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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

उपसंहार ४८९ हैं वे तथा परमेश्वरकी सत्तासे निर्मित सदसद्विवेचन अथवा शक्तिरूप देवताही सब कुछ हैं — इसके बाद और कुछ नहीं है। इसीको हमने 'आधिदैविक' पंथ कहा है। क्योंकि सगुण परमेश्वरभी तो एक देवताही है न ! अब जिनका यह मत है, कि दृश्य सृष्टिका आदिकारण कोईभी अदृश्य मूल तत्त्व नहीं है; और यदि होभी, तो वह मनुष्यकी बुद्धिके लिये अगम्य है; वे लोग "अधिकांश लोगोंका अधिक कल्याण" या "मनुष्यत्वका परम उत्कर्ष" जैसे केवल दृश्य-तत्त्व द्वाराही नीति- शास्त्रका प्रतिपादन किया करते हैं; और यह मानते हैं, कि इस बाह्य और दृश्य तत्त्वके परे विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस पंथको हमने 'आधि- भौतिक' नाम दिया है। जिनका यह सिद्धान्त है, कि नामरूपात्मक दृश्य सृष्टिकी जड़में आत्मा सरीखा कुछ-न-कुछ नित्य और अव्यक्त तत्त्व अवश्य है, वे लोग अपने अपने नीतिशास्त्रकी उपपत्तिको आधिभौतिक उपपत्तिसेभी परे ले जाते हैं, और आत्मज्ञान तथा नीति या धर्मका मेल करके इस बातका निर्णय करते हैं, कि संसारमें मनुष्यका सच्चा कर्तव्य क्या है ? इस पंथको हमने 'आध्यात्मिक' कहा है। इन तीनों पंथोंमें आचार नीति एकही है; परंतु पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें प्रत्येक पंथका मत भिन्न भिन्न है, जिससे नीतिशास्त्रके मूल-तत्त्वोंका स्वरूप हर एक पंथमें थोड़ा बदलता गया है। यह बात प्रकट है, कि व्याकरणशास्त्र कोई नई भाषा नहीं बनाता; किंतु जो भाषा व्यवहारमें प्रचलित रहती है, उसीके नियमोंकी वह खोज करता है, और भाषाकी उन्नतिमें सहायक होता है; ठीक यही हाल नीतिशास्त्रकाभी है। मनुष्य इस संसारमें जबसे पैदा हुआ है, उसी दिनसे वह स्वयं अपनीही बुद्धिसे अपने आचरणको देशकालानुसार शुद्ध रखनेका प्रयत्नभी करता चला आया है, और समय समय पर जो प्रसिद्ध पुरुष या महात्मा हो गये हैं, उन्होंने अपनी समझके अनुसार आचार-शुद्धिके लिये, 'चोदना' या प्रेरणारूपी अनेक नियमभी बना दिये हैं। नीतिशास्त्रकी उत्पत्ति कुछ इस लिये नहीं हुई है, कि वह इन नियमोंको तोड़ कर नये नियम बनाने लगे। हिंसा मत कर, सच बोल, परोपकार कर, इत्यादि नीतिके नियम प्राचीन कालसेही चलते आये हैं। अब नीतिशास्त्रका सिर्फ यही देखनेका काम है, कि नीतिकी यथोचित वृद्धि होनेके लिये सब नीतिनियमोंमें मूल तत्त्व क्या हैं। यही कारण है, कि जब हम नीतिशास्त्रके किसीभी पंथको देखते हैं, तब हम वर्तमान कालमें प्रचलित नीतिके प्रायः सब नियमोंको सभी पंथोंमें एक-से पाते हैं, उनमें जो कुछ भेद दिखलाई पड़ता है, वह उपपत्तिका स्वरूप-भेदके कारण है, और इसलिये डॉ. पाल कारसका यह कथन सच मालूम होता है, कि इस भेदके होनेका मुख्य कारण यही है, कि हरएक पंथमें पिंड-ब्रह्मांडकी रचनाके संबंधमें भिन्न भिन्न मत हैं। अब यह बात सिद्ध हो गई, कि मिल, स्पेन्सर, कांट आदि आधिभौतिक पंथके आधुनिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथकारोंने आत्मौपम्य-दृष्टिके

४९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुलभ तथा व्यापक तत्त्वको छोड़कर, 'सर्वभूतहित' या “अधिकांश लोगोंका अधिक हित” जैसे आधिभौतिक और बाह्य तत्त्वपरही नीतिमत्ताको स्थापित करनेका जो प्रयत्न किया, वह इसीलिये किया है, कि पिंड-ब्रह्मांडसंबंधी उनके मत प्राचीन मतोंसे भिन्न हैं । परंतु जो लोग उक्त नूतन मतोंको नहीं मानते; और जो इन प्रश्नोंका स्पष्ट तथा गंभीर विचार कर लेना चाहते हैं, कि, “मैं कौन हूँ ? सृष्टि क्या है ? मुझे इस सृष्टिका ज्ञान कैसे होता है ? जो सृष्टि मुझसे बाहर है, वह स्वतंत्र है या नहीं ? यदि है, तो उसका मूल तत्त्व क्या है ? इस तत्त्वसे मेरा क्या संबंध है ? एक मनुष्य दूसरेके सुखके लिये अपनी जान क्यों देवे ?” “जो जन्म लेते हैं, वे मरतेभी हैं” इस नियमके अनुसार यदि यह बात निश्चित है, कि “जिस पृथ्वीपर हम रहते हैं, उसका और उसके साथ समस्त प्राणियोंका किसी दिन अवश्य नाश हो जायगा ; तो नाशवान् भविष्यकी पीढ़ियोंके लिये हम अपने सुखका नाश क्यों करें ?” - अथवा जिन लोगोंका केवल इस उत्तरसे पूरा समाधान नहीं होता हो, कि “परोपकार आदि मनोवृत्तियाँ इस समय कर्ममय, अनित्य और दृश्य-सृष्टिकी नैसर्गिक प्रवृत्तियाँही हैं,” और जो यह जानना चाहते हैं, कि इन नैसर्गिक प्रवृत्तियोंका मूल कारण क्या है - उनके लिये अध्यात्मशास्त्रके नित्य तत्त्वज्ञानका सहारा लेनेके सिवा और कोई दूसरा मार्ग नहीं है; और, इसी कारणसे ग्रीनने अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथका आरंभ इसी तत्त्वके प्रतिपादनसे किया है, कि जिस आत्माको जड़ सृष्टिका ज्ञान होता है, वह आत्मा जड़ सृष्टिसे अवश्यही भिन्न होगा; और कांटने पहले व्यवसायात्मिका बुद्धिका विवेचन करके फिर वासनात्मक बुद्धिकी तथा नीतिशास्त्रकी मीमांसा की है । “मनुष्य अपने सुखके लियेही या अधिकांश लोगोंको सुख देनेके लियेही पैदा हुआ है” - यह कथन ऊपरसे चाहे कितनाही मोहक तथा उत्तम दिखे, परंतु वस्तुतः यह सच नहीं है । यदि हम क्षणभर इस बातका विचार करें, कि जो महात्मा केवल सत्यके लिये प्राण-दान करनेको तैयार रहते हैं, उनके मनमें क्या यही हेतु रहता है, कि भविष्यकी पीढ़ीके लोगोंको अधिकाधिक विषय-सुख प्राप्त होवें, तो यही कहना पड़ता है, कि अपने तथा अन्य लोगोंके अनित्य आधिभौतिक सुखोंकी अपेक्षा इस संसारमें मनुष्यका औरभी कुछ दूसरा अधिक महत्त्वका परम साध्य या उद्देश्य अवश्य है । यह उद्देश्य क्या है ? जिन्होंने पिंड-ब्रह्मांडके नामरूपात्मक, अतएव नाशवान्, परंतु दृश्य स्वरूपसे आच्छादित आत्मस्वरूपी नित्य तत्त्वको अपनी आत्मप्रतीतिके द्वारा जान लिया है, वे लोग उक्त प्रश्नका यह उत्तर देते हैं कि अपने आत्माके अमर, श्रेष्ठ, शुद्ध, नित्य तथा सर्वव्यापी स्वरूपकी पहचान करके उसीमें रत रहनाही ज्ञानवान् मनुष्यका इस नाशवान् संसारमें पहला कर्तव्य है । जिसे सर्वभूतान्तर्गत आत्मैक्यकी इस तरहसे पहचान हो जाती है, तथा यह ज्ञान जिसकी देह तथा इंद्रियोंमें समा जाता है, वह पुरुष इस बातके सोचमें पड़ा नहीं रहता, कि यह संसार झूठ है या सच, किंतु वह सर्वभूतहितके लिये उद्योग करनेमें

आप-ही-आप प्रवृत्त हो जाता है; और सत्य मार्गका अग्रेसर बन जाता है। क्योंकि उसे यह पूरी तौरसे मालूम रहता है, कि अविनाशी तथा त्रिकालाबाधित सत्य कौन-सा है। मनुष्यकी यह आध्यात्मिक पूर्णावस्थाही सब नीति-नियमोंका मूल उद्गमस्थान है, और इसेही वेदान्तमें 'मोक्ष' कहते हैं। किसीभी नीतिको लीजिये; वह इस अंतिम साध्यसे अलग नहीं हो सकती, इसलिये नीतिशास्त्रका या कर्मयोगशास्त्रका विवेचन करते समय आखिर इसी तत्त्वकी शरणमें जाना पड़ता है। सर्वात्मैक्यरूप अव्यक्त मूल तत्त्वकाही एक व्यक्त स्वरूप सर्वभूतहितेच्छा है; और सगुण परमेश्वर तथा दृश्य सृष्टि दोनों उस आत्माकेही व्यक्त स्वरूप हैं, जो सर्वभूतांतर्गत, सर्वव्यापी और अव्यक्त है; और इस व्यक्त स्वरूपके आगे परे जाकर अव्यक्त आत्माका ज्ञान प्राप्त किये बिना, ज्ञानकी पूर्ति तो होतीही नहीं, किंतु इस संसारमें हर एक मनुष्यका जो यह परम कर्तव्य है, कि शरीरस्थ आत्माको पूर्णावस्थामें पहुँचा दे; वहभी इस ज्ञानके बिना सिद्ध नहीं हो सकता। चाहे नीतिको लीजिये, व्यवहारको लीजिये, धर्मको लीजिये अथवा किसीभी दूसरे शास्त्रको लीजिये; अध्यात्मज्ञानही सबकी अंतिम गति है—"सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।" हमारा भक्ति-मार्गभी इसी तत्त्वज्ञानका अनुसरण करता है, इसलिये उसमेंभी यही सिद्धान्त स्थिर रहता है, कि ज्ञान-दृष्टिसे निष्पन्न होनेवाला साम्य-बुद्धिरूपी तत्त्वही मोक्षका तथा सदाचरणका मूल स्थान है। वेदान्तशास्त्रसे सिद्ध होनेवाले उक्त तत्त्वपर एकही महत्त्वपूर्ण आक्षेप किया जा सकता है, कि कुछ वेदान्ती ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर सब कर्मोंका संन्यास कर देना उचित मानते हैं, इसीलिये यह दिखला कर—कि ज्ञान और कर्ममें विरोध नहीं है, गीतामें कर्मयोगके इस सिद्धान्तका विस्तारसहित वर्णन किया गया है, कि वासनाका क्षय होनेपरभी ज्ञानी पुरुष अपने सब कर्मोंको परमेश्वरार्पणपूर्वक-बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये केवल कर्तव्य समझ करही करता चला जावे। अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये यह उपदेश अवश्य दिया गया है, कि तू परमेश्वरको सब कर्म समर्पण करके युद्ध कर; परंतु यह उपदेश केवल तत्कालीन प्रसंगको देखकरही किया है (गीता ८.७)। उक्त उपदेशका भावार्थ यही मालूम होता है, कि अर्जुनके समानही किसान, सुनार, लोहार, बढ़ई, बनिया, ब्राह्मण, व्यापारी, लेखक उद्यमी इत्यादि सभी लोग अपने अपने अधिकारानुरूप अपने व्यवहारोंको परमेश्व- रार्पण-बुद्धिसे करते हुए संसारका धारण-पोषण करते रहें; जिसे जो रोजगार निसर्गतः प्राप्त हुआ है, उसे यदि वह निष्काम बुद्धिसे करता रहे, तो कर्ताको कुछभी पाप नहीं लगेगा, सब कर्म एकहीसे हैं; दोष केवल कर्ताकी बुद्धिमें है, न कि उसके कर्मोंमें, अतएव बुद्धिको सम करके यदि सब कर्म किये जायँ, तो परमेश्वरकी उपासना हो जाती है, पाप नहीं लगता; और अंतमें सिद्धिभी मिल जाती है। परंतु जिन (विशेषतः अर्वाचीन कालके) लोगोंका यह दृढ़-संकल्प-सा हो गया है, कि चाहे कुछभी हो जाय, इस नाशवान् दृश्य-सृष्टिके आगे बढ़कर आत्म-अनात्म-विचारके

४९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गहरे पानीमें पैठना ठीक नहीं है; वे अपने नीतिशास्त्रका विवेचन, ब्रह्मात्मैक्यरूप परम साध्यकी उच्च श्रेणीको छोड़ कर, मानव-जातिका कल्याण या सर्वभूतहित जैसे निम्न कोटिके आधिभौतिक दृश्य परंतु अनित्य, तत्त्वसेही शुरू किया करते हैं। स्मरण रहे, कि किसी पेड़की चोटीको तोड़ देनेसेही वह नया पेड़ नहीं कहलाता; उसी तरह आधिभौतिक पंडितोंका निर्माण किया हुआ नीतिशास्त्र भोंडा या अपूर्ण भले ही हो; परंतु वह नया नहीं हो सकता। ब्रह्मात्मैक्यको न मानकर प्रत्येक पुरुषको स्वतंत्र माननेवाले हमारे यहाँके सांख्य-शास्त्रज्ञ पंडितोंनेभी, यही देख कर, कि दृश्य-जगतका धारण-पोषण और विनाश किन गुणोंके द्वारा होता है; सत्त्व-रज- तम तीनों गुणोंके लक्षण निश्चित किये हैं; और फिर प्रतिपादन किया हैं, कि इनमेंसे सात्त्विक सद्गुणोंका परम उत्कर्ष करनाही मनुष्यका कर्तव्य है, तथा मनुष्यको इसीसे अंतमें त्रिगुणातीत अवस्था मिलकर मोक्षकी प्राप्ति होती है। भगवद्गीताके सत्रहवें तथा अठारहवें अध्यायोंमें थोड़े भेदके साथ इसीका वर्णन है। * सच देखा जाय, तो क्या सात्त्विक सद्गुणोंका परम उत्कर्ष, और आधिभौतिकवादके अनुसार क्या परोपकार-बुद्धिकी अथवा मनुष्यत्वकी वृद्धि, दोनोंका अर्थ एक-ही है। महाभारत और गीतामें इन सब अधिभौतिक तत्त्वोंका स्पष्ट उल्लेख तो है ही; बल्कि महा- भारतमें यहभी साफ़ साफ़ कहा गया है, कि धर्म-अधर्मके नियमोंके लौकिक या बाह्य उपयोगका विचार करनेपर यही जान पड़ता है, कि ये नीति-धर्म सर्वभूतहितार्थ अर्थात् लोककल्याणार्थ ही हैं। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक पंडितोंका किसीभी अव्यक्त तत्त्वपर विश्वास नहीं है, इसलिये यद्यपि वे जानते हैं, कि तात्त्विक दृष्टिसे कार्य- अकार्यका निर्णय करनेके लिये आधिभौतिक तत्त्व पूरा काम नहीं देते; तोभी वे निरर्थक शब्दोंका आडंबर बढ़ाकर व्यक्त तत्त्वसेही अपना निर्वाह किसी तरह कर लिया करते हैं। गीतामें ऐसा नहीं किया गया है, किंतु इन तत्त्वोंकी परंपराको पिंड- ब्रह्मांडके मूल अव्यक्त तथा नित्य-तत्त्वतक ले जाकर मोक्ष, नीतिधर्म और व्यवहार इन तीनोंकीभी पूरी एकवाक्यता तत्त्वज्ञानके आधारसे गीतामें भगवानने सिद्ध कर दिखाई है; और इसलिये अनुगीताके आरंभमें स्पष्ट कहा गया है, कि कार्य-अकार्य निर्णयार्थ जो धर्म बतलाया गया है, वही मोक्ष-प्राप्ति करा देनेके लियेभी समर्थ है (मभा. अश्व. १६. १२)। जिनका यह मत होगा कि, मोक्षधर्म और नीति- शास्त्रको अथवा अध्यात्मशास्त्र और नीतिको एकमें मिला देनेकी आवश्यकता नहीं है, उन्हें उक्त उपपादनका महत्त्वही मालूम नहीं हो सकता। परंतु जो लोग इसके संबंधमें उदासीन नहीं हैं, उन्हे निस्संदेह यह मालूम हो जायगा, कि गीतामें किया गया कर्मयोगका प्रतिपादन आधिभौतिक विवेचनकी अपेक्षा श्रेष्ठ तथा ग्राह्य है।

  • बाबू किशोरीलाल सरकार, एम्. ए., बी. एल्. ने The Hindu System of Moral Science नामक जो एक छोटासा-ग्रंथ लिखा है, वह इसी ढंगका है; अर्थात् उसमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुणोंके आधारपर विवेचन किया गया है।

उपसंहार ४९३ अध्यात्मज्ञानकी वृद्धि प्राचीन कालमें हिंदुस्थानमें जैसी हो चुकी है, वैसी और कहींभी नहीं हुई, इसलिये किसी अन्य देशमें, कर्मयोगके ऐसे आध्यात्मिक उपपादनका पहले पाया जाना बिलकुल संभव नहीं था - और, यह विदितही है, कि ऐसा उपपादन कहीं पायाभी नहीं जाता। यह स्वीकार होनेपर भी - कि इस संसारके अशाश्वत होनेके कारण इसमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है (गीता ९. ३३) - गीतामें जो यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है, कि "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" - सांसारिक कर्मोंका कभी न कभी संन्यास करनेकी अपेक्षा उन्हीं कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे लोककल्याणके लिये करते रहना अधिक श्रेयस्कर है (गीता ३. ८; ५. २), उसके साधक तथा बाधक कारणोंका विचार ग्यारहवें प्रकरणमें किया जा चुका है। परंतु गीता इस कर्मयोगकी पश्चिमी कर्म-मार्गसे अथवा हमारे यहाँके संन्यास-मार्गकी पश्चिमी कर्मत्याग-पक्षसे, तुलना करते समय उक्त सिद्धान्तका कुछ अधिक स्पष्टीकरण करना आवश्यक मालूम होता है। यह मत वैदिक धर्ममें पहले पहल उपनिषत्कारों तथा सांख्यवादियों- द्वारा प्रचलित किया गया है, कि दुःखमय तथा निस्सार संसारसे बिना निवृत्त हुए मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इसके पूर्वका वैदिक धर्म प्रवृत्ति-प्रधान अर्थात् कर्म- काण्डात्मकही था, परंतु यदि वैदिक धर्मको छोड़ अन्य धर्मोंका विचार किया जाय, तो यह मालूम होगा, कि उनमेंसे बहुतोंने आरंभसेही संन्यास-मार्गको स्वीकार कर लिया था। उदाहरणार्थ, जैन और बौद्ध धर्म पहलेहीसे निवृत्ति-प्रधान हैं; और ईसामसीहकाभी वैसाही उपदेश है। बुद्धने अपने शिष्योंको यदि अंतिम उपदेश दिया है, कि "संसारका त्याग करके यति-धर्ममें रहना चाहिये, स्त्रियोंकी ओर देखना नहीं चाहिये; और उनसे बातचीतभी नहीं करना चाहिये" (महापरि- निव्वाण सुत्त ५. २३); ठीक इसी तरह मूल ईसाई धर्मकाभी कथन है। ईसाने कहा है, कि "तू अपने पड़ोसीको अपनेही समान प्यार कर" (मेथ्यू १९. १९); और, पालकाभी कथन है, कि "तू जो कुछ खाता, पीता या करता है, वह सब ईश्वरके लिये कर" (१ कारि. १०. ३१); और ये दोनों उपदेश ठीक उसी तरहके हैं, जैसे कि गीतामें आत्मौपम्य-बुद्धिसे ईश्वरार्पणपूर्वक कर्म करनेको कहा गया है (गीता ६. २९; ९. २७)। परंतु केवल इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं होता, कि ईसाई धर्म गीता-धर्मके समान प्रवृत्ति-प्रधान है। क्योंकि ईसाई धर्ममेंभी अंतिम साध्य यही है, कि मनुष्यको अमृतत्व मिले तथा वह मुक्त हो जावे; और उसमें यहभी प्रतिपादन किया गया है, कि यह स्थिति घरद्वार त्यागे बिना प्राप्त नहीं हो सकती, अतएव ईसा मसीहके मूल धर्मको संन्यास-प्रधानही कहना चाहिये। स्वयं ईसा मसीह अंततक अविवाहित रहे। जब एक समय एक आदमीने उनसे प्रश्न किया, कि "माँ-बाप तथा पड़ोसियोंको प्यार करनेके धर्मका मैं अबतक पालन करता चला आया हूँ, अब मुझे यह बतलाओ, कि अमृतत्व मिलनेमें क्या कसर है?" तब ईसाने साफ़ उत्तर

४९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

दिया है कि, "तू अपने घरद्वारको बेच दे या किसी गरीबको डाल दे; और मेरा भक्त बन" (मेथ्यू. १९. १६-३०; मार्क १९. २१-३१); और वे तुरंत अपने शिष्योंकी ओर देख उनसे कहने लगे, कि सुईके छेदसे ऊँट भलेही निकल जाय, परंतु ईश्वरके राज्यमें किसी धनवानका प्रवेश होना कठिन है।" यह कहनेमें कोई अतिशयोक्ति नहीं दीख पड़ती, कि यह उपदेश याज्ञवल्क्यके इस उपदेशकी नकल है, कि जो उन्होंने मैत्रेयीको किया था। वह उपदेश यह है - "अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन" (बृ. २. ४. २) - द्रव्यसे अमृतत्व मिलनेकी आशा नहीं है। गीतामें कहा गया है, कि अमृतत्व प्राप्त करनेके लिये सांसारिक कर्मोंको छोड़नेकी आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें निष्काम बुद्धिसे करतेही रहना चाहिये; परंतु ऐसा उपदेश ईसाने कहींभी नहीं किया है। इसके विपरीत उन्होंने यही कहा है, कि सांसारिक संपत्ति और परमेश्वरके बीच चिरस्थायी विरोध है (मेथ्यू. ६. २४), इसलिये "माँ-बाप, घर-द्वार, स्त्री-बच्चे और भाई-बहिन एवं स्वयं अपने जीवनसेभी द्वेष करके जो मनुष्य मेरा अनुयायी नहीं बनता, वह मेरा भक्त कभी हो नहीं सकता" (ल्यूक. १४. २६-३३)। ईसाके शिष्य पालकाभी स्पष्ट उपदेश है, कि "स्त्रियोंको स्पर्शतकभी न करना सर्वोत्तम पक्ष है" (१. कारि. ७. १), इसी प्रकार, हम पहलेही कह चुके हैं, कि ईसाके मुंहसे निकले हुए - "हमारी जन्मदात्री* माता, हमारी कौन होती है? हमारे आसपासके ईश्वरभक्तही हमारे माँ-बाप और बंधु हैं" (मेथ्यू. १२. ४६-५०) - इस वाक्यमें, और "किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोकः" बृहदारण्यकोपनिषदके संन्यासविषयक इस वचनमें (बृ. ४. ४. २२) बहुत कुछ समानता है। स्वयं बाइबलकेही इन वाक्योंसे यह सिद्ध होता है, कि जैन और बौद्ध धर्मोंके सदृशही ईसाई धर्मभी आरंभमें संन्यास-प्रधान अर्थात् संसारको त्याग देनेका उपदेश देनेवाला है, और ईसाई धर्मके इतिहासको देखनेसेभी यही मालूम होता है† कि ईसाके इस उपदेशानुसारही पहले ईसाई धर्मोपदेशक वैराग्यसे रहा करते


  • यह तो संन्यास-मार्गियोंका हमेशाहीका उपदेश है। शंकराचार्यका "का ते कान्ता कस्ते पुत्रः" यह श्लोक प्रसिद्धही है; और, अश्वघोषके 'बुद्धचरित' (६.४५) में यह वर्णन पाया है, कि बुद्धके मुखसे "क्वाहं मातुः क्व सा मम" ऐसा उद्गार निकला था। † See Paulen's System of Ethics (Eng. trans.) Book I. Chap. 2 and 3; esp. pp. 89-97. "The new (Christian) converts seemed to renounce their family and country ..... their gloomy and austere aspect, their abhorrence of the common business and pleasures of life, and their frequent predictions of impending calamities inspired the pagans with the apprehension of some danger which would arise from the new sect." Historian's History of the World, Vol. VI, p. 318. जर्मन कवि गटेने अपने Faust (फॉस्ट)

उपसंहार ४९५ थे - “ईसाके भक्तोंको द्रव्य-संचय न करके रहना चाहिये” (मेथ्यू. १० ९-१५)। ईसाई धर्मोपदेशकोंमें तथा ईसाके भक्तोंमें गृहस्थ-धर्मसे संसारमें रहनेकी जो रीति पाई जाती है, वह बहुत दिनोंके बादके सुधारोंका फल है - वह मूल ईसाई धर्मका स्वरूप नहीं है। वर्तमान समयमेंभी शोपेनहर सरीखे विद्वान् यही प्रतिपादित करते हैं, कि संसार दुःखमय होनेके कारण त्याज्य है; और पहले यह बतलाया जा चुका है, कि ग्रीस देशमें प्राचीन कालमें यह प्रश्न उपस्थित हुआ था, कि तत्त्व-विचारमेंही अपने जीवनको व्यतीत कर देना श्रेष्ठ है, या लोकहितके लिये राजकीय मामलोंमें प्रयत्न करते रहना श्रेष्ठ है। सारांश यह है, कि पश्चिमी लोगोंका यह कर्मत्याग-पक्ष और हम लोगोंका संन्यास-मार्ग कई अंशोंमें एकही है; और इन मार्गोंका समर्थन करनेकी पूर्वी और पश्चिमी पद्धतिभी एकही-सी है। परंतु आधुनिक पश्चिमी पंडित कर्मत्यागकी अपेक्षा कर्म-मार्गकी श्रेष्ठताके जो कारण बतलाते हैं, वे गीतामें दिये गये प्रवृत्ति-मार्गके प्रतिपादनसे भिन्न हैं, इसलिये अब इन दोनोंके भेदकोभी यहाँ- पर अवश्य बतलाना चाहिये। पश्चिमी आधिभौतिक कर्म-मार्गियोंका कहना है, कि संसारके सब मनुष्योंका अथवा अधिकांश लोगोंका अधिक सुख - अर्थात् ऐहिक सुख-ही इस जगत्‌में परम साध्य है, अतएव सब लोगोंके सुखके लिये प्रयत्न करते हुए उसी सुखमें स्वयंभी मग्न हो जाना प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है, और इसकी पुष्टिके लिये उनमेंसे अधिकांश पंडित यह प्रतिपादनभी करते हैं, कि संसारमें दुःखकी अपेक्षा सुखही अधिक है। इस दृष्टिसे देखनेपर यही कहना पड़ता है, कि पश्चिमी कर्म-मार्गीय लोग “सुख-प्राप्तिकी आशासे सांसारिक कर्म करनेवाले” होते हैं; और पश्चिमी कर्मत्यागमार्गीय लोग “संसारसे उबे हुए” होते हैं; तथा कदाचित् इसी कारणसे उनको क्रमानुसार 'आशावादी' और 'निराशावादी' कहते हैं।* परंतु भगवद्गीतामें जिन दो निष्ठाओंका वर्णन है, वे इनसे भिन्न हैं। चाहे स्वयं अपने लिये हो या परोपकारके लिये हो, कुछभी हो; परंतु जो मनुष्य ऐहिक विषयसुख नामक काव्यमें यह लिखा है - “Thou shalt renounce ! That is the eternal song which ring in everyone's ears; which, our whole life-long every hour is hoarsely singing to us. ” ( Faust, Part I, II. 1195- 1198)। मूल इसाई धर्मके संन्यास-प्रधान होनेके विषयमें कितनेही अन्य आधार और प्रमाण दिये जा सकते हैं।

  • जेम्स सलीने (James Sulli) अपने Pessimism नामक ग्रंथमें Optimist और Pessimist नामक दो पंथोंका वर्णन किया है। इनमेंसे Optimist का अर्थ 'उत्साही, आनंदित' और Pessimist का अर्थ 'संसारसे त्रस्त' होता है; और हमने पहले एक टिप्पणीमें बतला दिया है, कि ये शब्द गीताके 'योग' और 'सांख्य'के पूर्णरूपसे समानार्थक नहीं हैं (पृष्ठ ३०६)। 'दुःखनिवारणेच्छुक' नामक जो एक तीसरा पंथ है और जिसका वर्णन आगे किया गया है, उसका सलीने Meliorism नाम रखा है।

प्रकरण १०-१२: सिद्ध-अवस्था, भक्तिमार्ग व नीतिशास्त्र

४३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पानेकी लालसासे संसारके कर्मोंमें प्रवृत्त होता है, उसकी साम्य-बुद्धिरूप सात्त्विक वृत्तिमें कुछ-न-कुछ बट्टा अवश्य लग जाता है, इसलिये गीताका यह उपदेश, है, कि संसार दुःखमय हो या सुखमय, सांसारिक कर्म जब छूटतेही नहीं, तब उनके सुखदुःखका विचार करते रहनेमें कुछ लाभ नहीं होगा। चाहे सुख हो या दुःख। परंतु मनुष्यका यही कर्तव्य है, कि वह इस बातमें अपना महद्भाग्य समझे, कि उसे नरदेह प्राप्त हुई है; और कर्म-सृष्टिके इस अपरिहार्य व्यवहारमें जो कुछ प्रसंगानुसार प्राप्त हो, उसे अपने अंतःकरणको निगण न करके इस न्याय् अर्थात् साम्य-बुद्धिमे सहता रहे, कि “दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः” (गीता २. ५६) ; एवं अपने अधिकारानुसार जो कुछ कर्म शास्त्रतः अपने हिस्सेमें आ पड़े, उसे जीवन- पर्यत, और किसीके लिये नहीं; किंतु संसारके धारण-पोषणके लिये, निष्काम बुद्धिसे करना रहे। गीताकालमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था जारी थी, इसीलिये बतलाया गया है, कि ये सामाजिक कर्म चातुर्वर्ण्यके विभागके अनुसार हरएकके हिस्सेमें आ पड़ते हैं और अठारहवें अध्यायमें यहभी बतलाया गया है, कि ये भेद गुणकर्म-विभागसे कैसे निष्पन्न होते हैं ‘( गीता १८. ४१-४४) । परंतु इससे किसीको यह न समझ लेना चाहिये, कि गीताके नीति-तत्त्व चातुर्वर्ण्यरूपी समाजव्यवस्थापरही अवलंबित हैं। यह बात महाभारतकारकेभी ध्यानमें पूर्णतया आ चुकी थी, कि अहिंसादि नीति-धर्मोंकी व्याप्ति केवल चातुर्वर्ण्यके लियेही नहीं है, बल्कि ये धर्म मनुष्यमात्रके लिये एक समान हैं। इसीलिये महाभारतमें स्पष्ट रीतिसे कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्यके बाहर जिन अनार्य लोगोंमें ये धर्म प्रचलित हैं, उन लोगोंकीभी रक्षा राजाको इन सामान्य कर्मोंके अनुसारही करनी चाहिये (शां. ६५. १२-२२)। अर्थात् गीतामेंही कही गई नीतिकी उपपत्ति चातुर्वर्ण्यसरीखी किसी एक विशिष्ट समाजव्यवस्थापर अव- लंबित नहीं है; किंतु सर्वसामान्य आध्यात्मिक ज्ञानके आधारपरही उसका प्रति- पादन किया गया है। गीताके नीति-धर्मका मुख्य तात्पर्य यही है, कि जो कर्तव्य-कर्म शास्त्रतः प्राप्त हो, उसे निष्काम और आत्मौपम्य-बुद्धिसे करना चाहिये; और सब देशोंके लोगोंके लिये यह एकही समान उपयोगी है। परंतु, यद्यपि आत्मौपम्य-दृष्टिका और निष्काम कर्माचरणका यह सामान्य नीति-तत्त्व सिद्ध हो गया, तथापि इस बातकाभी स्पष्ट विचार कर लेना आवश्यक है, कि यह नीति-तत्त्व जिन कर्मोंको उपयोगी होता है, वे कर्म इस समाजमें प्रत्येक व्यक्तिको कैसे प्राप्त होते हैं। इसे बतलानेके लियेही, उस समयमें उपयुक्त होनेवाले महज उदाहरणके नातेसे गीतामें चातुर्वर्ण्यका उल्लेख किया गया है, और, साथ साथ गुणकर्म-विभागके अनुसार उस समाजव्यवस्थाकी संक्षेपमें उपपत्तिभी बतलाई है। परंतु इस बातपरभी ध्यान देना चाहिये, कि वह चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाही कुछ गीताका मुख्य भाग नहीं है। सारे गीताशास्त्रका व्यापक सिद्धान्त यही है, कि यदि कहीं चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रचलित न हो अथवा वह किसी गिरी दशामें हो; तो वहांभी तत्कालीन प्रचलित समाज-

[Header] उपसंहार ४९७

व्यवस्थाके अनुसार समाजके धारण-पोषणके जो काम अपने हिस्सेमें आ पड़े, उन्हें लोकसंग्रहके लिये धैर्य और उत्साहसे तथा निष्काम बुद्धिसे कर्तव्य समझकर करते रहना चाहिये, क्योंकि मनुष्यका जन्म उसी कामके लिये हुआ है; न कि केवल सुखोपभोगके लिये। कुछ लोग गीताके नीतिधर्मको केवल चातुर्वर्ण्य-मूलक समझते हैं; लेकिन उनकी यह समझ ठीक नहीं है। चाहे समाज हिंदुओंका हो या म्लेच्छोंका, चाहे वह प्राचीन हो या अर्वाचीन, चाहे वह पूर्वी हो या पश्चिमी, यदि उस समाजमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रचलित हो, तो उस व्यवस्थाके अनुसार, या दूसरी समाज- व्यवस्था जारी हो, तो उस व्यवस्थाके अनुसार, जो काम अपने हिस्सेमें आ पड़े अथवा जिसे हम अपनी रुचिके अनुसार कर्तव्य समझकर एक बार स्वीकृत कर लें, वही अपना स्वधर्म हो जाता है; और गीता कहती है, कि किसीभी कारणसे इस धर्मको ऐन मौकेपर छोड़ देना और दूसरों कामोंमें लग जाना, धर्मकी तथा सर्वभूतहितकी दृष्टिसे निंदनीय है। यही तात्पर्य "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" (गीता ३. ३५) - अर्थात् स्वधर्मपालनमें यदि मृत्यु हो जाय, तो वहभी श्रेयस्कर है; परंतु दूसरोंका धर्म भयावह होता है, इस गीता-वचनका है। इसी न्यायके अनुसार माधवराव पेशवाको जिन्होंने ब्राह्मण होकरभी तत्कालीन देशकालानुरूप क्षात्र-धर्मका स्वीकार किया था, रामशास्त्रीने यह उपदेश किया था, कि "स्नान-संध्या और पूजापाठमें सारा समय व्यतीत न कर क्षात्र-धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करनेमें अपना सब समय लगा देनेसेही तुम्हारा उभय लोकमें कल्याण होगा" यह बात महाराष्ट्र इतिहासमें प्रसिद्ध है। गीताका मुख्य उपदेश यह बतलानेका नहीं है, कि समाज-धारणाके लिये कैसी व्यवस्था होनी चाहिये। गीता-शास्त्रका तात्पर्य यही है, कि समाज-व्यवस्था चाहे कैसीभी हो; उसमें जो यथाधिकार कर्म तुम्हारे हिस्सेमें पड़ जाएँ, उन्हें उत्साह- पूर्वक करके सर्वभूतहितरूपी आत्मश्रेयकी सिद्धि करो। इस तरहसे कर्तव्य मानकर गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ पुरुष जो कर्म किया करते हैं, वे स्वभावसेही लोककल्याण- कारक हुआ करते हैं। गीता-प्रतिपादित इस कर्मयोगमें और पाश्चात्त्य आधिभौतिक कर्ममार्गमें यह एक बड़ा भारी भेद है, कि गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञोंके मनमें यह अभिमान-बुद्धि रहतीही नहीं, कि मैं अपने कर्मोंके द्वारा लोककल्याण करता हूँ; बल्कि उनके देहस्वभावहीमे साम्य-बुद्धि आ जाती है; और इसीसे वे लोग अपने समयकी समाज-व्यवस्थाके अनुसार केवल कर्तव्य समझ कर जो जो कर्म किया करते हैं. वे सब स्वभावतः लोककल्याणकारक हुआ करते हैं; और आधुनिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रकार संसारको सुखमय मानकर कहाँ करते हैं, कि इस संसारमें सब लोगोंको सुखकी प्राप्ति करा देनेके लिये लोककल्याणका कार्य करना चाहिये। तथापि सभी पाश्चात्त्य आधुनिक कर्मयोगी संसारको सुखमय नही मानते। शोपेनहरके समान संसारको दुःख-प्रधान माननेवाले पंडितभी वहाँ हैं, जो यह प्रति पादन करते हैं, कि यथाशक्ति लोगोंके दुःखका निवारण करना ज्ञानी पुरुषोंका गी. र. ३२

४९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्तव्य है; इसलिये संसारको न छोड़ते हुए उनको ऐसा प्रयत्न करते रहना चाहिये, जिससे लोगोंका दुःख कम होता जावे। अब तो पश्चिमी देशोंमे दुःखनिवारणेच्छुक कर्मयोगियोंका एक अलग पंथही हो गया है। इस पंथका गीताके कर्मयोग-मार्गसे बहुतकुछ साम्य है। जिस स्थानपर महाभारतमें कहा गया है, कि “सुखाद्बहुतरं जीविते नात्र संशयः” - संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है, वहींपर मनुने दुःखं बृहस्पतिंश्च तथा नारदने शुकसे कहा है :- न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥ “जो दुःख सार्वजनिक है, उसके लिये शोक करते रहना उचित नहीं; उसका रोना न रोकर उसके प्रतिकारार्थ (ज्ञानी पुरुषोंको) कुछ उपाय करना चाहिये” (मभा. शा. २०५. ५; ३३०. ९५)। इससे प्रकट होता है, कि यह तत्त्व महाभारत- कारोंकोभी मान्य है, कि संसारके दुःखमय होनेपरभी, उसमें सब लोगोंको होनेवाले दुःखोंको कम करनेका उद्योग चतुर पुरुष करते हैं। परन्तु यह कुछ हमारा सिद्धान्त पक्ष नहीं है। सांसारिक सुखोंकी अपेक्षा आत्मबुद्धि-प्रसादसे होनेवाले सुखको अधिक महत्त्व देकर, इस आत्मबुद्धि-प्रसादरूपी सुखका पूरा अनुभव करते हुए, केवल कर्तव्य समझकरही, अर्थात् ऐसी राजस अभिमान-बुद्धि मनमें न रखकर, कि मैं लोगोंका दुःख कम करूंगा, सब व्यावहारिक कर्मोंको करनेका उपदेश देनेवाले गीताके कर्म- योगकी बराबरी करनेके लिये, दुःखनिवारणेच्छुक पश्चिमी कर्मयोगमेंभी अभी बहुत- कुछ सुधार होना चाहिये। प्रायः सभी पाश्चिमात्य पंडितोंके मनमें यह बात समाई रहती है, कि स्वयं अपना या सब लोगोंका सांसारिक सुखही मनुष्यका इस संसारमें परम साध्य है - चाहे वह सुखके साधनोंको अधिक करनेसे मिले या दुःखोंको कम करनेसे; इसी कारणसे उनके शास्त्रोंमे गीताके निष्काम कर्मयोगका यह उपदेश कहींभी नहीं पाया जाता, कि यद्यपि संसार दुःखमय है, तथापि उसे अपरिहार्य समझकर केवल लोकसंग्रहके लियेही संसारके कर्म करते रहना चाहिये। सभी कर्म-मार्गी हैं तो सही; परन्तु शुद्ध नीतिकी दृष्टिसे देखनेपर उनमें यही भेद मालूम होता है, कि पाश्चात्त्य कर्मयोगी सुखेच्छुक या दुःखनिवारणेच्छुक होते हैं - कुछभी कहा जाय परन्तु वे 'इच्छुक' अर्थात् 'सकाम' अवश्य ही हैं, और गीताके कर्मयोगी हमेशाही फलाशाका त्याग करनेवाले अर्थात् निष्काम होते हैं। इसी बातको यदि दूसरे शब्दोंमें व्यक्त करें, तो यह कहा जा सकता है, कि गीताका कर्मयोग सात्त्विक है; और पाश्चात्त्य कर्मयोग राजस है (गीता १८. २३, २४)। केवल कर्तव्य समझकर, परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सब कर्मोंको करते रहनेका और उनके द्वारा परमेश्वरके यजन या उपासनाको मृत्युपर्यंत जारी रखनेका जो यह गीता-प्रतिपादित ज्ञानयुक्त प्रवृत्ति-मार्ग या कर्मयोग है, इसेही ‘भागवत धर्म’ कहते हैं। “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः” (गीता १८. ४५) – यही

उपसंहार ४९९ इस मार्गका रहस्य है। महाभारतके वनपर्वमें ब्राह्मण-व्याध-कथामें (मभा वन. २०८) और शांतिपर्वमें तुलाधार-जाजली-संवादमें (मभा. शां. २६१) इसी धर्मका निरूपण किया गया है; और मनुस्मृतिमेंभी (मनु. ६. ९६, ९७) यति-धर्मका निरूपण करनेके अनंतर इसी मार्गको वेद-संन्यासियोंका कर्मयोग कह कर विहित तथा मोक्षदायक बतलाया है। 'वेदसंन्यासिक' पदसे और वेदकी संहिताओं तथा ब्राह्मण-ग्रंथोंमें जो वर्णन हैं, उनसे यही सिद्ध होता है, कि यह मार्ग हमारे देशमें अनादि कालसे चला आ रहा है। यदि ऐसा न होता, तो यह देश इतना वैभवशाली कभी हुआ नहीं होता; क्योंकि यह बात प्रकट ही है, कि किसीभी देशके वैभवपूर्ण होनेके लिये वहाँके कर्ता या वीर पुरुष कर्म-मार्गकेही अगुआ हुआ करते हैं। हमारे कर्मयोगका मुख्य तत्त्व यही है, कि कोई कर्ता या वीर पुरुष भलेही हो; परन्तु उन्हेंभी ब्रह्मज्ञानको न छोड़ उसके साथही साथ कर्तव्यको स्थिर रखना चाहिये, और यह पहलेही बतलाया जा चुका है, कि इसी बीजरूप तत्त्वका व्यवस्थित विवेचन करके श्रीभगवानने इस मार्गका अधिक दृढ़ीकरण और प्रसार किया था, इसलिये इस प्राचीन मार्गकाही आगे चल कर 'भागवत धर्म' नाम पड़ा होगा। विपरीत पक्षमें उपनिषदोंसे तो यही व्यक्त होता है, कि कभी-न-कभी कुछ ज्ञानी सत्पुरुषोंके मनका झुकाव पहलेहीसे स्वभावतः संन्यास-मार्गकी ओर रहा करता था; अथवा कम-से-कम इतना अवश्य होता था, कि पहले गृहस्थाश्रममें रहकर अंत समयमें संन्यास लेनेकी बुद्धि मनमें जागृत हुआ करती थी - फिर चाहे वे लोग सचमुच संन्यास लें या न लें। इसलिये यहभी नहीं कहा जा सकता, कि संन्यास-मार्ग नया है; परंतु स्वभाव-वैचित्र्यादि कारणोंसे ये दोनों मार्ग यद्यपि हमारे यहाँ प्राचीन कालसेही प्रचलित हैं, तथापि इस बातकी सत्यतामें कोई शंका नहीं, कि वैदिक कालमें मीमांसकोंके कर्म-मार्गकीही लोगोंमें विशेष प्रबलता थी; और कौरव-पांडवोंके समयमें तो कर्मयोगने संन्यास-मार्गको पीछे हटा दिया था। कारण यह है, कि हमारे धर्मशास्त्रकारोंने साफ़ कह दिया है, कि कौरव-पांडवोंके कालके अनंतर अर्थात् कलियुगमें संन्यास-धर्म निषिद्ध है; और जब कि धर्मशास्त्र "आचारप्रभवो धर्मः" (मभा. अनु. १४९, १३७; मनु. १. १०८) इस वचनके अनुसार प्रायः आचारहीका अनुवादक हुआ करता है; तब सहज-ही सिद्ध होता है कि धर्मशास्त्रकारोंके उक्त निषेध करनेके पहलेही लोकाचारमें संन्यास-मार्ग गौण हो गया होगा।* परंतु इस प्रकार यदि कर्मयोगकी पहले प्रबलता थी और आखिर कलियुगमें संन्यास-धर्मको निषिद्ध माननेतककी नौबत आ चुकी थी; तो अब यहाँ यही स्वाभाविक शंका होती है, कि तेजीसे बढ़ते हुए इस ज्ञानयुक्त कर्मयोगके ह्रासका तथा वर्तमान समयके भक्ति-मार्गमेंभी संन्यास-पक्षकोही श्रेष्ठ माने जानेका कारण क्या है?

  • पृष्ठ ३४८-३४९ की टिप्पणीमें दिये गये वचनोंको देखो।

५०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कुछ लोग कहते हैं, कि यह परिवर्तन श्रीमदाद्यशंकराचार्यके द्वारा हुआ । परंतु इतिहासको देखनेसे इस उपपत्तिमें सत्यता नहीं दीख पड़ती । पहले प्रकरणमें हम कह चुके हैं, कि श्रीशंकराचार्यके संप्रदायके दो विभाग हैं - ( १ ) मायावादात्मक अद्वैत ज्ञान, और ( २ ) कर्म-संन्यास-धर्म । अब यद्यपि अद्वैत ब्रह्मज्ञानके साथ साथ संन्यास-धर्मकाभी प्रतिपादन उपनिषदोंमें किया गया है, तोभी इन दोनोंका कोई नित्य संबंध नहीं है, इसलिये यह नहीं कहाँ जा सकता, कि अद्वैत-वेदान्त-मतको स्वीकार करनेपर संन्यास-मार्गकोभी अवश्य स्वीकार करनाही चाहिये । उदा- हरणार्थ, याज्ञवल्क्य प्रभृतिसे अद्वैत-वेदान्तकी पूरी शिक्षा पाये हुए जनक आदिक स्वयं कर्मयोगी थे । यही क्यों; बल्कि उपनिषदोंका अद्वैत-ब्रह्मज्ञानही गीताका प्रति- पाद्य विषय होनेपरभी, गीता इसी ज्ञानके आधारसे संन्यासके बदले कर्मयोगकाही समर्थन किया गया है । इसलिये पहले इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि शांकर-संप्रदायपर संन्यास-धर्मको उत्तेजन देनेका जो आक्षेप किया जाता है, वह इस संप्रदायके अद्वैत ज्ञानको उपयुक्त न होकर उसके अंतर्गत केवल संन्यास-धर्म- कोही उपयोगी हो सकता है । यद्यपि श्रीशंकराचार्यने इस संन्यास-मार्गको नये सिरेसे नहीं चलाया है; तथापि कलियुगमें निषिद्ध या वर्जित माने जानेके कारण उसमें जो गौणता आ गई थी, उसे, उन्होंने अवश्य दूर किया है । परंतु यदि इसके भी पहले अन्य कारणोंसे लोगोंमें संन्यास मार्गकी चाह हुई न होती, तो इसमें संदेह है, कि आचार्यका संन्यास-प्रधान मत इतना अधिक फैलाने पाता या नहीं । ईसानेकहा है सही, कि "यदि कोई एक गालमें थप्पड़ मार दे, तो दूसरे गालकोभी उसके सामने कर दो" (ल्यूक. ६. २९) । परंतु यदि विचार किया जाय, कि इस मतके अनुयायी यूरोपके ईसाई राष्ट्रोंमें कितने हैं; तो यही दीख पड़ेगा, कि किसी बातके प्रचलित होनेके लिये केवल इतनाही बस नहीं है, कि कोई धर्मोपदेशक उसे अच्छी कह दे; बल्कि ऐसा होनेके लिये - अर्थात् लोगोंके मनका झुकाव उधर होनेके लिये - उस उपदेशके पहलेही कुछ सबल कारण उत्पन्न हो जाया करते हैं; और तब फिर लोकाचारमें धीरे धीरे परिवर्तन होकर उसीके अनुसार धर्म-नियमोंमेंभी परिवर्तन होने लगता है । "आचार-धर्मका मूल है" - इस स्मृति-वचनका तात्पर्यभी यही है । गत शताब्दीमें शोपेनहरने जर्मनीमें संन्यास-मार्गका समर्थन किया था, परंतु उसका बोया हुआ बीज वहाँ अबतक अच्छी तरहसे जमने नहीं पाया, और इस समय तो निट्शेकेही मतोंकी वहाँ धूम मची हुई है । हमारे यहाँ देखनेसेभी यही मालूम होगा, कि संन्यास-मार्ग श्रीशंकराचार्यके पहले अर्थात् वैदिक-कालमेंही यद्यपि जारी हो गया था, तोभी वह उस समय कर्मयोगसे आगे अपना कदम नहीं बढ़ा सका था । स्मृति-ग्रंथोंमें अंतमें संन्यास लेनेको कहा गया है सही; परंतु उसमेंभी पूर्वाश्रमोंके कर्तव्यपालनका उपदेश दियाही गया है । श्रीशंकराचार्यके ग्रंथोंका प्रतिपाद्य विषय कर्म-संन्यास-पक्ष भलेही हो, परंतु स्वयं उनके जीवन-चरितसेही यह बात सिद्ध

उपसंहार ५०१

होती है, कि ज्ञानी पुरुषोंको तथा संन्यासियोंको धर्म-संस्थापनाके समान लोकसंग्रहके काम यथाधिकार करनेके लिये उनकी ओरसे कुछ मनाही नहीं थी (वे. सू शां. भा. ३. ३. ३२)। संन्यास-मार्गकी प्रबलताका कारण यदि श्रीशंकराचार्यका स्मार्त संप्रदायही होता तो आधुनिक भागवत संप्रदायके रामानुजाचार्य अपने गीता-भाष्यमें शंकराचार्यकीही नाईं कर्मयोगको गौण नहीं मानते । परंतु जो कर्मयोग एक बार तेजीसे जारी थी, वह जब कि भागवत-संप्रदायमेंभी निवृत्ति-प्रधान भक्तिसे पीछे हटा दिया गया है, तब तो यही कहना पड़ता है, कि उसके पिछड़ जानेके लिये कुछ ऐसे कारण अवश्य उपस्थित हुए होंगे; जो सभी संप्रदायोंको अथवा सारे देशको एकही समान लागू हो सके । हमारे मतानुसार उनमेंसे पहला और प्रधान कारण जैन एवं बौद्ध धर्मोंका उदय तथा प्रचार है, क्योंकि इन्हीं दोनों धर्मोंनें चारों वर्णोंके लिये संन्यास-मार्गका दरवाजा खोल दिया था; और इसीलिये क्षत्रियवर्गमेंभी संन्यास धर्मका विशेष उत्कर्ष होने लगा था। परंतु, यद्यपि आरंभमें बुद्धने कर्मरहित संन्यास- मार्गकाही उपदेश दिया था, तथापि गीताके कर्मयोगानुसार बौद्ध धर्ममें शीघ्रही यह सुधार किया गया, कि बौद्ध यतियोंको अकेले जगलमें जाकर एक कोनेमें नहीं बैठे रहना चाहिये; बल्कि उनको धर्मप्रचार तथा परोपकारके अन्य काम करनेके लिये सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिये (देखो परिशिष्ट प्रकरण)। इतिहास-ग्रंथोंसे यह बात प्रकट है, कि इसी सुधारके कारण उद्योगी बौद्ध-धर्मीय यति-लोगोंके संघ उत्तरमें तिब्बत, पूर्वमें ब्रह्मदेश, चीन और जपान, दक्षिणमें लंका और पश्चिममें तुर्किस्तान तथा उससे लगे हुए ग्रीस इत्यादि यूरोपके देशोंतक जा पहुँचे थे। शालि- वाहन शकके लगभग छः-सात सौ वर्ष पहले जैन और बौद्ध धर्मोंके प्रवर्तकोंका जन्म हुआ था; और श्रीशंकराचार्यका जन्म शालिवाहन शकके छः सौ वर्ष अनंतर हुआ। इस बीचमें बौद्ध यतियोंके संघोंका अपूर्व वैभव सब लोग अपनी आँखोंके सामने देख रहे थे, इसीलिये यति-धर्मके विषयमें उन लोगोंमें एक प्रकारकी चाह तथा आदर- बुद्धि शंकराचार्यके जन्मके पहलेही उत्पन्न हो चुकी थी। शंकराचार्यने यद्यपि जैन और बौद्ध धर्मोंका खंडन किया है; तथापि यति-धर्मके बारेमें लोगोंमें जो आदर- बुद्धि उत्पन्न हो चुकी थी, उसका उन्होंने नाश नहीं किया, किंतु उसीको वैदिक रूप दे दिया; और बौद्ध धर्मके बदले वैदिक धर्मकी संस्थापना करनेके लिये उन्होंने बहुत प्रयत्नशील वैदिक संन्यासी तैयार किये। ये संन्यासी ब्रह्मचर्यव्रतमें रहते थे; और संन्यासका दंड तथा गेरुआ वस्त्रभी धारण करते थे; परंतु अपने गुरुके समान इन लोगोंनेभी वैदिक धर्मकी स्थापनाका काम आगे जारी रखा था। यति-संघकी इस नई जोड़ीको (वैदिक संन्यासियोंके संघ) देख उस समय अनेक लोगोंके मनमें शंका होने लगी थी, कि शांकर-मतमें और बौद्ध-मतमें यदि कुछ अंतर हैभी, तो क्या है; और प्रतीत होता है, कि प्रायः इसी शंकाको दूर करनेके लिये छांदोग्योपनिषदके भाष्यमें आचार्यने लिखा है, कि "बौद्ध यति-धर्म और सांख्य यति-धर्म दोनों वेदबाह्य

५०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तथा खोटे हैं । एवं हमारा संन्यास-धर्म वेदके आधारसे प्रवृत्त किया गया है, इसलिये यही सच्चा है” (छां. शां. भा. २. २३. १) । जो हो; यह निर्विवाद सिद्ध है, कि कलियुगमें पहले जैन और बौद्ध लोगोंनेही यति-धर्मका प्रचार किया था । परंतु बौद्ध यतियोंनेभी धर्मप्रसार तथा लोकसंग्रहके लिये आगे चलकर उपर्युक्त क्रम करना शुरू कर दिया था; और इतिहासमे मालूम होता है, कि इनको हरानेके लिये श्रीशंकराचार्यने जो वैदिक यति-संघ तैयार किये थे, उन्होंनेभी कर्मको बिलकुल न त्याग कर अपने उद्योगसेही वैदिक धर्मकी फिरसे स्थापना की । अनंतर शीघ्रही इस देशपर मुसलमानोंकी चढ़ाइयाँ होने लगीं; और जब इस परचक्रमे पराक्रमपूर्वक रक्षा करनेवाले तथा देशका धारण-पोषण करनेवाले क्षत्रिय राजाओंकी तथा देशकी कर्तृत्व- शक्तिका मुसलमानोंके जमानेमें ह्रास होने लगा; तब संन्यास और कर्मयोगमेसे संन्यास-मार्ग, क्योंकि ‘राम राम’ जपते हुए चुप बैठे रहनेकाही सांसारिक लोगोंको अधिकाधिक ग्राह्य होने लगा होगा, क्योकि तत्कालीन बाह्य परिस्थितिके लिये यही मूल एकदेशीय मा विशेष सुभीतेका हो गया था। इसके पहले यह स्थिति नही थी, क्योंकि, 'शूद्रकमलाकर'में कहे गये विष्णु-पुराणके निम्न श्लोकमेभी यही मालूम होता है :- अपहाय निजं कर्म कृष्ण कृष्णेति वादिनः । ते हरेर्द्वेषिणः पापाः धर्मार्थं जन्म यद्धरे ॥ * “ अपने ( स्वधर्मोक्त ) कर्मोंको छोड़ ( केवल ) ‘ कृष्ण कृष्ण’ कहते रहनेवाले लोग हरिके द्वेषी और पापी हैं; क्योंकि स्वयं हरिका जन्मभी तो धर्मकी रक्षा करनेके लियेही होता है।” सच पूछो, तो ये लोग न तो संन्यासनिष्ठ हैं और न कर्मयोगीभी; क्योंकि ये लोग संन्यासियोंके समान ज्ञानमे और तीव्र वैराग्यसे सब सांसारिक कर्मोंको नहीं छोड़ते हैं; और समाजमें रह करभी कर्मयोगके समान अपने हिस्सेके शास्त्रोक्त कर्तव्यका पालन निष्काम बुद्धिसे नहीं करते; इसलिये इन वाचिक संन्यासियोंकी गणना एक निरालीही तृतीय निष्ठामें होनी चाहिये, जिसका वर्णन गीतामें नहीं किया गया है। चाहे किसीभी कारणसे हो; जब लोग इस तरहमे तृतीय प्रकृतिके बन जाते हैं तब आखिर धर्मकाभी नाश हुए बिना नहीं रह सकता । ईरान देशमे पारसी धर्मके हटाये जानेके लियेभी ऐसीही स्थिति कारण हुई थी और इसीसे हिंदुस्थानमें वैदिक धर्मकेभी “ समूलं च विनश्यति ” होनेका समय आ गया था । परंतु बौद्ध धर्मके ह्रासके बाद वेदान्तके साथही गीताके भागवत धर्मका जो पुनरुज्जीवन होने लगा था, उसके कारण हमारे यहाँ यह दुष्परिणाम नहीं हो सका । जब कि दौलताबादका हिंदू राज्य मुसलमानोंने नष्ट-भ्रष्ट नहीं किया *बम्बईके छपे हुए विष्णुपुराणमे यह श्लोक हमें नहीं मिला। परंतु उसका उपयोग कमलाकर भट्ट सरीखे प्रामाणिक ग्रंथकारने किया है; इससे यह निराधारभी नहीं कहा जा सकता ।

गया था, उसके कुछ वर्ष पूर्वही श्रीज्ञानेश्वर महाराजने हमारे सौभाग्यसे भगवद्- गीताको मराठी भाषामें अलंकृत कर गीताकी ब्रह्मविद्याको महाराष्ट्र प्रांतमें अति सुगम कर दिया था; और हिंदुस्थानके अन्य प्रांतोंमेंभी इसी समय अनेक साधु-संतोंने गीताके भक्ति-मार्गका उपदेश जारी कर रखा था। यवन-ब्राह्मण-चांडाल इत्यादिकों को एक समान और ज्ञानमूलक गीता-धर्मका जाज्वल्य उपदेश – चाहे वह वैराग्य- युक्त भक्तिके रूपमेंही क्यों न हो – एकही समय चारों ओर लगातार जारी था; इसलिये हिंदु धर्मका पूरा ह्रास होनेका कोई भय नहीं रहा। इतनाही नहीं, बल्कि उसकी कुछ कुछ छाप मुसलमानी धर्मपरभी जमने लगी; कबीर जैसे भक्त इस देशकी संत-मंडलीमें मान्य हो गये; और औरंगजेबके बड़े भाई शहजादा दाराने इसी समय अपनी देखरेखमें उपनिषदोंका फारसीमें भाषांतर कराया। यदि वैदिक भक्ति-धर्म अध्यात्मज्ञानको छोड़ केवल तांत्रिक श्रद्धाकेही आधारपर स्थापित हुआ होता, तो इस बातका संदेह है, कि उसमे यह विलक्षण सामर्थ्य रह सकती थी या नहीं। परंतु भागवत धर्मका यह आधुनिक पुनरुज्जीवन मुसलमानोंकेही जमानेमें हुआ है, अतएव यहभी अनेकांशोंमें केवल भक्तिप्रपंचक अर्थात् एकदेशीय हो गया है; और मूल भागवत-धर्मके कर्मयोगका स्वतंत्र महत्त्व जो एक बार घट गया था, वह उसे फिर प्राप्त नहीं हुआ। फलतः उस समयके भागवत-धर्मीय संतजन, पंडित और आचार्य लोगभी कर्मयोग संन्यास-मार्गका अंग या साधन है, यह कहनेके बदले कहने लगे, कि कर्मयोग भक्ति-मार्गका अंग या साधन है। उस समयमें प्रचलित इस सर्वसाधारण मत या समझके विरुद्ध केवल श्रीमत्समर्थ रामदासस्वामीने अपने ‘दासबोध’ ग्रंथमें विवेचन किया है। कर्मयोगके सच्चे और वास्तविक महत्त्वका वर्णन, विशेषतः उसके उत्तरार्धको शुद्ध तथा प्रासादिक मराठी भाषामें जिसे देखना हो, उसे समर्थकृत उक्त ग्रंथको, अवश्य पढ़ लेना चाहिये।* शिवाजी महाराजको श्रीसमर्थ रामदासस्वामीकाही उपदेश मिला था; और मरहठोंके जमानेमें जब कर्मयोगके तत्त्वोंको समझने तथा उनके प्रचार करनेकी आवश्यकता मालूम होने लगी, तब शांडिल्य-सूत्रों तथा ब्रह्मसूत्र-भाष्यके बदले महाभारतका गद्यात्मक भाषांतर होने लगा, एवं ‘बखर’ नामक ऐतिहासिक लेखोंके रूपमें उसका अध्ययन शुरू हो गया। ये भाषांतर तंजौरके पुस्तकालयमें आज तक रखे हुए हैं। यदि यही कार्यक्रम बहुत समयतक अबाधित रीतिसे चलता, तो गीताकी सब एकपक्षीय और संकुचित टीकाओंका महत्त्व घट जाता; और कालमानके अनुसार एक वार फिर यह बात सब लोगोंके ध्यानमें आ जाती, कि महाभारतकी सारी नीतिका सार गीता-

  • हिंदी प्रेमियोंको यह जानकर हर्ष होगा, कि वे अब समर्थ रामदासस्वामीकृत इस ‘दासबोध’ नामक मराठी ग्रंथके उपदेशामृतसे वंचित नहीं रह सकते, क्योंकि इसका शुद्ध, सरल तथा हृदयग्राही अनुवाद हिंदीमेंभी हो चुका है। यह हिंदी ग्रंथ चित्रशाला प्रेस, पूनासे मिल सकता है।

५०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रतिपादित कर्मयोगमें कह दिया गया है। परंतु हमारे दुर्भाग्यसे कर्मयोगका यह पुनरुज्जीवन बहुत दिनों तक नहीं टिक सका। हिंदुस्तानके धार्मिक इतिहासका विवेचन करनेका यह स्थान नही है। ऊपरके संक्षिप्त विवेचनसे पाठकोंको मालूम हो गया होगा, कि गीता-धर्ममें जो एक प्रकारकी सजीवता, तेज या सामर्थ्य है, वह संन्यास-धर्मके उस दबदबेसेभी बिल्कुल नष्ट नहीं होने पायी, कि जो मध्यकालमें दैववशात् हो गया था। तीसरे प्रकरणमें यह बतला चुके हैं, कि धर्म शब्दका धात्वर्थ 'धारणाद्धर्मः' है; और सामान्यतः उसके ये दो भेद होते हैं - एक 'पारलौकिक' और दूसरा 'व्यावहारिक' अथवा 'मोक्ष- धर्म' और 'नीति-धर्म'। चाहे वैदिक धर्मको लीजिये; बौद्ध धर्मको लीजिये, अथवा ईसाई धर्मको लीजिये, सबका मुख्य हेतु यही है, कि जगत्का धारण-पोषण हो; और मनुष्यको अंतमें सद्गति मिले, इसीलिये प्रत्येक धर्ममें मोक्ष-धर्मके साथही साथ व्यावहारिक धर्म-अधर्मकाभी विवेचन थोड़ा-बहुत किया गया है। यही नहीं; बल्कि यहाँ तक कहा जा सकता है, कि प्राचीन कालमें यह भेदही नहीं किया जाता था, कि "मोक्षधर्म और व्यावहारिक धर्म भिन्न भिन्न हैं।" क्योंकि उस समय सब लोगोकी यही धारणा थी, कि परलोकमें सद्गति मिलनेके लिये इस लोकमेंभी हमारा आचरण शुद्धही होना चाहिये। वे लोग गीताके कथनानुसार यही मानते थे, कि पारलौकिक तथा सांसारिक कल्याणकी जड़भी एकही है। परंतु आधिभौतिक ज्ञानका प्रसार होनेपर आजकल पश्चिमी देशोंमें यह धारणा स्थिर न रह सकी; और इस बातका विचार होने लगा, कि मोक्ष-धर्मरहित नीतिकी, अर्थात् जिन नियमोंसे जगत्का धारणा-पोषण हुआ करता है उन नियमोंकी, उपपत्ति बतलाई जा सकती है या नहीं; और फलतः केवल आधिभौतिक अर्थात् दृश्य या व्यक्त आधारपरही समाजधारणा- शास्त्रकी रचना होने लगी है। इसपर प्रश्न होता है, कि केवल व्यक्तसेही मनुष्यका निर्वाह कैसे हो सकेगा ? पेड़, मनुष्य इत्यादि जातिवाचक शब्दोंसेभी तो अव्यक्त अर्थही प्रकट होता है न। आमका पेड़ या गुलाबका पेड़ एक विशिष्ट दृश्य वस्तु है सही, परंतु 'पेड़' सामान्य शब्द किसीभी दृश्य अथवा व्यक्त वस्तुको नहीं दिखला सकता। इसी तरह हमारा सब व्यवहार हो रहा है। इससे यही सिद्ध होता है, कि मनमें अव्यक्तसंबंधी कल्पनाकी जागृतिके लिये पहले कुछ-न-कुछ व्यक्त वस्तु आँखोंके सामने अवश्य होनी चाहिये। परंतु इसेभी निश्चयही जानना चाहिये, कि व्यक्तही कुछ अंतिम अवस्था नहीं है; और बिना अव्यक्तका आश्रय लिये न तो हम एक कदम आगे बढ़ा सकते हैं; और न एक वाक्यभी पूरा कर सकते हैं। ऐसी अवस्थामें अध्यात्म-दृष्टिसे सर्वभूतात्मैक्यरूप परब्रह्मकी अव्यक्त कल्पनाको नीति-शास्त्रका आधार यदि न माने, तोभी उसके स्थानमें 'सर्व मानव-जाति'को -- अर्थात् आँखोंसे न दिखनेवाली अतएव अव्यक्त वस्तुको ही - अंतमें देवताके समान पूजनीय मानना पड़ता है। आधिभौतिक पंडितोंका कथन है, कि 'सर्व मानव-जातिमें' पूर्वकी तथा

उपसंहार ५०५ भविष्यत्की पीढ़ियोंका समावेश कर देनेसे अमृतत्वविषयक मनुष्यकी स्वाभाविक प्रवृत्तिको संतुष्ट हो जाना चाहिये; और अब तो प्रायः वे सभी सच्चे हृदयसे यही उपदेश करने लग गये हैं, कि इस (मानव-जातिरूपी) बड़े देवताकी प्रेमपूर्वक अनन्यभावसे उपासना करना, उसकी सेवामें अपनी समस्त आयुको बिता देना तथा उसके लिये अपने सब स्वार्थोंको तिलांजलि दे देनाही प्रत्येक मनुष्यका इस संसारमें परम कर्तव्य है। फ्रेन्च पंडित कोंट द्वारा प्रतिपादित धर्मका सार यही है; और इसी धर्मको उसने अपने ग्रंथमें 'सकल मानव-जातिधर्म' या संक्षेपमें 'मानव-धर्म' कहा है।* आधुनिक जर्मन पंडित निट्शेकाभी यही हाल है। उसने तो स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया है, कि उन्नीसवीं सदीमें "परमेश्वर मर गया है" और अध्यात्मशास्त्र थोथा झगड़ा है। इतना होनेपरभी उसने अपने सभी ग्रंथोंमें आधिभौतिक-दृष्टिसेही कर्मविपाक तथा पुनर्जन्मको मंजूर करके प्रतिपादन किया है, कि काम ऐसा करना चाहिये, जो जन्मजन्मान्तरोमेभी किया जा सके। और समाजकी इस प्रकार व्यवस्था होनी चाहिये, कि जिसमे भविष्यतमें ऐसे मनुष्य-प्राणी पैदा हों, जिनकी सब मनोवृत्तियां अत्यंत विकसित होकर पूर्णावस्थामें पहुंच जावें - बस; इस संसारमें मनुष्यमात्रका परम कर्तव्य और परम साध्य यही है। इससे स्पष्ट है, कि जो लोग अध्यात्मशास्त्रको नहीं मानते, उन्हेंभी कर्म-अकर्मका विवेचन करनेके लिये कुछ-न- कुछ परम साध्य अवश्य मानना पड़ता है और यह साध्य एक प्रकारसे 'अव्यक्त' ही होता है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि आधिभौतिक नीतिशास्त्रज्ञोंके ये दो ध्येय हैं - (१) सब मानव-जातिरूप महादेवकी उपासना करके सब मनुष्योंका हित करना चाहिये; और (२) ऐसे कर्म करना चाहिये, कि जिससे भविष्यतमें अत्यंत पूर्णावस्थामें पहुंचा हुआ मनुष्य-प्राणी उत्पन्न हो सके; तथापि जिन लोगोंको इन दोनोंका उपदेश किया जाता है, उनकी दृष्टिसे वे अगोचर या अव्यक्तही बने रहते हैं। कोंट अथवा निट्शेका यह उपदेश ईसाई धर्म सरीखे तत्त्वज्ञानरहित केवल आधिदैवत भक्ति-मार्गका विरोधी भलेही हो; परंतु जिस धर्म-अधर्मशास्त्रका अथवा नीतिशास्त्रका परमधेय अध्यात्म-दृष्टिसे सर्वभूतात्मैक्य-ज्ञानरूप साध्यकी या कर्मयोगी स्थितप्रज्ञकी पूर्णावस्थाकी नींवपर स्थापित हुआ है, उसके पेटमें सब आधिभौतिक साध्योंका विरोधरहित समावेश सहजहीमें हो जाता है; और इससे कभी इस भयकी आशंका नहीं हो सकती, कि अध्यात्मज्ञानसे पवित्र किया गया वैदिक धर्म उक्त उपदेशसे क्षीण हो जावेगा। अब प्रश्न ये हैं, कि यदि अव्यक्तकोही परम * कोंटने अपने धर्मका Religion of Humanity नाम रखा है। उसका विस्तृत विवेचन कोंटके A System of Positive Polity (Eng. trans. in four vols.) नामक ग्रंथमें किया गया है। इस ग्रंथमे इस बातकी उत्तम चर्चा की गई है कि केवल आधिभौतिक दृष्टिसेभी समाज-धारणा किस तरह की जा सकती है।

५०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

साध्य मानना पड़ता है, तो वह सिर्फ मानव-जातिके लियेही क्यों माना जाय ? अर्थात् वह मर्यादित या संकुचित क्यों कर दिया जाय ? पूर्णावस्थाकोही जब परम साध्य मानना है; तो उसमें ऐसे आधिभौतिक साध्यकी अपेक्षा, जो जानवर और मनुष्य दोनोंके लिये समान हो, अधिकताही क्या है ? इन प्रश्नोंका उत्तर देते समय अध्यात्म- दृष्टिसे निष्पन्न होनेवाले समस्त चराचर सृष्टिके एक अनिर्वाच्य परम तत्त्वकीही शरणमें आखिर जाना पड़ता है। अर्वाचीन-कालमें आधिभौतिक शास्त्रोंकी अश्रुतपूर्व उन्नति हुई है; जिससे मनुष्यका दृश्य सृष्टिविषयक ज्ञान पूर्व-कालकी अपेक्षा सैकड़ों गुना अधिक बढ़ गया है; और यह बातभी निर्विवाद सिद्ध है, कि 'जैसेको तैसा' इस नियमके अनुसार जो प्राचीन राष्ट्र इस आधिभौतिक ज्ञानकी प्राप्ति नहीं कर लेगा, उसका सुधरे हुए नये पाश्चात्त्य राष्ट्रोंके सामने टिकना असंभव है। परंतु आधिभौतिक शास्त्रोंकी चाहे जितनी वृद्धि क्यों न हो जावे; यह अवश्यही कहना होगा, कि जगत्के मूल तत्त्वको समझ लेनेकी मनुष्यमात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति केवल आधिभौतिक वादसे कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो सकती। केवल व्यक्त सृष्टिके ज्ञानसे सब बातोंका निर्वाह नहीं हो सकता, इसलिये स्पेन्सर सरीखे उत्क्रांति- वादीभी स्पष्टतया स्वीकार करते हैं, कि नामरूपात्मक दृश्य सृष्टिकी जड़में कुछ अव्यक्त तत्त्व अवश्यही होगा। परंतु उनका यह कहना है, कि इस नित्य-तत्त्वके स्वरूपको समझ लेना संभव नहीं है, इसलिये इसके आधारसे किसीभी शास्त्रकी उपपत्ति नहीं बतलाई जा सकती - जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटभी अव्यक्त सृष्टि-तत्त्वकी अज्ञेयताको स्वीकार करता है। तथापि उसका यह मत है, कि नीतिशास्त्रकी उपपत्ति इसी अगम्य तत्त्वके आधारपर बतलाई जानी चाहिये। शोपेनहर इससेभी आगे बढ़कर प्रतिपादन करता है, कि यह अगम्य तत्त्व वासनास्वरूपी है; और नीतिशास्त्र- संबंधी अंग्रेज ग्रंथकार ग्रीनका मत है, कि यही सृष्टि-तत्त्व आत्माके रूपमें अंशतः मनुष्यके शरीरमें प्रादुर्भूत हुआ है। गीता तो स्पष्ट रीतिसे कहती है, कि "ममै- वांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।" हमारे उपनिषत्कारोंका यही सिद्धान्त है, कि जगत्का आधारभूत यह अव्यक्त तत्त्व नित्य है, एक है, अमृत है, स्वतंत्र है, आत्मरूपी है - बस; इससे अधिक इसके विषयमें और कुछ नहीं कहा जा सकता; और इस बातमें संदेह है, कि उक्त सिद्धान्तसेभी आगे मानवी ज्ञानकी गति कभी- बढ़ेगी या नहीं; क्योंकि जगत्का आधारभूत अव्यक्त तत्त्व इन्द्रियोंसे अगोचर अर्थात् निर्गुण है, इसलिये उसका वर्णन, गुण, वस्तु, या क्रिया दिखानेवाले किसीभी शब्दसे नहीं हो सकता; और इसीलिये उसे 'अज्ञेय' कहते हैं। परंतु अव्यक्त सृष्टि-तत्त्वका जो ज्ञान हमें हुआ करता है, वह यद्यपि शब्दोंसे अधिक न भी बतलाया जा सके; और इसलिये देखनेमें यद्यपि वह अल्पसा दीख पड़े, तथापि वही मानवी ज्ञानका सर्वस्व है; और इसीलिये लौकिक नीतिमत्ताकी उपपत्तिभी उसीके आधारसे बतलाई जानी चाहिये; एवं गीतामें किये विवेचनसे साफ़ मालूम हो जाता है, कि ऐसी

उपसंहार ५०७

उपपत्ति उचित रीतिसे बतलानेके लिये कुछभी अड़चन नहीं हो सकती। दृश्य-सृष्टिके हज़ारों व्यवहार किस पद्धतिसे चलाये जावें — उदाहरणार्थ, व्यापार कैसे करना चाहिये, लड़ाई कैसे जीतनी चाहिये, रोगीको कौन-सी औषधि किस समय दी जावे, सूर्य चंद्रादिकोंकी दूरीको कैसे जानना चाहिये — इसे भली भाँति समझनेके लिये हमेशा नामरूपात्मक दृश्य सृष्टिके ज्ञानकीही आवश्यकता हुआ करेगी और इसमें कुछभी संदेह नहीं, कि इन सब लौकिक व्यवहारोंको अधिकाधिक कुशलतासे करनेके लिये नामरूपात्मक आधिभौतिक शास्त्रोंका अधिकाधिक अध्ययन अवश्य करना चाहिये। परंतु यह गीताका विषय नहीं है। गीताका मुख्य विषय तो यही है, कि अध्यात्म-दृष्टिसे मनुष्यकी परम श्रेष्ठ अवस्थाको बतला कर उसके आधारसे यह निर्णय कर दिया जावे, कि कर्म-अकर्मरूप नीति-धर्मका मूल तत्त्व क्या है। इनमेंसे पहले याने आध्यात्मिक परम साध्य — मोक्षके बारेमें आधिभौतिक पंथ उदासीन भलेही रहे; परंतु दूसरे विषयका, अर्थात् केवल नीति-धर्मके मूल तत्त्वोंका, निर्णय करनेके लियेभी आधिभौतिक पक्ष असमर्थ है, और पिछले प्रकरणोंमें हम बतला चुके हैं, कि प्रवृत्तिकी स्वतंत्रता, नीति-धर्मकी नित्यता तथा अमृतत्व प्राप्त कर लेनेकी मनुष्यके मनकी स्वाभाविक इच्छा, इत्यादि गहन विषयोंका निर्णय आधिभौतिक पंथसे नहीं हो सकता — उसके लिये आखिर हमें आत्मानात्म-विचारमें प्रवेश करनाही पड़ता है। परंतु अध्यात्मशास्त्रका काम कुछ इतनेहीमें पूरा नहीं हो जाता। जगत्‌के आधारभूत अमृतत्वकी नित्य उपासना करनेसे, और अपरोक्षानुभवसे मनुष्यके आत्माको एक प्रकारकी विशिष्ट शांति मिलनेपर उसके शील-स्वभावमें जो परि- वर्त्तन हो जाता है, वही सदाचरणका मूल है; इसलिये इस बातपर ध्यान रखनाभी उचित है, कि मानव-जातिकी पूर्णावस्थाके विषयमेंभी अध्यात्मशास्त्रकी सहायतासे जैसा उत्तम निर्णय हो जाता है, वैसा केवल आधिभौतिक सुखवादसे नहीं होता। क्योंकि यह बात पहलेभी विस्तारपूर्वक बतलाई जा चुकी है, कि केवल विषयसुख तो पशुओंका उद्देश्य या साध्य है, उससे ज्ञानवान् मनुष्यकी बुद्धिका कभी पूरा समाधान हो नहीं सकता, सुखदुःख अनित्य हैं तथा धर्मही नित्य है। इस दृष्टिसे विचार करने- पर सहजही ज्ञान हो जावेगा, कि गीताके पारलौकिक धर्म तथा नीति-धर्म दोनोंका प्रतिपादन जगत्के आधारभूत नित्य तथा अमृतत्वके आधारसेही किया गया है, इस- लिये यह परमावधिका गीता-धर्म, उस आधिभौतिकशास्त्रसे कभी हार नहीं खा सकता, जो मनुष्यके सब कर्मोंका विचार सिर्फ इस दृष्टिसे किया करता है, कि मनुष्य केवल एक उच्च श्रेणीका जानवर है। यही कारण है, कि हमारा गीता-धर्म नित्य तथा अभय हो गया है; और भगवान्‌नेही उसमें ऐसा सुप्रबंध कर रखा है, कि हिंदु- ओंको इस विषयमें किसीभी दूसरे धर्म, ग्रंथ, या मतकी ओर मुँह ताकनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। जब सब ब्रह्मज्ञानका निरूपण हो गया, तब याज्ञवल्क्यने राजा जनकसे

५०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कहा है, कि "अभयं वै प्राप्तोऽसि" - अब तू अभय हो गया (बृ. ४. २. ४); यही बात गीता-धर्मके ज्ञानके लिये अनेक अर्थोंमें अक्षरशः कही जा सकती है। गीता-धर्म कैसा है? वह सर्वतोपरि निर्भर और व्यापक है। वह सम है, अर्थात् वर्ण, जाति, देश या किसी अन्य भेदोंके झगड़ेंमें नहीं पड़ता; किंतु सब लोगोंको एकही मापतौलसे सद्गति देता है। वह अन्य सब धर्मोंके विषयमें यथोचित सहि- ष्णुता दिखलाता है। वह ज्ञान, भक्ति और कर्मयुक्त है; और अधिक क्या कहें? वह सनातन वैदिक धर्म-वृक्षका अत्यंत मधुर तथा अमृत फल है। वैदिक धर्ममें पहले द्रव्यमय या पशुमय यज्ञोंका अर्थात् केवल कर्मकांडकाही अधिक महात्म्य था, परंतु फिर उपनिषदोंके ज्ञानसे यह केवल कर्मकांड-प्रधान श्रौत-धर्म गौण माना जाने लगा; और उसी समय सांख्यशास्त्रकाभी प्रादुर्भाव हुआ। परंतु यह ज्ञान सामान्य जनोंको अगम्य था; और इसका झुकावभी कर्म-संन्यासकी ओरही विशेष रहा करता था, इसलिये केवल औपनिषदिक धर्मसे अथवा दोनोंकी स्मार्त एकवाक्यतासेभी सर्वसाधारण लोगोंका पूरा समाधान होना संभव नहीं था। अतएव उपनिषदोंके केवल बुद्धिगम्य ब्रह्मज्ञानके साथ प्रेमगम्य व्यक्त उपासनाके राजगुह्यका संयोग करके कर्मकांडकी प्राचीन परंपराके अनुसारही, अर्जुनको निमित्त करके गीता-धर्म सब लोंगोंको मुक्तकंठसे यही कहता है, कि "तुम अपनी अपनी योग्यताके अनुसार अपने अपने सांसारिक कर्तव्योंका पालन लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे, आत्मौ- पम्य-दृष्टिसे तथा उत्साहसे यावज्जीवन करते रहो, और उसके द्वारा ऐसे नित्य परमात्म-देवताका सदा यजन करो, जो पिंड-ब्रह्मांडमें तथा समस्त प्राणियोंमें एकत्वसे व्याप्त है; उसीमें तुम्हारा सांसारिक तथा पारलौकिक कल्याण है।" उससे कर्म, बुद्धि, (ज्ञान) और प्रेम (भक्ति) इन तीनोंके बीचका विरोध नष्ट हो जाता है; और सब आयु या जीवनही को ज्ञानमय करनेके लिये उपदेश देनेवाले अकेले गीता-धर्ममें सकल वैदिक धर्मका सारांश आ जाता है। इस नित्य-धर्मको पहचानकर, केवल कर्तव्य समझ करके, सर्वभूतहितके लिये प्रयत्न करनेवाले सैंकड़ों महात्मा और कर्ता या वीर पुरुष जब इस पवित्र भारतभूमिको अलंकृत किया करते थे, तब यह देश परमेश्वरकी कृपाका पात्र बनकर न केवल ज्ञानके वरन् ऐश्वर्यकेभी शिखरपर पहुँच गया था; और कहना नहीं होगा, कि जबसे दोनों लोकोंका साधन यह श्रेयस्कर धर्म छूट गया है, तभीसे इस देशकी निकृष्टावस्थाका आरंभ हुआ है। इसलिये ईश्वरसे आशापूर्वक अंतिम प्रार्थना यही है, कि भक्तिका, ब्रह्मज्ञानका और कर्तृत्व-शक्तिका यथोचित मेल कर देनेवाले इस तेजस्वी तथा सम गीता-धर्मके अनुसार परमेश्वरका यजन-पूजन करनेवाले सत्पुरुष इस देशमें फिरभी उत्पन्न हों। और, अंतमें उदार पाठकोंसे निम्न मंत्रद्वारा (ऋ. १०. १९१. ४) यह विनंती करके गीताका रहस्य-विवेचन यहाँ समाप्त किया जाता है, कि इस ग्रंथमें कहीं भ्रमसे कुछ न्यूनाधिकता हुई हो, तो उसे सम दृष्टिसे सुधार लीजिये :-