर्थात् मनका निश्चय) सबसे प्रथम है, उसके अनन्तर सब कर्म हुआ करते हैं। इसीलिये कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये गीताके शुद्ध- बुद्धिके सिद्धान्तकोही बौद्ध ग्रंथकारोंने स्वीकृत किया है। उदाहरणार्थ, 'धम्मपद' नामक बौद्ध-धर्मोय प्रसिद्ध नीतिग्रंथके आरंभमेंही कहा है, कि :- मनोपुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा ( श्रेष्ठ ) मनोमया ॥ मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा ॥ ततो नं दुक्खमन्वेति चक्कंव वहतो पदं ॥ "मन याने मनका व्यापार प्रथम है। उसके अनंतर धर्म-अधर्मका आचरण होता है। ऐसा क्रम होनेके कारण इस काममें मनही मुख्य और श्रेष्ठ है, इसलिये इन सब धर्मोंको मनोमयही समझना चाहिये, अर्थात् कर्ताका मन जिस प्रकार शुद्ध या दुष्ट रहता है, उसी प्रकार उसके भाषण और कर्मभी भले-बुरे हुआ करते हैं, तथा उसी प्रकार आगे उसे सुख-दुःख मिलता है।"* इसी तरह उपनिषदों और गीताका यह अनुमानभी (कौषी. ३ १; गीता १८. १७) बौद्ध धर्ममें हो गया है, कि जिसका मन एक बार पूर्ण शुद्ध और निष्काम हो जाता है, उस स्थितप्रज्ञ पुरुषसे फिर कभी पाप होना संभव नही; अर्थात् सब कुछ करकेभी वह पाप-पुण्यसे अलिप्त रहता है। इसलिये बौद्ध धर्म-ग्रंथोंमें अनेक स्थलोंपर वर्णन किया गया है, कि 'अर्हत्' अर्थात् पूर्णावस्थामे पहुँचा हुआ मनुष्य हमेशाही शुद्ध और निष्पाप रहता है (धम्मपद २९४, २९५; मिलिंद प्र. ४. ५. ३) । पश्चिमी देशोंमें नीतिका निर्णय करनेके लिये दो पंथ हैं : पहला आधिदैवत पंथ, जिसके अनुसार, नीतिका निर्णय करनेके लिये सदसद्विवेक-देवताकी शरणमें
- पाली भाषाके इस श्लोकका भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न अर्थ करते हैं। परंतु जहाँतक हम समझते हैं, इस श्लोककी रचना इसी तत्त्वपर की गई है, कि कर्म- अकर्मका निर्णय करनेके लिये मानसिक स्थितिका विचार अवश्य करना पड़ता है। 'धम्मपद'का मैक्समूलर साहबने अंग्रेजीमें भाषांतर किया है, उसमें इस श्लोककी टीका देखिये । S. B. E. Vol. X, pp. 3-4.
उपसंहार ४८१ जाना पड़ता है; और दूसरा आधिभौतिक पंथ है, कि जो इस बाह्य कसौटीके द्वाराही नीतिका निर्णय करनेके लिये कहता है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक हित किसमें है ?" परंतु ऊपर किये गये विवेचनसे यह स्पष्ट मालूम हो सकता है, कि ये दोनों पंथ शास्त्र-दृष्टिसे अपूर्ण तथा एकपक्षीय हैं। कारण यह है, कि सदसद्विवेकशक्ति कोई स्वतंत्र वस्तु या देवता नहीं; किंतु वह व्यवसायात्मका बुद्धिमेंही शामिल है, इसलिये प्रत्येक मनुष्यकी प्रकृति और स्वभावके अनुसार उसकी सदसद्विवेकबुद्धिभी सात्त्विक, राजस या तामस हुआ करती है। ऐसी अवस्थामें उसका कार्य-अकार्य निर्णय सदैव दोषरहित नहीं हो सकता; और यदि केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख "किसमें है, इस बाह्य आधिभौतिक कसौटीपरही ध्यान देकर नीति- मत्ताका निर्णय करें; तो कर्म करनेवाले पुरुषकी बुद्धिका कुछभी विचार नहीं हो सकेगा; तब यदि कोई मनुष्य चोरी या व्यभिचार करे; और उसके बाह्य अनिष्ट- कारक परिणामोंको कम करनेके लिये या छिपानेके लिये पहलेहीसे सावधान होकर कुछ कुटिल प्रबंध कर ले; तो यही कहना पड़ेगा, कि उसका दुष्कृत्य आधिभौतिक नीति-दृष्टिसे उतना निंदनीय नहीं है। अतएव यह बात नहीं, कि केवल वैदिक धर्म- मेंही कायिक, वाचिक और मानसिक शुद्धताकी आवश्यकताका वर्णन किया गया हो (मनु. १२. ३-८; ९. २९); किंतु वाइबलमेंभी व्यभिचारको केवल कायिक पाप न मानकर, परस्त्रीकी ओर दूसरे पुरुषोंका देखना या परपुरुषकी ओर दूसरी स्त्रियोंका देखनाभी व्यभिचार माना गया है (मेथ्यू. ५. २८); और बौद्ध धर्ममें कायिक अर्थात् बाह्य शुद्धताके साथ साथ वाचिक और मानसिक शुद्धताकीभी आव- श्यकता बतलाई गई है (धम्मपद ९६, ३९१)। इसके सिवा ग्रीन साहबका यहभी कहना है, कि बाह्य-सुखकोही परम साध्य माननेसे मनुष्य मनुष्यमें और राष्ट्र-राष्ट्रमें उसे पानेके लिये प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो जाती है; और कलहका होनाभी संभव है। क्योंकि बाह्य-सुखकी प्राप्तिके लिये जो बाह्य साधन आवश्यक है, वे प्रायः दूसरोंके सुखको कम किये बिना हमें नहीं मिल सकते। परंतु साम्य-बुद्धिके विषयमें ऐसा नहीं कह सकते। यह आंतरिक सुख आत्मवश है, अर्थात् यह किसी दूसरे मनुष्यके सुखमें बाधा न डालकर प्रत्येकको मिल सकता है। इतनाही नहीं; किंतु आत्मैक्यको पहचानकर सब प्राणियोंसे समताका व्यवहार करनाही जिसका स्वभाव बन जाता है वह गुप्त या प्रकट, किसी रीतिसेभी कोई दुष्कृत्य करही नहीं सकता; और फिर उसे यह बतलानेकी आवश्यकताभी नहीं रहती, कि "हमेशा यह देखते रहो, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है।" कारण यह है, कि कोईभी मनुष्य हो; वह सार-असार-विचारके बादही किसी कृत्यको किया करता है। यह बात नहीं, कि केवल नैतिक कर्मोंका निर्णय करनेके लियेही सार-असार-विचारकी आवश्यकता होती है। सार-असार-विचार करते समय यही महत्त्वका प्रश्न होता है, कि अंतःकरण कैसा होना चाहिये ? क्योंकि सब लोगोंके अंतःकरण एक समान नहीं गी. र. ३१
४८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र होते । अतएव जबकि यह कह दिया जावे, कि "अंतःकरणमें सदा साम्य-बुद्धि जागृत रहनी चाहिये; " तब फिर यह बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि अधिकांश लोगों या सब प्राणियोंके हितका सार-असार-विचार करो। पश्चिमी पंडितभी अब यह कहने लगे हैं, कि मानव-जातिके प्राणियोंके संबंधमें मनुष्यके जो कुछ कर्तव्य हैं, वे तो हैंही; परंतु मूक जानवरोंके संबंधमेंभी उसके कुछ कर्तव्य हैं, जिनका समावेश कार्य-अकार्य शास्त्रमें किया जाना चाहिये; और यदि इस व्यापक दृष्टिसे देखें तो मालूम होगा, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक हित" की अपेक्षा 'सर्वभूतहित' शब्दही अधिक व्यापक और उपयुक्त है; तथा 'साम्य-बुद्धि'में इन सभीका समावेश हो जाता है। इसके विपरीत यदि ऐसा मान लें, कि किसीकी बुद्धि शुद्ध और सम नहीं है; तो वह इस बातका ठीक ठीक हिसाब भलेही कर ले, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" किसमें है; परंतु नीति-धर्मकी ओर उसकी प्रवृत्ति होना संभव नहीं है। क्योंकि किसी सत्कार्यकी ओर प्रवृत्ति होना शुद्ध मनका गुण या धर्म है; हिसाबी मनका नहीं। यदि कोई कहे, कि "हिसाब करनेवाले मनुष्यके स्वभाव या मनको देखनेकी तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है, तुम्हें केवल यही देखना चाहिये, कि उसका किया हुआ हिसाब सही है या नहीं; और उस हिसाबसे कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय हो कर तुम्हारा काम चल जाता है या नहीं" - तो वहभी सच नहीं हो सकता। कारण यह है, कि सामान्यतः यह तो सभी जानते हैं कि सुखःदुःख किसे कहते हैं, तोभी सब प्रकारके सुखदुःखोंके तारतम्यका हिसाब करते समय पहले यह निश्चय कर लेना पड़ता है, कि किस प्रकारके सुखदुःखोंको कितना महत्व देना चाहिये। परंतु सुखदुःखोंकी इस प्रकार माप करनेके लिये उष्णतामापक यंत्रके समान कोई निश्चित बाह्य साधन न तो वर्तमान समयमें है; और न भविष्यमेंभी उसके मिल सकनेकी कुछ संभावना है। इसलिये सुखदुःखोंकी ठीक ठीक कीमत ठहरानेका काम याने उनके महत्त्व या योग्यताका निर्णय करनेका काम, प्रत्येक मनुष्यको अपने मनमेंही करना पड़ेगा। परंतु जिसके मनमें ऐसी आत्मौपम्य-बुद्धि पूर्ण रीतिसे जागृत नहीं हुई है, कि "जैसा मैं हूँ, वैसाही दूसराभी है;" उसे दूसरोंके सुखदुःखोंकी तीव्रताका स्पष्ट ज्ञान कभी नहीं हो सकता, इसलिये वह इन सुखदुःखोंकी सच्ची योग्यता कभी जानही नहीं सकेगा, और फिर तारतम्य-निर्णय करनेके लिये उसने सुखदुःखोंकी जो कीमत पहले ठहरा ली होगी, उसमें भूल हो जायगी; और अंतमें उनका किया सब हिसाबभी गलत हो जायगा। इसीलिये कहना पड़ता है, कि "अधिकांश लोगोंके अधिक सुखको देखना" इस वाक्यकी 'देखना' इस हिसाबी बाह्य क्रियाको अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये; किंतु जिस आत्मौपम्य और निर्लोभ बुद्धिसे (अनेक) दूसरोंके सुखदुःखोंकी यथार्थ कीमत पहले ठहराई जाती है, वह सब प्राणियोंके विषयमें साम्यावस्थाको पहुँची हुई, शुद्ध-बुद्धिही नीतिमत्ताकी सच्ची जड़ है। स्मरण रहे, कि नीतिमत्ता निर्मम, शुद्ध, प्रेमी, सम या ( संक्षेपमें कहें तो )
उपसंहार ४८३ सत्त्वशील अंतःकरणका धर्म है; वह केवल सार-असार-विचारका फल नहीं है। यह सिद्धान्त इस कथासे औरभी स्पष्ट हो जायगा। भारतीय युद्धके बाद युद्धिष्ठिरके राज्यासीन होनेपर जब कुंती अपने पुत्रोंके पराक्रममे कृतार्थ हो चुकी, और धृत- राष्ट्रके साथ वानप्रस्थाश्रमका आचरण करनेके लिये बनको जाने लगी, तब “तू अधिकांश लोगोंका कल्याण किया कर।” इत्यादि व्यर्थ बातें न कर उसने युधिष्ठिरसे सिर्फ़ यही कहा है, कि “मनस्ते महदस्तु च” (महा. अश्व. १७. २१)—“तू अपने मनको हमेशा विशाल बनाये रख।” जिन पश्चिमी पंडितोंने यह प्रतिपादन किया है, कि केवल “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है” यह देखनाही नीति- मत्ताकी सच्ची शास्त्रीय और सीधी कसौटी है। वे कदाचित् पहलेहीसे यह मान लेते हैं, कि उनके समानही अन्य सब लोग शुद्ध मनके हैं, और ऐसा समझकर वे अन्य सब लोगोंको यह बतलाते हैं, कि नीतिका निर्णय किस रीतिसे किया जावे। परंतु ये पंडित जिस बातको पहलेहीसे मान लेते हैं, वह सच नहीं हो सकती, इसलिये नीति- निर्णयका उनका नियम अपूर्ण और एकपक्षीय सिद्ध होता है। इतनाही नहीं; बल्कि उनके लेखोसे यह भ्रमकारक विचारभी उत्पन्न हो जाता है, कि मन, स्वभाव या शीलको यथार्थमें अधिकाधिक शुद्ध और पापभीरु बनानेका प्रयत्न करनेके बदले, यदि कोई नीतिमान् बननेके लिये अपने कर्मोंके बाह्य परिणामोंका हिसाब करना सीख ले, तो बस होगा; और फिर जिनकी स्वार्थ-बुद्धि नहीं छूटी हो, वे लोग धूर्त, मिथ्याचारी या ढोंगी (गीता ३. ६) बनकर सारे समाजकी हानिका कारण हो जाते हैं। इसलिये केवल नीतिमत्ताकी कसौटीकी दृष्टिसे देखें, तोभी कर्मोंके केवल बाह्य परिणामोंपर विचार करनेवाला मार्ग कृपण तथा अपूर्ण प्रतीत होता है। अतः हमारे निश्चयके अनुसार गीताका यही सिद्धान्त पश्चिमी आधिदैविक अथवा आधिभौतिक पक्षोंके मतोंकी अपेक्षा अधिक मार्मिक, व्यापक, युक्तिसंगत और निर्दोष है, कि बाह्य कर्मोंसे व्यक्त होनेवाली और संकटके समयमेंभी दृढ़ रहनेवाली साम्य-बुद्धिकाही सहारा इस काममें अर्थात् कर्मयोगमें लेना चाहिये; तथा, ज्ञानयुक्त निस्सीम शुद्ध-बुद्धि या शीलही सदाचरणकी सच्ची कसौटी है। नीतिशास्त्रसंबंधी आधिभौतिक और आधिदैविक ग्रंथोंको छोड़कर नीतिका विचार आध्यात्मिक-दृष्टिसे करनेवाले पश्चिमी पंडितोंके ग्रंथोंको यदि देखें, तो मालूम होगा, कि उनमेंभी नीतिमत्ताका निर्णय करनेके विषयमें गीताकेही सदृश कर्मकी अपेक्षा शुद्ध-बुद्धिकोही विशेष प्रधानता दी गई है। उदाहरणार्थ, प्रसिद्ध जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटेके “नीतिके आध्यात्मिक मूल तत्त्व” तथा नीतिशास्त्रसंबंधी दूसरे ग्रंथोंको लीजिये। यद्यपि कांटने* सर्वभूतात्मैक्यका सिद्धान्त अपने ग्रंथोंमें
- Kant's Theory of Ethics, trans. by Abbott. 6th Ed. इस पुस्तक- में ये सब सिद्धान्त दिये गये हैं। पहला सिद्धान्त १०, १२. १६ और २४ वें पृष्ठमें; दूसरा ११२ और ११७ वें पृष्ठमें; तीसरा ३१, ५८, १२१ और २९० वें पृष्ठमें;
४८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
नहीं दिया है, तथापि व्यवसायात्मक और वासनात्मक बुद्धिका ही मुख्य विचार करके उसने यह निश्चित किया है, कि ( १ ) किसी कर्मकी नैतिक योग्यता इस बाह्य फलपरसे नही ठहराई जानी चाहिये, कि उस कर्मद्वारा कितने मनुष्योंको सुख होगा, बल्कि उसको योग्यताका निर्णय यही देखकर करना चाहिये, कि कर्म करने- वाले मनुष्यको 'वासना' कहां तक शुद्ध है। ( २ ) मनुष्यकी इस वासनाको ( अर्थात् वासनात्मक बुद्धि ) तभी शुद्ध, पवित्र और स्वतंत्र समझना चाहिये, जब कि वह इंद्रियसुखोंमें लिप्त न रहकर सदैव शुद्ध ( व्यवसायात्मक ) बुद्धिकी आज्ञाके ( इस बुद्धि-द्वारा निश्चित कर्तव्य-अकर्तव्यके नियमोंके ) अनुसार चलने लगे। ( ३ ) इस प्रकार इंद्रियनिग्रह हो जाने पर जिसकी वासना शुद्ध हो गई हो, उस पुरुषके लिये किसी नीति-नियमादिके बंधनकी आवश्यकता नहीं रह जानी. ये नियम तो सामान्य मनुष्योंकेही लिये हैं। ( ४ ) इस प्रकारसे वासनाके शुद्ध हो जानेपर जो कुछ कर्म करनेको वह शुद्ध-वासना या बुद्धि कहा करती है, वह इसी विचारसे कहा जाता है कि " हमारे समानही यदि दूसरेभी करने लगें, तो परिणाम क्या होगा "; और ( ५ ) वासनाकी इस स्वतंत्रता और शुद्धताकी उपपत्तिका पता कर्म-सृष्टिको छोड़कर ब्रह्म-सृष्टिमें प्रवेश किये बिना नहीं चल सकता ! परंतु आत्मा और ब्रह्म- सृष्टिसंबंधी कांटके विचार कुछ अपूर्ण हैं, और ग्रीन यद्यपि कांटकाही अनुयायी है, तथापि उसने अपने 'नीतिशास्त्रके उपोद्घातमें' पहले यह सिद्ध किया है, कि बाह्य-सृष्टिका अर्थात् ब्रह्मांडका जो अगम्य तत्त्व है, वही आत्मस्वरूपसे पिंडमें अर्थात् मनुष्यदेहमें अंशतः प्रादुर्भूत हुआ है। इसके अनंतर उसने यह प्रतिपादन किया है,* कि मनुष्य-शरीरमें एक नित्य और स्वतंत्र तत्त्व है, अर्थात् आत्मा जिसमें यह उत्कट इच्छा होती है, कि सर्व भूतान्तर्गत अपने सामाजिक पूर्णस्वरूपको अवश्य पहुंच जाना चाहिये; और यही इच्छा मनुष्यको सदाचारकी ओर प्रवृत्त किया करती है। इसीमें मनुष्यका नित्य और चिरकालिक कल्याण है; तथा विषयसुख अनित्य है। सारांश यही दीख पड़ता है, यद्यपि कांट और ग्रीन, दोनोंकी दृष्टि आध्यात्मिक है, तथापि ग्रीन व्यवसायात्मका बुद्धिके व्यापारोंमेंही लिपटे नहीं रहा; किंतु उसने कर्म-अकर्म-विवेचनकी तथा वासना-स्वातंत्र्यकी उपपत्तिको पिंड और ब्रह्मांड दोनोंमें एकत्वसे व्यक्त होनेवाले शुद्ध आत्मस्वरूपतक पहुंचा दिया है। कांट और ग्रीन जैसे आध्यात्मिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रज्ञोंके उक्त सिद्धांतोंकी और नीचे लिखे गये गीता-प्रतिपादित कुछ सिद्धांतोंकी तुलना करनेसे दीख पड़ेगा, कि यद्यपि वे दोनों अक्षरशः एक बराबर नहीं हैं, तथापि उनमें कुछ अद्भुत समता चौथा १८, ३८, ५५ और ११९ वें पृष्ठमें और पांचवां ७०-७३ तथा ८० वें पृष्ठमें पाठकोंको मिलेगा।
- Green's Prolegomena to Ethics. §§ 99. 174-179 and 223-2.23.
उपसंहार ४८५ अवश्य है। देखिये, गीताके सिद्धान्त ये हैं- (१) बाह्य कर्मकी अपेक्षा कर्ताकी (वासनात्मक) बुद्धिही श्रेष्ठ है। (२) व्यवसायात्मक बुद्धि आत्मनिष्ठ होकर जब संदेहरहित तथा सम हो जाती है, तब फिर वासनात्मक बुद्धि आपही आप शुद्ध और पवित्र हो जाती है। (३) इस रीतिसे जिसकी बुद्धि सम और स्थिर हो जाती है, वह स्थितप्रज्ञ पुरुष हमेशा विधि और नियमोंसे परे रहा करता है। (४) और उसके आचरण या उसकी आत्मैक्य-बुद्धिसे सिद्ध होनेवाले नीति-नियम सामान्य पुरुषोंके लिये आदर्शके समान पूजनीय तथा प्रमाणभूत हो जाते हैं; और (५) पिंड अर्थात् देहमें तथा ब्रह्मांड अर्थात् सृष्टिमें एकही आत्मस्वरूपी तत्त्व है, देहान्त- गत आत्मा अपने शुद्ध और पूर्णस्वरूपको (मोक्ष) प्राप्त कर लेनेके लिये सदा उत्सुक रहता है, तथा इस शुद्ध-स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर सब प्राणियोंके विषयमें आत्मौपम्य-दृष्टि प्राप्त हो जाती है। परंतु यह बात ध्यान देने योग्य है, कि ब्रह्म, आत्मा, माया, आत्मस्वातंत्र्य, ब्रह्मात्मैक्य, कर्मविपाक इत्यादि विषयोंपर हमारे वेदान्तशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं, वे कांट और ग्रीनके सिद्धान्तोंसेभी बहुत आगे बढ़े हुए तथा अधिक निश्चित हैं; इसलिये उपनिषदन्तर्गत वेदान्तके आधारपर किया हुआ गीताका कर्मयोग-विवेचन आध्यात्मिक दृष्टिसे असंदिग्ध, पूर्ण तथा दोषरहित हुआ है; और आजकलके वेदान्ती जर्मन पंडित प्रोफेसर डायसनने नीति-विवेचनकी इसी पद्धतिको अपने 'अध्यात्मशास्त्रके मूल तत्त्व' नामक ग्रंथमें स्वीकार किया है। डायसन शोपेनहरका अनुयायी है; उसे शोपेनहरका यह सिद्धान्त पूर्णतया मान्य है, कि "संसारका मूल कारण वासनाही है, इसलिये उसका क्षय किये बिना दुःखकी निवृत्तिका होना असंभव है; अतएव वासनाका क्षय करनाही प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है"; और इसी आध्यात्मिक सिद्धान्त-द्वारा आगे नीतिकी उपपत्तिका विवेचन उसने अपने उक्त ग्रंथके तीसरे भागमें स्पष्ट रीतिसे किया है। उसने पहले यह सिद्ध कर दिखलाया है, कि वासनाका क्षय होनेके लिये, या हो जानेपरभी, कर्मोंको छोड़ देनेकी आवश्यकता नहीं है; बल्कि "वासनाका पूरा क्षय हुआ है, कि नहीं" यह बात परोपकारार्थ किये गये निष्काम कर्मसे जैसे प्रकट होती है, वैसे अन्य किसीभी प्रकारसे व्यक्त नहीं होती, अतएव निष्काम कर्म वासना-क्षयकाही लक्षण और फल है। इसके बाद उसने यह प्रतिपादन किया है, कि वासनाकी निष्कामताही सदाचरण और नीतिमत्ताकाभी मूल है; और इसके अंतमें गीताका "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" (गीता ३. १९) यह श्लोक दिया है।* इससे मालूम होता है, कि डायसनको इस उपपत्तिका भान गीतासेही हुआ होगा। जो हो; यह बात कुछ कम गौरवकी नहीं, कि डायसन, ग्रीन, शोपेनहर और कांटके पूर्व - अधिक क्या कहें, आरिस्टॉटलकेभी सैकड़ों वर्ष पूर्वही ये विचार हमारे देशमें प्रचलित हो चुके थे। आजकल बहुतेरे लोगोंकी यह समझ हो रही है, कि वेदान्त केवल एक ऐसा बखेड़ा है, जो हमें इस संसारको छोड़ देने और मोक्षकी प्राप्ति करनेका उपदेश देता है, परंतु
'४८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह समझ ठीक नहीं। संसारमें जो कुछ आँखोंसे दीख रहा है, उसके परे जाकर इन गहन प्रश्नोंका यथाशक्ति शास्त्रीय रीतिसे विचार करनेके लियेही वेदान्तशास्त्र प्रवृत्त हुआ है, कि "मै कौन हूँ ? इस सृष्टिकी जड़में कौनसा तत्त्व है? इस तत्त्वसे मेरा क्या संबंध है ? इस संबंधपर ध्यान दे कर इस संसारमें मेरा परम साध्य या अंतिम ध्येय क्या है ? इस साध्य या ध्येयको प्राप्त करनेके लिये मुझे जीवनयात्राके किस मार्गको स्वीकार करना चाहिये, अथवा किस मार्गसे कौनसा ध्येय सिद्ध होगा?" बल्कि निष्पक्ष-दृष्टिसे देखा जाय तो यह मालूम होगा, कि समस्त नीतिशास्त्र अर्थात् मनुष्योंके पारस्परिक व्यवहारका विचार उस गहन शास्त्रकाही एक अंग है। सारांश यह है, कि कर्मयोगकी उपपत्ति वेदान्तशास्त्रहीके आधारपर की जा सकती है, और अब संन्यास-मार्गीय लोग चाहे कुछभी कहें, परंतु इसमें संदेह नहीं, कि गणितशास्त्रके जैसे - शुद्ध गणित और व्यावहारिक गणित ये दो भेद हैं, उसी प्रकार वेदान्तशास्त्र- केभी दो भेद शुद्ध वेदान्त और नैतिक अथवा व्यावहारिक वेदान्त होते हैं। कांट तो यहाँ तक कहता है, कि मनुष्यके मनमें 'परमेश्वर' ( परमात्मा ), 'अमृतत्व' और ( इच्छा ) 'स्वातंत्य'के संबंधके गूढ़ विचार इन नीति-प्रश्नका विचार करते करतेही उत्पन्न हुए हैं, कि "मैं संसारमें किस तरह बर्ताव करूँ ? या इस संसारमें मेरा सच्चा कर्तव्य क्या है ? " और ऐसे प्रश्नोंके उत्तर न देकर नीतिकी उपपत्ति केवल किसी बाह्य-सुखकी दृष्टिसेही बतलाना मानो मनुष्यके मनकी उस पशुवृत्तिको - जो स्वभावतः विषयसुखमें लिप्त रहा करती है - उत्तेजित करना एवं सच्ची नीतिमत्ताकी जड़परही कुल्हाड़ी चलाना है।* अब इस बातको अलग करके समझानेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि यद्यपि गीताका प्रतिपाद्य विषय कर्मयोगही है, तोभी उसमें शुद्ध वेदान्त क्यों और कैसे आ गया। कांटने इस विषयपर "शुद्ध ( व्यवसा- यात्मक बुद्धिकी मीमांसा " और "व्यावहारिक ( वासनात्मक ) बुद्धिकी मीमांसा " नामक दो अलग अलग ग्रंथ लिखे हैं। परंतु हमारे औपनिषदिक तत्त्वज्ञानके अनुसार भगवद्गीतामें इन दोनों विषयोंका समावेश किया गया है; बल्कि श्रद्धा-मूलक भक्ति-मार्गकाभी विवेचन उसीमें होनेके कारण गीता सबसे अधिक ग्राह्य और प्रमाणभूत हो गई है।
- "Empiricism on the contrary, cuts up at the roots the mora- lity of intentions (in which, and not in actions only, consists the high worth that men can and ought to give themselves) ... ... Empiricism, moreover, being on this account allied with all the inclinations which (no matter what fashion they put on) degrade humanity when they are raised to the dignity of a supreme practical principle,...is for that reason much more dangerous." Kant's Theory of Ethics, pp. 163 and 236-238. See also Kant's Critique of Pure Reason, (trans. by Max Muller) 2nd Ed. pp. 640-657.
मोक्ष-धर्मको क्षणभरके लिये एक ओर रखकर केवल कर्म-अकर्मकी परीक्षाके नैतिक तत्त्वकी दृष्टिसेभी जब 'साम्य-बुद्धि'ही श्रेष्ठ सिद्ध होती है; तब यहाँपर इस बातकाभी थोड़ा-सा विचार कर लेना चाहिये, कि गीताके आध्यात्मिक पक्षको छोड़कर नीतिशास्त्रोंमें अन्य पंथ कैसे और क्यों निर्माण हुए ? डाक्टर पाल कारस* नामक एक प्रसिद्ध अमेरिकन ग्रंथकार अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमे इस प्रश्नका यह उत्तर देता है, कि “पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमे मनुष्यकी जैसी समझ (राय) होती है, उसके अनुसार नीतिशास्त्रके मूल तत्त्वोंके संबंधमें उसके विचा- रोंका रंग बदलता रहता है। सच पूछो तो, पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें कुछ-न- कुछ निश्चित मत हुए बिना नैतिक प्रश्नही उपस्थित नहीं हो सकता। पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें कुछ पक्का मत न रहनेपरभी हम लोगोंसे कुछ नैतिक आचरण कदाचित् हो सकता है, परंतु यह आचरण स्वप्नावस्थाके व्यापारके समान होगा; इसलिये इसे नैतिक कहनेके बदले देहधर्मानुसार होनेवाली केवल एक कायिक क्रियाही कहना चाहिये।” उदाहरणार्थ, वाघिन अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये प्राण देनेको तैयार हो जाती है; परंतु इसे हम उसका नैतिक आचरण न कहकर उसका जन्मसिद्ध स्वभावही कहते हैं। इस उत्तरसे इस बातका अच्छी तरह स्पष्टीकरण हो जाता है, कि नीतिशास्त्रके उपपादनमें अनेक पंथ क्यों हो गये हैं। इसमें कुछ संदेह नहीं, कि “मैं कौन हूँ, यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ, मेरा इस संसारमे क्या उपयोग हो सकता है?” इत्यादि गूढ़ प्रश्नोंका निर्णय जिस तत्त्वसे हो सकेगा, उसी तत्त्वके अनुसार प्रत्येक विचारवान् पुरुष अंतमें इस बातकाभी निर्णय अवश्य करेगा, कि मुझे अपने जीवन-कालमें अन्य लोगोंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये। परंतु इन गूढ़ प्रश्नोंका उत्तर भिन्न भिन्न कालमें तथा भिन्न भिन्न देशोंमें एकही प्रकारका नहीं हो सकता। युरोप खंडमें प्रचलित इसाई धर्ममें यह वर्णन पाया जाता है, कि मनुष्य और सृष्टिका कर्ता बाइबलमें वर्णित सगुण परमेश्वर है; और उसीने पहले पहल संसारको उत्पन्न करके सदाचरणके नियम या आज्ञाएँ मनुष्योंको बता दी हैं; तथा आरंभमें ईसाई पंडितोंकाभी यही अभिप्राय था, कि बाइबलमें वर्णित पिंड-ब्रह्मांडकी इस कल्पनाके अनुसार बाइबलमें कहे गये नीतिनियमही नीतिशास्त्रके मूल तत्त्व हैं। फिर जब यह मालूम होने लगा, कि ये नियम व्यावहारिक दृष्टिसे अपूर्ण हैं, तब
- See The Ethical Problem by Dr. Carus, 2nd Ed. p. lli. “Our proposition is that the leading principle in ethics must be derived from the Philosophical view back of it. The world-con- ception a man has, can alone give character to the principle in his ethics. Without any world-conception we can have no ethics (i. e ethics in the highest sense of the word). We may act morally like dreamers or somnambulists, but our ethics would in the case be a mere moral instinct without any rational insight into its raison d'etere.
[Page-header] ४८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इनकी पूर्ति करनेके लिये अथवा स्पष्टीकरणार्थ यह प्रतिपादन किया जाने लगा, कि परमेश्वरहीने मनुष्यको सदसद्विवेकशक्ति दी है। परंतु अनुभवसे फिर यह अड़चन दीख पड़ने लगी, कि चोर और साह दोनोंकी सदसद्विवेकशक्ति एक समान नहीं रहती; तब इस मतका प्रचार होने लगा, कि परमेश्वरकी इच्छा नीतिशास्त्रकी नींव भलेही हो, परंतु उस ईश्वरी इच्छाके स्वरूपको जाननेके लिये केवल इसी बातका विचार करना चाहिये, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है — इसके सिवा परमेश्वरकी इच्छाको जाननेका अन्य कोई मार्ग नहीं है। पिंड-ब्रह्मांडकी रचना संबंधमें ईसाई लोगोंकी जो यह समझ है — कि बाइबलमें वर्णित सगुण परमेश्वरही संसारका कर्ता है; और यह उसकीही इच्छा या आज्ञा है, कि मनुष्य नीतिके नियमानुसार बर्ताव करे — उसी आधारपर उक्त सब मत प्रचलित हुए हैं। परंतु आधिभौतिक शास्त्रोंकी उन्नति तथा वृद्धि होनेपर जब मालूम होने लगा, कि ईसाई धर्म-पुस्तकोंमें पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके विषयमें कहे गये सिद्धान्त ठीक नहीं हैं, तब यह विचार एक ओर रखा गया, कि परमेश्वरके समान कोई सृष्टिका कर्ता है या नहीं; और यही विचार किया जाने लगा, कि नीतिशास्त्रकी इमारत प्रत्यक्ष दिखनेवाली बातोंकी नींव पर क्योंकर खड़ी की जा सकती है। तबसे फिर यह प्रति- पादन किया जाने लगा, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख या कल्याण, अथवा मनुष्यत्वकी वृद्धि, येही दृश्य-तत्त्वके नीतिशास्त्रके मूल कारण हैं। इस प्रतिपादनमें इस बातकी किसी उपपत्ति या कारण का कोई उल्लेख नहीं किया गया है, कि कोई मनुष्य अधिकांश लोगोंका अधिक हित क्यों करे ? सिर्फ़ इतनाही कह दिया जाता है, कि यह मनुष्यकी नित्य बढ़नेवाली एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। परंतु मनुष्यस्वभावमें स्वार्थ सरीखी औरभी दूसरी वृत्तियाँ दीख पड़ती हैं, इसलिये इस पंथमेंभी फिर मत- भेद होने लगे। नीतिमत्ताकी ये सब उपपत्तियाँ कुछ सर्वथा निर्दोष नहीं हैं। परंतु उक्त पंथके सभी पंडितोंमें "सृष्टिके दृश्य पदार्थोंसे परे सृष्टिकी जड़में कुछ-न-कुछ अव्यक्त तत्त्व अवश्य है", इस सिद्धान्तपर एकही-सा अविश्वास और अश्रद्धा है, इस कारण उनके विषय-प्रतिपादनमें चाहे कुछ अड़चनभी क्यों न हो; तोभी वे लोग केवल बाह्य और दृश्य तत्त्वोंसेही किसी तरह निर्वाह कर लेनेका हमेशा प्रयत्न किया करते हैं। नीति तो सभीको चाहिये; परंतु उक्त कथनसे मालूम हो जायगा, कि पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें भिन्न भिन्न मत होनेके कारण उन लोगोंकी नीतिशास्त्रविषयक उपपत्तियोंमें हमेशा कैसे भेद हो जाया करते हैं। इसी कारणसे पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके विषयमें आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक मतोंके अनुसार हमने तीसरे प्रकरणमें नीतिशास्त्रके प्रतिपादनके तीन भेद किये हैं; और आगे फिर प्रत्येक पंथके मुख्य मुख्य सिद्धान्तोंका भिन्न भिन्न विचार किया है। जिनका यह मत है, कि सगुण परमेश्वरने सर्व दृश्य सृष्टिको बनाया है, वे नीतिशास्त्रका केवल यहींतक विचार करते हैं, कि अपने अपने धर्म-ग्रंथोंमे परमेश्वरकी जो आज्ञाएँ
उपसंहार ४८९ हैं वे तथा परमेश्वरकी सत्तासे निर्मित सदसद्विवेचन अथवा शक्तिरूप देवताही सब कुछ हैं — इसके बाद और कुछ नहीं है। इसीको हमने 'आधिदैविक' पंथ कहा है। क्योंकि सगुण परमेश्वरभी तो एक देवताही है न ! अब जिनका यह मत है, कि दृश्य सृष्टिका आदिकारण कोईभी अदृश्य मूल तत्त्व नहीं है; और यदि होभी, तो वह मनुष्यकी बुद्धिके लिये अगम्य है; वे लोग "अधिकांश लोगोंका अधिक कल्याण" या "मनुष्यत्वका परम उत्कर्ष" जैसे केवल दृश्य-तत्त्व द्वाराही नीति- शास्त्रका प्रतिपादन किया करते हैं; और यह मानते हैं, कि इस बाह्य और दृश्य तत्त्वके परे विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस पंथको हमने 'आधि- भौतिक' नाम दिया है। जिनका यह सिद्धान्त है, कि नामरूपात्मक दृश्य सृष्टिकी जड़में आत्मा सरीखा कुछ-न-कुछ नित्य और अव्यक्त तत्त्व अवश्य है, वे लोग अपने अपने नीतिशास्त्रकी उपपत्तिको आधिभौतिक उपपत्तिसेभी परे ले जाते हैं, और आत्मज्ञान तथा नीति या धर्मका मेल करके इस बातका निर्णय करते हैं, कि संसारमें मनुष्यका सच्चा कर्तव्य क्या है ? इस पंथको हमने 'आध्यात्मिक' कहा है। इन तीनों पंथोंमें आचार नीति एकही है; परंतु पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें प्रत्येक पंथका मत भिन्न भिन्न है, जिससे नीतिशास्त्रके मूल-तत्त्वोंका स्वरूप हर एक पंथमें थोड़ा बदलता गया है। यह बात प्रकट है, कि व्याकरणशास्त्र कोई नई भाषा नहीं बनाता; किंतु जो भाषा व्यवहारमें प्रचलित रहती है, उसीके नियमोंकी वह खोज करता है, और भाषाकी उन्नतिमें सहायक होता है; ठीक यही हाल नीतिशास्त्रकाभी है। मनुष्य इस संसारमें जबसे पैदा हुआ है, उसी दिनसे वह स्वयं अपनीही बुद्धिसे अपने आचरणको देशकालानुसार शुद्ध रखनेका प्रयत्नभी करता चला आया है, और समय समय पर जो प्रसिद्ध पुरुष या महात्मा हो गये हैं, उन्होंने अपनी समझके अनुसार आचार-शुद्धिके लिये, 'चोदना' या प्रेरणारूपी अनेक नियमभी बना दिये हैं। नीतिशास्त्रकी उत्पत्ति कुछ इस लिये नहीं हुई है, कि वह इन नियमोंको तोड़ कर नये नियम बनाने लगे। हिंसा मत कर, सच बोल, परोपकार कर, इत्यादि नीतिके नियम प्राचीन कालसेही चलते आये हैं। अब नीतिशास्त्रका सिर्फ यही देखनेका काम है, कि नीतिकी यथोचित वृद्धि होनेके लिये सब नीतिनियमोंमें मूल तत्त्व क्या हैं। यही कारण है, कि जब हम नीतिशास्त्रके किसीभी पंथको देखते हैं, तब हम वर्तमान कालमें प्रचलित नीतिके प्रायः सब नियमोंको सभी पंथोंमें एक-से पाते हैं, उनमें जो कुछ भेद दिखलाई पड़ता है, वह उपपत्तिका स्वरूप-भेदके कारण है, और इसलिये डॉ. पाल कारसका यह कथन सच मालूम होता है, कि इस भेदके होनेका मुख्य कारण यही है, कि हरएक पंथमें पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें भिन्न भिन्न मत हैं। अब यह बात सिद्ध हो गई, कि मिल, स्पेन्सर, कांट आदि आधिभौतिक पंथके आधुनिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथकारोंने आत्मौपम्य-दृष्टिके
४९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुलभ तथा व्यापक तत्त्वको छोड़कर, 'सर्वभूतहित' या “अधिकांश लोगोंका अधिक हित” जैसे आधिभौतिक और बाह्य तत्त्वपरही नीतिमत्ताको स्थापित करनेका जो प्रयत्न किया, वह इसीलिये किया है, कि पिंड-ब्रह्मांडसंबंधी उनके मत प्राचीन मतोंसे भिन्न हैं । परंतु जो लोग उक्त नूतन मतोंको नहीं मानते; और जो इन प्रश्नोंका स्पष्ट तथा गंभीर विचार कर लेना चाहते हैं, कि, “मैं कौन हूँ ? सृष्टि क्या है ? मुझे इस सृष्टिका ज्ञान कैसे होता है ? जो सृष्टि मुझसे बाहर है, वह स्वतंत्र है या नहीं ? यदि है, तो उसका मूल तत्त्व क्या है ? इस तत्त्वसे मेरा क्या संबंध है ? एक मनुष्य दूसरेके सुखके लिये अपनी जान क्यों देवे ?” “जो जन्म लेते हैं, वे मरतेभी हैं” इस नियमके अनुसार यदि यह बात निश्चित है, कि “जिस पृथ्वीपर हम रहते हैं, उसका और उसके साथ समस्त प्राणियोंका किसी दिन अवश्य नाश हो जायगा ; तो नाशवान् भविष्यकी पीढ़ियोंके लिये हम अपने सुखका नाश क्यों करें ?” - अथवा जिन लोगोंका केवल इस उत्तरसे पूरा समाधान नहीं होता हो, कि “परोपकार आदि मनोवृत्तियाँ इस समय कर्ममय, अनित्य और दृश्य-सृष्टिकी नैसर्गिक प्रवृत्तियाँही हैं,” और जो यह जानना चाहते हैं, कि इन नैसर्गिक प्रवृत्तियोंका मूल कारण क्या है - उनके लिये अध्यात्मशास्त्रके नित्य तत्त्वज्ञानका सहारा लेनेके सिवा और कोई दूसरा मार्ग नहीं है; और, इसी कारणसे ग्रीनने अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथका आरंभ इसी तत्त्वके प्रतिपादनसे किया है, कि जिस आत्माको जड़ सृष्टिका ज्ञान होता है, वह आत्मा जड़ सृष्टिसे अवश्यही भिन्न होगा; और कांटने पहले व्यवसायात्मिका बुद्धिका विवेचन करके फिर वासनात्मक बुद्धिकी तथा नीतिशास्त्रकी मीमांसा की है । “मनुष्य अपने सुखके लियेही या अधिकांश लोगोंको सुख देनेके लियेही पैदा हुआ है” - यह कथन ऊपरसे चाहे कितनाही मोहक तथा उत्तम दिखे, परंतु वस्तुतः यह सच नहीं है । यदि हम क्षणभर इस बातका विचार करें, कि जो महात्मा केवल सत्यके लिये प्राण-दान करनेको तैयार रहते हैं, उनके मनमें क्या यही हेतु रहता है, कि भविष्यकी पीढ़ीके लोगोंको अधिकाधिक विषय-सुख प्राप्त होवें, तो यही कहना पड़ता है, कि अपने तथा अन्य लोगोंके अनित्य आधिभौतिक सुखोंकी अपेक्षा इस संसारमें मनुष्यका औरभी कुछ दूसरा अधिक महत्त्वका परम साध्य या उद्देश्य अवश्य है । यह उद्देश्य क्या है ? जिन्होंने पिंड-ब्रह्मांडके नामरूपात्मक, अतएव नाशवान्, परंतु दृश्य स्वरूपसे आच्छादित आत्मस्वरूपी नित्य तत्त्वको अपनी आत्मप्रतीतिके द्वारा जान लिया है, वे लोग उक्त प्रश्नका यह उत्तर देते हैं कि अपने आत्माके अमर, श्रेष्ठ, शुद्ध, नित्य तथा सर्वव्यापी स्वरूपकी पहचान करके उसीमें रत रहनाही ज्ञानवान् मनुष्यका इस नाशवान् संसारमें पहला कर्तव्य है । जिसे सर्वभूतान्तर्गत आत्मैक्यकी इस तरहसे पहचान हो जाती है, तथा यह ज्ञान जिसकी देह तथा इंद्रियोंमें समा जाता है, वह पुरुष इस बातके सोचमें पड़ा नहीं रहता, कि यह संसार झूठ है या सच, किंतु वह सर्वभूतहितके लिये उद्योग करनेमें
आप-ही-आप प्रवृत्त हो जाता है; और सत्य मार्गका अग्रेसर बन जाता है। क्योंकि उसे यह पूरी तौरसे मालूम रहता है, कि अविनाशी तथा त्रिकालाबाधित सत्य कौन-सा है। मनुष्यकी यह आध्यात्मिक पूर्णावस्थाही सब नीति-नियमोंका मूल उद्गमस्थान है, और इसेही वेदान्तमें 'मोक्ष' कहते हैं। किसीभी नीतिको लीजिये; वह इस अंतिम साध्यसे अलग नहीं हो सकती, इसलिये नीतिशास्त्रका या कर्मयोगशास्त्रका विवेचन करते समय आखिर इसी तत्त्वकी शरणमें जाना पड़ता है। सर्वात्मैक्यरूप अव्यक्त मूल तत्त्वकाही एक व्यक्त स्वरूप सर्वभूतहितेच्छा है; और सगुण परमेश्वर तथा दृश्य सृष्टि दोनों उस आत्माकेही व्यक्त स्वरूप हैं, जो सर्वभूतांतर्गत, सर्वव्यापी और अव्यक्त है; और इस व्यक्त स्वरूपके आगे परे जाकर अव्यक्त आत्माका ज्ञान प्राप्त किये बिना, ज्ञानकी पूर्ति तो होतीही नहीं, किंतु इस संसारमें हर एक मनुष्यका जो यह परम कर्तव्य है, कि शरीरस्थ आत्माको पूर्णावस्थामें पहुँचा दे; वहभी इस ज्ञानके बिना सिद्ध नहीं हो सकता। चाहे नीतिको लीजिये, व्यवहारको लीजिये, धर्मको लीजिये अथवा किसीभी दूसरे शास्त्रको लीजिये; अध्यात्मज्ञानही सबकी अंतिम गति है—"सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।" हमारा भक्ति-मार्गभी इसी तत्त्वज्ञानका अनुसरण करता है, इसलिये उसमेंभी यही सिद्धान्त स्थिर रहता है, कि ज्ञान-दृष्टिसे निष्पन्न होनेवाला साम्य-बुद्धिरूपी तत्त्वही मोक्षका तथा सदाचरणका मूल स्थान है। वेदान्तशास्त्रसे सिद्ध होनेवाले उक्त तत्त्वपर एकही महत्त्वपूर्ण आक्षेप किया जा सकता है, कि कुछ वेदान्ती ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर सब कर्मोंका संन्यास कर देना उचित मानते हैं, इसीलिये यह दिखला कर—कि ज्ञान और कर्ममें विरोध नहीं है, गीतामें कर्मयोगके इस सिद्धान्तका विस्तारसहित वर्णन किया गया है, कि वासनाका क्षय होनेपरभी ज्ञानी पुरुष अपने सब कर्मोंको परमेश्वरार्पणपूर्वक-बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये केवल कर्तव्य समझ करही करता चला जावे। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये यह उपदेश अवश्य दिया गया है, कि तू परमेश्वरको सब कर्म समर्पण करके युद्ध कर; परंतु यह उपदेश केवल तत्कालीन प्रसंगको देखकरही किया है (गीता ८.७)। उक्त उपदेशका भावार्थ यही मालूम होता है, कि अर्जुनके समानही किसान, सुनार, लोहार, बढ़ई, बनिया, ब्राह्मण, व्यापारी, लेखक उद्यमी इत्यादि सभी लोग अपने अपने अधिकारानुरूप अपने व्यवहारोंको परमेश्व- रार्पण-बुद्धिसे करते हुए संसारका धारण-पोषण करते रहें; जिसे जो रोजगार निसर्गतः प्राप्त हुआ है, उसे यदि वह निष्काम बुद्धिसे करता रहे, तो कर्ताको कुछभी पाप नहीं लगेगा, सब कर्म एकहीसे हैं; दोष केवल कर्ताकी बुद्धिमें है, न कि उसके कर्मोंमें, अतएव बुद्धिको सम करके यदि सब कर्म किये जायँ, तो परमेश्वरकी उपासना हो जाती है, पाप नहीं लगता; और अंतमें सिद्धिभी मिल जाती है। परंतु जिन (विशेषतः अर्वाचीन कालके) लोगोंका यह दृढ़-संकल्प-सा हो गया है, कि चाहे कुछभी हो जाय, इस नाशवान् दृश्य-सृष्टिके आगे बढ़कर आत्म-अनात्म-विचारके
४९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गहरे पानीमें पैठना ठीक नहीं है; वे अपने नीतिशास्त्रका विवेचन, ब्रह्मात्मैक्यरूप परम साध्यकी उच्च श्रेणीको छोड़ कर, मानव-जातिका कल्याण या सर्वभूतहित जैसे निम्न कोटिके आधिभौतिक दृश्य परंतु अनित्य, तत्त्वसेही शुरू किया करते हैं। स्मरण रहे, कि किसी पेड़की चोटीको तोड़ देनेसेही वह नया पेड़ नहीं कहलाता; उसी तरह आधिभौतिक पंडितोंका निर्माण किया हुआ नीतिशास्त्र भोंडा या अपूर्ण भले ही हो; परंतु वह नया नहीं हो सकता। ब्रह्मात्मैक्यको न मानकर प्रत्येक पुरुषको स्वतंत्र माननेवाले हमारे यहाँके सांख्य-शास्त्रज्ञ पंडितोंनेभी, यही देख कर, कि दृश्य-जगतका धारण-पोषण और विनाश किन गुणोंके द्वारा होता है; सत्त्व-रज- तम तीनों गुणोंके लक्षण निश्चित किये हैं; और फिर प्रतिपादन किया हैं, कि इनमेंसे सात्त्विक सद्गुणोंका परम उत्कर्ष करनाही मनुष्यका कर्तव्य है, तथा मनुष्यको इसीसे अंतमें त्रिगुणातीत अवस्था मिलकर मोक्षकी प्राप्ति होती है। भगवद्गीताके सत्रहवें तथा अठारहवें अध्यायोंमें थोड़े भेदके साथ इसीका वर्णन है। * सच देखा जाय, तो क्या सात्त्विक सद्गुणोंका परम उत्कर्ष, और आधिभौतिकवादके अनुसार क्या परोपकार-बुद्धिकी अथवा मनुष्यत्वकी वृद्धि, दोनोंका अर्थ एक-ही है। महाभारत और गीतामें इन सब अधिभौतिक तत्त्वोंका स्पष्ट उल्लेख तो है ही; बल्कि महा- भारतमें यहभी साफ़ साफ़ कहा गया है, कि धर्म-अधर्मके नियमोंके लौकिक या बाह्य उपयोगका विचार करनेपर यही जान पड़ता है, कि ये नीति-धर्म सर्वभूतहितार्थ अर्थात् लोककल्याणार्थ ही हैं। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक पंडितोंका किसीभी अव्यक्त तत्त्वपर विश्वास नहीं है, इसलिये यद्यपि वे जानते हैं, कि तात्त्विक दृष्टिसे कार्य- अकार्यका निर्णय करनेके लिये आधिभौतिक तत्त्व पूरा काम नहीं देते; तोभी वे निरर्थक शब्दोंका आडंबर बढ़ाकर व्यक्त तत्त्वसेही अपना निर्वाह किसी तरह कर लिया करते हैं। गीतामें ऐसा नहीं किया गया है, किंतु इन तत्त्वोंकी परंपराको पिंड- ब्रह्मांडके मूल अव्यक्त तथा नित्य-तत्त्वतक ले जाकर मोक्ष, नीतिधर्म और व्यवहार इन तीनोंकीभी पूरी एकवाक्यता तत्त्वज्ञानके आधारसे गीतामें भगवानने सिद्ध कर दिखाई है; और इसलिये अनुगीताके आरंभमें स्पष्ट कहा गया है, कि कार्य-अकार्य निर्णयार्थ जो धर्म बतलाया गया है, वही मोक्ष-प्राप्ति करा देनेके लियेभी समर्थ है (मभा. अश्व. १६. १२)। जिनका यह मत होगा कि, मोक्षधर्म और नीति- शास्त्रको अथवा अध्यात्मशास्त्र और नीतिको एकमें मिला देनेकी आवश्यकता नहीं है, उन्हें उक्त उपपादनका महत्त्वही मालूम नहीं हो सकता। परंतु जो लोग इसके संबंधमें उदासीन नहीं हैं, उन्हे निस्संदेह यह मालूम हो जायगा, कि गीतामें किया गया कर्मयोगका प्रतिपादन आधिभौतिक विवेचनकी अपेक्षा श्रेष्ठ तथा ग्राह्य है।
- बाबू किशोरीलाल सरकार, एम्. ए., बी. एल्. ने The Hindu System of Moral Science नामक जो एक छोटासा-ग्रंथ लिखा है, वह इसी ढंगका है; अर्थात् उसमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुणोंके आधारपर विवेचन किया गया है।
उपसंहार ४९३ अध्यात्मज्ञानकी वृद्धि प्राचीन कालमें हिंदुस्थानमें जैसी हो चुकी है, वैसी और कहींभी नहीं हुई, इसलिये किसी अन्य देशमें, कर्मयोगके ऐसे आध्यात्मिक उपपादनका पहले पाया जाना बिलकुल संभव नहीं था - और, यह विदितही है, कि ऐसा उपपादन कहीं पायाभी नहीं जाता। यह स्वीकार होनेपर भी - कि इस संसारके अशाश्वत होनेके कारण इसमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है (गीता ९. ३३) - गीतामें जो यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है, कि "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" - सांसारिक कर्मोंका कभी न कभी संन्यास करनेकी अपेक्षा उन्हीं कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे लोककल्याणके लिये करते रहना अधिक श्रेयस्कर है (गीता ३. ८; ५. २), उसके साधक तथा बाधक कारणोंका विचार ग्यारहवें प्रकरणमें किया जा चुका है। परंतु गीता इस कर्मयोगकी पश्चिमी कर्म-मार्गसे अथवा हमारे यहाँके संन्यास-मार्गकी पश्चिमी कर्मत्याग-पक्षसे, तुलना करते समय उक्त सिद्धान्तका कुछ अधिक स्पष्टीकरण करना आवश्यक मालूम होता है। यह मत वैदिक धर्ममें पहले पहल उपनिषत्कारों तथा सांख्यवादियों- द्वारा प्रचलित किया गया है, कि दुःखमय तथा निस्सार संसारसे बिना निवृत्त हुए मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इसके पूर्वका वैदिक धर्म प्रवृत्ति-प्रधान अर्थात् कर्म- काण्डात्मकही था, परंतु यदि वैदिक धर्मको छोड़ अन्य धर्मोंका विचार किया जाय, तो यह मालूम होगा, कि उनमेंसे बहुतोंने आरंभसेही संन्यास-मार्गको स्वीकार कर लिया था। उदाहरणार्थ, जैन और बौद्ध धर्म पहलेहीसे निवृत्ति-प्रधान हैं; और ईसामसीहकाभी वैसाही उपदेश है। बुद्धने अपने शिष्योंको यदि अंतिम उपदेश दिया है, कि "संसारका त्याग करके यति-धर्ममें रहना चाहिये, स्त्रियोंकी ओर देखना नहीं चाहिये; और उनसे बातचीतभी नहीं करना चाहिये" (महापरि- निव्वाण सुत्त ५. २३); ठीक इसी तरह मूल ईसाई धर्मकाभी कथन है। ईसाने कहा है, कि "तू अपने पड़ोसीको अपनेही समान प्यार कर" (मेथ्यू १९. १९); और, पालकाभी कथन है, कि "तू जो कुछ खाता, पीता या करता है, वह सब ईश्वरके लिये कर" (१ कारि. १०. ३१); और ये दोनों उपदेश ठीक उसी तरहके हैं, जैसे कि गीतामें आत्मौपम्य-बुद्धिसे ईश्वरार्पणपूर्वक कर्म करनेको कहा गया है (गीता ६. २९; ९. २७)। परंतु केवल इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं होता, कि ईसाई धर्म गीता-धर्मके समान प्रवृत्ति-प्रधान है। क्योंकि ईसाई धर्ममेंभी अंतिम साध्य यही है, कि मनुष्यको अमृतत्व मिले तथा वह मुक्त हो जावे; और उसमें यहभी प्रतिपादन किया गया है, कि यह स्थिति घरद्वार त्यागे बिना प्राप्त नहीं हो सकती, अतएव ईसा मसीहके मूल धर्मको संन्यास-प्रधानही कहना चाहिये। स्वयं ईसा मसीह अंततक अविवाहित रहे। जब एक समय एक आदमीने उनसे प्रश्न किया, कि "माँ-बाप तथा पड़ोसियोंको प्यार करनेके धर्मका मैं अबतक पालन करता चला आया हूँ, अब मुझे यह बतलाओ, कि अमृतत्व मिलनेमें क्या कसर है?" तब ईसाने साफ़ उत्तर
४९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
दिया है कि, "तू अपने घरद्वारको बेच दे या किसी गरीबको डाल दे; और मेरा भक्त बन" (मेथ्यू. १९. १६-३०; मार्क १९. २१-३१); और वे तुरंत अपने शिष्योंकी ओर देख उनसे कहने लगे, कि सुईके छेदसे ऊँट भलेही निकल जाय, परंतु ईश्वरके राज्यमें किसी धनवानका प्रवेश होना कठिन है।" यह कहनेमें कोई अतिशयोक्ति नहीं दीख पड़ती, कि यह उपदेश याज्ञवल्क्यके इस उपदेशकी नकल है, कि जो उन्होंने मैत्रेयीको किया था। वह उपदेश यह है - "अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन" (बृ. २. ४. २) - द्रव्यसे अमृतत्व मिलनेकी आशा नहीं है। गीतामें कहा गया है, कि अमृतत्व प्राप्त करनेके लिये सांसारिक कर्मोंको छोड़नेकी आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें निष्काम बुद्धिसे करतेही रहना चाहिये; परंतु ऐसा उपदेश ईसाने कहींभी नहीं किया है। इसके विपरीत उन्होंने यही कहा है, कि सांसारिक संपत्ति और परमेश्वरके बीच चिरस्थायी विरोध है (मेथ्यू. ६. २४), इसलिये "माँ-बाप, घर-द्वार, स्त्री-बच्चे और भाई-बहिन एवं स्वयं अपने जीवनसेभी द्वेष करके जो मनुष्य मेरा अनुयायी नहीं बनता, वह मेरा भक्त कभी हो नहीं सकता" (ल्यूक. १४. २६-३३)। ईसाके शिष्य पालकाभी स्पष्ट उपदेश है, कि "स्त्रियोंको स्पर्शतकभी न करना सर्वोत्तम पक्ष है" (१. कारि. ७. १), इसी प्रकार, हम पहलेही कह चुके हैं, कि ईसाके मुंहसे निकले हुए - "हमारी जन्मदात्री* माता, हमारी कौन होती है? हमारे आसपासके ईश्वरभक्तही हमारे माँ-बाप और बंधु हैं" (मेथ्यू. १२. ४६-५०) - इस वाक्यमें, और "किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोकः" बृहदारण्यकोपनिषदके संन्यासविषयक इस वचनमें (बृ. ४. ४. २२) बहुत कुछ समानता है। स्वयं बाइबलकेही इन वाक्योंसे यह सिद्ध होता है, कि जैन और बौद्ध धर्मोंके सदृशही ईसाई धर्मभी आरंभमें संन्यास-प्रधान अर्थात् संसारको त्याग देनेका उपदेश देनेवाला है, और ईसाई धर्मके इतिहासको देखनेसेभी यही मालूम होता है† कि ईसाके इस उपदेशानुसारही पहले ईसाई धर्मोपदेशक वैराग्यसे रहा करते
- यह तो संन्यास-मार्गियोंका हमेशाहीका उपदेश है। शंकराचार्यका "का ते कान्ता कस्ते पुत्रः" यह श्लोक प्रसिद्धही है; और, अश्वघोषके 'बुद्धचरित' (६.४५) में यह वर्णन पाया है, कि बुद्धके मुखसे "क्वाहं मातुः क्व सा मम" ऐसा उद्गार निकला था। † See Paulen's System of Ethics (Eng. trans.) Book I. Chap. 2 and 3; esp. pp. 89-97. "The new (Christian) converts seemed to renounce their family and country ..... their gloomy and austere aspect, their abhorrence of the common business and pleasures of life, and their frequent predictions of impending calamities inspired the pagans with the apprehension of some danger which would arise from the new sect." Historian's History of the World, Vol. VI, p. 318. जर्मन कवि गटेने अपने Faust (फॉस्ट)
उपसंहार ४९५ थे - “ईसाके भक्तोंको द्रव्य-संचय न करके रहना चाहिये” (मेथ्यू. १० ९-१५)। ईसाई धर्मोपदेशकोंमें तथा ईसाके भक्तोंमें गृहस्थ-धर्मसे संसारमें रहनेकी जो रीति पाई जाती है, वह बहुत दिनोंके बादके सुधारोंका फल है - वह मूल ईसाई धर्मका स्वरूप नहीं है। वर्तमान समयमेंभी शोपेनहर सरीखे विद्वान् यही प्रतिपादित करते हैं, कि संसार दुःखमय होनेके कारण त्याज्य है; और पहले यह बतलाया जा चुका है, कि ग्रीस देशमें प्राचीन कालमें यह प्रश्न उपस्थित हुआ था, कि तत्त्व-विचारमेंही अपने जीवनको व्यतीत कर देना श्रेष्ठ है, या लोकहितके लिये राजकीय मामलोंमें प्रयत्न करते रहना श्रेष्ठ है। सारांश यह है, कि पश्चिमी लोगोंका यह कर्मत्याग-पक्ष और हम लोगोंका संन्यास-मार्ग कई अंशोंमें एकही है; और इन मार्गोंका समर्थन करनेकी पूर्वी और पश्चिमी पद्धतिभी एकही-सी है। परंतु आधुनिक पश्चिमी पंडित कर्मत्यागकी अपेक्षा कर्म-मार्गकी श्रेष्ठताके जो कारण बतलाते हैं, वे गीतामें दिये गये प्रवृत्ति-मार्गके प्रतिपादनसे भिन्न हैं, इसलिये अब इन दोनोंके भेदकोभी यहाँ- पर अवश्य बतलाना चाहिये। पश्चिमी आधिभौतिक कर्म-मार्गियोंका कहना है, कि संसारके सब मनुष्योंका अथवा अधिकांश लोगोंका अधिक सुख - अर्थात् ऐहिक सुख-ही इस जगत्में परम साध्य है, अतएव सब लोगोंके सुखके लिये प्रयत्न करते हुए उसी सुखमें स्वयंभी मग्न हो जाना प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है, और इसकी पुष्टिके लिये उनमेंसे अधिकांश पंडित यह प्रतिपादनभी करते हैं, कि संसारमें दुःखकी अपेक्षा सुखही अधिक है। इस दृष्टिसे देखनेपर यही कहना पड़ता है, कि पश्चिमी कर्म-मार्गीय लोग “सुख-प्राप्तिकी आशासे सांसारिक कर्म करनेवाले” होते हैं; और पश्चिमी कर्मत्यागमार्गीय लोग “संसारसे उबे हुए” होते हैं; तथा कदाचित् इसी कारणसे उनको क्रमानुसार 'आशावादी' और 'निराशावादी' कहते हैं।* परंतु भगवद्गीतामें जिन दो निष्ठाओंका वर्णन है, वे इनसे भिन्न हैं। चाहे स्वयं अपने लिये हो या परोपकारके लिये हो, कुछभी हो; परंतु जो मनुष्य ऐहिक विषयसुख नामक काव्यमें यह लिखा है - “Thou shalt renounce ! That is the eternal song which ring in everyone's ears; which, our whole life-long every hour is hoarsely singing to us. ” ( Faust, Part I, II. 1195- 1198)। मूल इसाई धर्मके संन्यास-प्रधान होनेके विषयमें कितनेही अन्य आधार और प्रमाण दिये जा सकते हैं।
- जेम्स सलीने (James Sulli) अपने Pessimism नामक ग्रंथमें Optimist और Pessimist नामक दो पंथोंका वर्णन किया है। इनमेंसे Optimist का अर्थ 'उत्साही, आनंदित' और Pessimist का अर्थ 'संसारसे त्रस्त' होता है; और हमने पहले एक टिप्पणीमें बतला दिया है, कि ये शब्द गीताके 'योग' और 'सांख्य'के पूर्णरूपसे समानार्थक नहीं हैं (पृष्ठ ३०६)। 'दुःखनिवारणेच्छुक' नामक जो एक तीसरा पंथ है और जिसका वर्णन आगे किया गया है, उसका सलीने Meliorism नाम रखा है।
प्रकरण १०-१२: सिद्ध-अवस्था, भक्तिमार्ग व नीतिशास्त्र
४३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पानेकी लालसासे संसारके कर्मोंमें प्रवृत्त होता है, उसकी साम्य-बुद्धिरूप सात्त्विक वृत्तिमें कुछ-न-कुछ बट्टा अवश्य लग जाता है, इसलिये गीताका यह उपदेश, है, कि संसार दुःखमय हो या सुखमय, सांसारिक कर्म जब छूटतेही नहीं, तब उनके सुखदुःखका विचार करते रहनेमें कुछ लाभ नहीं होगा। चाहे सुख हो या दुःख। परंतु मनुष्यका यही कर्तव्य है, कि वह इस बातमें अपना महद्भाग्य समझे, कि उसे नरदेह प्राप्त हुई है; और कर्म-सृष्टिके इस अपरिहार्य व्यवहारमें जो कुछ प्रसंगानुसार प्राप्त हो, उसे अपने अंतःकरणको निगण न करके इस न्याय् अर्थात् साम्य-बुद्धिमे सहता रहे, कि “दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः” (गीता २. ५६) ; एवं अपने अधिकारानुसार जो कुछ कर्म शास्त्रतः अपने हिस्सेमें आ पड़े, उसे जीवन- पर्यत, और किसीके लिये नहीं; किंतु संसारके धारण-पोषणके लिये, निष्काम बुद्धिसे करना रहे। गीताकालमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था जारी थी, इसीलिये बतलाया गया है, कि ये सामाजिक कर्म चातुर्वर्ण्यके विभागके अनुसार हरएकके हिस्सेमें आ पड़ते हैं और अठारहवें अध्यायमें यहभी बतलाया गया है, कि ये भेद गुणकर्म-विभागसे कैसे निष्पन्न होते हैं ‘( गीता १८. ४१-४४) । परंतु इससे किसीको यह न समझ लेना चाहिये, कि गीताके नीति-तत्त्व चातुर्वर्ण्यरूपी समाजव्यवस्थापरही अवलंबित हैं। यह बात महाभारतकारकेभी ध्यानमें पूर्णतया आ चुकी थी, कि अहिंसादि नीति-धर्मोंकी व्याप्ति केवल चातुर्वर्ण्यके लियेही नहीं है, बल्कि ये धर्म मनुष्यमात्रके लिये एक समान हैं। इसीलिये महाभारतमें स्पष्ट रीतिसे कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्यके बाहर जिन अनार्य लोगोंमें ये धर्म प्रचलित हैं, उन लोगोंकीभी रक्षा राजाको इन सामान्य कर्मोंके अनुसारही करनी चाहिये (शां. ६५. १२-२२)। अर्थात् गीतामेंही कही गई नीतिकी उपपत्ति चातुर्वर्ण्यसरीखी किसी एक विशिष्ट समाजव्यवस्थापर अव- लंबित नहीं है; किंतु सर्वसामान्य आध्यात्मिक ज्ञानके आधारपरही उसका प्रति- पादन किया गया है। गीताके नीति-धर्मका मुख्य तात्पर्य यही है, कि जो कर्तव्य-कर्म शास्त्रतः प्राप्त हो, उसे निष्काम और आत्मौपम्य-बुद्धिसे करना चाहिये; और सब देशोंके लोगोंके लिये यह एकही समान उपयोगी है। परंतु, यद्यपि आत्मौपम्य-दृष्टिका और निष्काम कर्माचरणका यह सामान्य नीति-तत्त्व सिद्ध हो गया, तथापि इस बातकाभी स्पष्ट विचार कर लेना आवश्यक है, कि यह नीति-तत्त्व जिन कर्मोंको उपयोगी होता है, वे कर्म इस समाजमें प्रत्येक व्यक्तिको कैसे प्राप्त होते हैं। इसे बतलानेके लियेही, उस समयमें उपयुक्त होनेवाले महज उदाहरणके नातेसे गीतामें चातुर्वर्ण्यका उल्लेख किया गया है, और, साथ साथ गुणकर्म-विभागके अनुसार उस समाजव्यवस्थाकी संक्षेपमें उपपत्तिभी बतलाई है। परंतु इस बातपरभी ध्यान देना चाहिये, कि वह चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाही कुछ गीताका मुख्य भाग नहीं है। सारे गीताशास्त्रका व्यापक सिद्धान्त यही है, कि यदि कहीं चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रचलित न हो अथवा वह किसी गिरी दशामें हो; तो वहांभी तत्कालीन प्रचलित समाज-
[Header] उपसंहार ४९७
व्यवस्थाके अनुसार समाजके धारण-पोषणके जो काम अपने हिस्सेमें आ पड़े, उन्हें लोकसंग्रहके लिये धैर्य और उत्साहसे तथा निष्काम बुद्धिसे कर्तव्य समझकर करते रहना चाहिये, क्योंकि मनुष्यका जन्म उसी कामके लिये हुआ है; न कि केवल सुखोपभोगके लिये। कुछ लोग गीताके नीतिधर्मको केवल चातुर्वर्ण्य-मूलक समझते हैं; लेकिन उनकी यह समझ ठीक नहीं है। चाहे समाज हिंदुओंका हो या म्लेच्छोंका, चाहे वह प्राचीन हो या अर्वाचीन, चाहे वह पूर्वी हो या पश्चिमी, यदि उस समाजमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रचलित हो, तो उस व्यवस्थाके अनुसार, या दूसरी समाज- व्यवस्था जारी हो, तो उस व्यवस्थाके अनुसार, जो काम अपने हिस्सेमें आ पड़े अथवा जिसे हम अपनी रुचिके अनुसार कर्तव्य समझकर एक बार स्वीकृत कर लें, वही अपना स्वधर्म हो जाता है; और गीता कहती है, कि किसीभी कारणसे इस धर्मको ऐन मौकेपर छोड़ देना और दूसरों कामोंमें लग जाना, धर्मकी तथा सर्वभूतहितकी दृष्टिसे निंदनीय है। यही तात्पर्य "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" (गीता ३. ३५) - अर्थात् स्वधर्मपालनमें यदि मृत्यु हो जाय, तो वहभी श्रेयस्कर है; परंतु दूसरोंका धर्म भयावह होता है, इस गीता-वचनका है। इसी न्यायके अनुसार माधवराव पेशवाको जिन्होंने ब्राह्मण होकरभी तत्कालीन देशकालानुरूप क्षात्र-धर्मका स्वीकार किया था, रामशास्त्रीने यह उपदेश किया था, कि "स्नान-संध्या और पूजापाठमें सारा समय व्यतीत न कर क्षात्र-धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करनेमें अपना सब समय लगा देनेसेही तुम्हारा उभय लोकमें कल्याण होगा" यह बात महाराष्ट्र इतिहासमें प्रसिद्ध है। गीताका मुख्य उपदेश यह बतलानेका नहीं है, कि समाज-धारणाके लिये कैसी व्यवस्था होनी चाहिये। गीता-शास्त्रका तात्पर्य यही है, कि समाज-व्यवस्था चाहे कैसीभी हो; उसमें जो यथाधिकार कर्म तुम्हारे हिस्सेमें पड़ जाएँ, उन्हें उत्साह- पूर्वक करके सर्वभूतहितरूपी आत्मश्रेयकी सिद्धि करो। इस तरहसे कर्तव्य मानकर गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ पुरुष जो कर्म किया करते हैं, वे स्वभावसेही लोककल्याण- कारक हुआ करते हैं। गीता-प्रतिपादित इस कर्मयोगमें और पाश्चात्त्य आधिभौतिक कर्ममार्गमें यह एक बड़ा भारी भेद है, कि गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञोंके मनमें यह अभिमान-बुद्धि रहतीही नहीं, कि मैं अपने कर्मोंके द्वारा लोककल्याण करता हूँ; बल्कि उनके देहस्वभावहीमे साम्य-बुद्धि आ जाती है; और इसीसे वे लोग अपने समयकी समाज-व्यवस्थाके अनुसार केवल कर्तव्य समझ कर जो जो कर्म किया करते हैं. वे सब स्वभावतः लोककल्याणकारक हुआ करते हैं; और आधुनिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रकार संसारको सुखमय मानकर कहाँ करते हैं, कि इस संसारमें सब लोगोंको सुखकी प्राप्ति करा देनेके लिये लोककल्याणका कार्य करना चाहिये। तथापि सभी पाश्चात्त्य आधुनिक कर्मयोगी संसारको सुखमय नही मानते। शोपेनहरके समान संसारको दुःख-प्रधान माननेवाले पंडितभी वहाँ हैं, जो यह प्रति पादन करते हैं, कि यथाशक्ति लोगोंके दुःखका निवारण करना ज्ञानी पुरुषोंका गी. र. ३२
४९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्तव्य है; इसलिये संसारको न छोड़ते हुए उनको ऐसा प्रयत्न करते रहना चाहिये, जिससे लोगोंका दुःख कम होता जावे। अब तो पश्चिमी देशोंमे दुःखनिवारणेच्छुक कर्मयोगियोंका एक अलग पंथही हो गया है। इस पंथका गीताके कर्मयोग-मार्गसे बहुतकुछ साम्य है। जिस स्थानपर महाभारतमें कहा गया है, कि “सुखाद्बहुतरं जीविते नात्र संशयः” - संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है, वहींपर मनुने दुःखं बृहस्पतिंश्च तथा नारदने शुकसे कहा है :- न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥ “जो दुःख सार्वजनिक है, उसके लिये शोक करते रहना उचित नहीं; उसका रोना न रोकर उसके प्रतिकारार्थ (ज्ञानी पुरुषोंको) कुछ उपाय करना चाहिये” (मभा. शा. २०५. ५; ३३०. ९५)। इससे प्रकट होता है, कि यह तत्त्व महाभारत- कारोंकोभी मान्य है, कि संसारके दुःखमय होनेपरभी, उसमें सब लोगोंको होनेवाले दुःखोंको कम करनेका उद्योग चतुर पुरुष करते हैं। परन्तु यह कुछ हमारा सिद्धान्त पक्ष नहीं है। सांसारिक सुखोंकी अपेक्षा आत्मबुद्धि-प्रसादसे होनेवाले सुखको अधिक महत्त्व देकर, इस आत्मबुद्धि-प्रसादरूपी सुखका पूरा अनुभव करते हुए, केवल कर्तव्य समझकरही, अर्थात् ऐसी राजस अभिमान-बुद्धि मनमें न रखकर, कि मैं लोगोंका दुःख कम करूंगा, सब व्यावहारिक कर्मोंको करनेका उपदेश देनेवाले गीताके कर्म- योगकी बराबरी करनेके लिये, दुःखनिवारणेच्छुक पश्चिमी कर्मयोगमेंभी अभी बहुत- कुछ सुधार होना चाहिये। प्रायः सभी पाश्चिमात्य पंडितोंके मनमें यह बात समाई रहती है, कि स्वयं अपना या सब लोगोंका सांसारिक सुखही मनुष्यका इस संसारमें परम साध्य है - चाहे वह सुखके साधनोंको अधिक करनेसे मिले या दुःखोंको कम करनेसे; इसी कारणसे उनके शास्त्रोंमे गीताके निष्काम कर्मयोगका यह उपदेश कहींभी नहीं पाया जाता, कि यद्यपि संसार दुःखमय है, तथापि उसे अपरिहार्य समझकर केवल लोकसंग्रहके लियेही संसारके कर्म करते रहना चाहिये। सभी कर्म-मार्गी हैं तो सही; परन्तु शुद्ध नीतिकी दृष्टिसे देखनेपर उनमें यही भेद मालूम होता है, कि पाश्चात्त्य कर्मयोगी सुखेच्छुक या दुःखनिवारणेच्छुक होते हैं - कुछभी कहा जाय परन्तु वे 'इच्छुक' अर्थात् 'सकाम' अवश्य ही हैं, और गीताके कर्मयोगी हमेशाही फलाशाका त्याग करनेवाले अर्थात् निष्काम होते हैं। इसी बातको यदि दूसरे शब्दोंमें व्यक्त करें, तो यह कहा जा सकता है, कि गीताका कर्मयोग सात्त्विक है; और पाश्चात्त्य कर्मयोग राजस है (गीता १८. २३, २४)। केवल कर्तव्य समझकर, परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सब कर्मोंको करते रहनेका और उनके द्वारा परमेश्वरके यजन या उपासनाको मृत्युपर्यंत जारी रखनेका जो यह गीता-प्रतिपादित ज्ञानयुक्त प्रवृत्ति-मार्ग या कर्मयोग है, इसेही ‘भागवत धर्म’ कहते हैं। “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः” (गीता १८. ४५) – यही
उपसंहार ४९९ इस मार्गका रहस्य है। महाभारतके वनपर्वमें ब्राह्मण-व्याध-कथामें (मभा वन. २०८) और शांतिपर्वमें तुलाधार-जाजली-संवादमें (मभा. शां. २६१) इसी धर्मका निरूपण किया गया है; और मनुस्मृतिमेंभी (मनु. ६. ९६, ९७) यति-धर्मका निरूपण करनेके अनंतर इसी मार्गको वेद-संन्यासियोंका कर्मयोग कह कर विहित तथा मोक्षदायक बतलाया है। 'वेदसंन्यासिक' पदसे और वेदकी संहिताओं तथा ब्राह्मण-ग्रंथोंमें जो वर्णन हैं, उनसे यही सिद्ध होता है, कि यह मार्ग हमारे देशमें अनादि कालसे चला आ रहा है। यदि ऐसा न होता, तो यह देश इतना वैभवशाली कभी हुआ नहीं होता; क्योंकि यह बात प्रकट ही है, कि किसीभी देशके वैभवपूर्ण होनेके लिये वहाँके कर्ता या वीर पुरुष कर्म-मार्गकेही अगुआ हुआ करते हैं। हमारे कर्मयोगका मुख्य तत्त्व यही है, कि कोई कर्ता या वीर पुरुष भलेही हो; परन्तु उन्हेंभी ब्रह्मज्ञानको न छोड़ उसके साथही साथ कर्तव्यको स्थिर रखना चाहिये, और यह पहलेही बतलाया जा चुका है, कि इसी बीजरूप तत्त्वका व्यवस्थित विवेचन करके श्रीभगवानने इस मार्गका अधिक दृढ़ीकरण और प्रसार किया था, इसलिये इस प्राचीन मार्गकाही आगे चल कर 'भागवत धर्म' नाम पड़ा होगा। विपरीत पक्षमें उपनिषदोंसे तो यही व्यक्त होता है, कि कभी-न-कभी कुछ ज्ञानी सत्पुरुषोंके मनका झुकाव पहलेहीसे स्वभावतः संन्यास-मार्गकी ओर रहा करता था; अथवा कम-से-कम इतना अवश्य होता था, कि पहले गृहस्थाश्रममें रहकर अंत समयमें संन्यास लेनेकी बुद्धि मनमें जागृत हुआ करती थी - फिर चाहे वे लोग सचमुच संन्यास लें या न लें। इसलिये यहभी नहीं कहा जा सकता, कि संन्यास-मार्ग नया है; परंतु स्वभाव-वैचित्र्यादि कारणोंसे ये दोनों मार्ग यद्यपि हमारे यहाँ प्राचीन कालसेही प्रचलित हैं, तथापि इस बातकी सत्यतामें कोई शंका नहीं, कि वैदिक कालमें मीमांसकोंके कर्म-मार्गकीही लोगोंमें विशेष प्रबलता थी; और कौरव-पांडवोंके समयमें तो कर्मयोगने संन्यास-मार्गको पीछे हटा दिया था। कारण यह है, कि हमारे धर्मशास्त्रकारोंने साफ़ कह दिया है, कि कौरव-पांडवोंके कालके अनंतर अर्थात् कलियुगमें संन्यास-धर्म निषिद्ध है; और जब कि धर्मशास्त्र "आचारप्रभवो धर्मः" (मभा. अनु. १४९, १३७; मनु. १. १०८) इस वचनके अनुसार प्रायः आचारहीका अनुवादक हुआ करता है; तब सहज-ही सिद्ध होता है कि धर्मशास्त्रकारोंके उक्त निषेध करनेके पहलेही लोकाचारमें संन्यास-मार्ग गौण हो गया होगा।* परंतु इस प्रकार यदि कर्मयोगकी पहले प्रबलता थी और आखिर कलियुगमें संन्यास-धर्मको निषिद्ध माननेतककी नौबत आ चुकी थी; तो अब यहाँ यही स्वाभाविक शंका होती है, कि तेजीसे बढ़ते हुए इस ज्ञानयुक्त कर्मयोगके ह्रासका तथा वर्तमान समयके भक्ति-मार्गमेंभी संन्यास-पक्षकोही श्रेष्ठ माने जानेका कारण क्या है?
- पृष्ठ ३४८-३४९ की टिप्पणीमें दिये गये वचनोंको देखो।