श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ४८९ हैं वे तथा परमेश्वरकी सत्तासे निर्मित सदसद्विवेचन अथवा शक्तिरूप देवताही सब कुछ हैं — इसके बाद और कुछ नहीं है। इसीको हमने 'आधिदैविक' पंथ कहा है। क्योंकि सगुण परमेश्वरभी तो एक देवताही है न ! अब जिनका यह मत है, कि दृश्य सृष्टिका आदिकारण कोईभी अदृश्य मूल तत्त्व नहीं है; और यदि होभी, तो वह मनुष्यकी बुद्धिके लिये अगम्य है; वे लोग "अधिकांश लोगोंका अधिक कल्याण" या "मनुष्यत्वका परम उत्कर्ष" जैसे केवल दृश्य-तत्त्व द्वाराही नीति- शास्त्रका प्रतिपादन किया करते हैं; और यह मानते हैं, कि इस बाह्य और दृश्य तत्त्वके परे विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस पंथको हमने 'आधि- भौतिक' नाम दिया है। जिनका यह सिद्धान्त है, कि नामरूपात्मक दृश्य सृष्टिकी जड़में आत्मा सरीखा कुछ-न-कुछ नित्य और अव्यक्त तत्त्व अवश्य है, वे लोग अपने अपने नीतिशास्त्रकी उपपत्तिको आधिभौतिक उपपत्तिसेभी परे ले जाते हैं, और आत्मज्ञान तथा नीति या धर्मका मेल करके इस बातका निर्णय करते हैं, कि संसारमें मनुष्यका सच्चा कर्तव्य क्या है ? इस पंथको हमने 'आध्यात्मिक' कहा है। इन तीनों पंथोंमें आचार नीति एकही है; परंतु पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें प्रत्येक पंथका मत भिन्न भिन्न है, जिससे नीतिशास्त्रके मूल-तत्त्वोंका स्वरूप हर एक पंथमें थोड़ा बदलता गया है। यह बात प्रकट है, कि व्याकरणशास्त्र कोई नई भाषा नहीं बनाता; किंतु जो भाषा व्यवहारमें प्रचलित रहती है, उसीके नियमोंकी वह खोज करता है, और भाषाकी उन्नतिमें सहायक होता है; ठीक यही हाल नीतिशास्त्रकाभी है। मनुष्य इस संसारमें जबसे पैदा हुआ है, उसी दिनसे वह स्वयं अपनीही बुद्धिसे अपने आचरणको देशकालानुसार शुद्ध रखनेका प्रयत्नभी करता चला आया है, और समय समय पर जो प्रसिद्ध पुरुष या महात्मा हो गये हैं, उन्होंने अपनी समझके अनुसार आचार-शुद्धिके लिये, 'चोदना' या प्रेरणारूपी अनेक नियमभी बना दिये हैं। नीतिशास्त्रकी उत्पत्ति कुछ इस लिये नहीं हुई है, कि वह इन नियमोंको तोड़ कर नये नियम बनाने लगे। हिंसा मत कर, सच बोल, परोपकार कर, इत्यादि नीतिके नियम प्राचीन कालसेही चलते आये हैं। अब नीतिशास्त्रका सिर्फ यही देखनेका काम है, कि नीतिकी यथोचित वृद्धि होनेके लिये सब नीतिनियमोंमें मूल तत्त्व क्या हैं। यही कारण है, कि जब हम नीतिशास्त्रके किसीभी पंथको देखते हैं, तब हम वर्तमान कालमें प्रचलित नीतिके प्रायः सब नियमोंको सभी पंथोंमें एक-से पाते हैं, उनमें जो कुछ भेद दिखलाई पड़ता है, वह उपपत्तिका स्वरूप-भेदके कारण है, और इसलिये डॉ. पाल कारसका यह कथन सच मालूम होता है, कि इस भेदके होनेका मुख्य कारण यही है, कि हरएक पंथमें पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें भिन्न भिन्न मत हैं। अब यह बात सिद्ध हो गई, कि मिल, स्पेन्सर, कांट आदि आधिभौतिक पंथके आधुनिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथकारोंने आत्मौपम्य-दृष्टिके